अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान का डर, सोशल मीडिया अकाउंट पर असर
अफ़ग़ानिस्तान पर बीते महीने तालिबान के कब्ज़े के पहले देश में कई ऐसे सोशल मीडिया यूज़र थे जो तालिबान की नीतियों के धुर विरोधी थे.
लेकिन 15 अगस्त के बाद से अफ़ग़ानिस्तान के कई लोग पहले पोस्ट की गईं तस्वीरें और ट्वीट् डिलीट कर रहे हैं. कई लोगों ने सोशल मीडिया से ही दूरी बना ली है. ऐसा इस डर में किया जा रहा है कि कहीं तालिबान के लड़ाके उन्हें निशाना न बना लें.
तालिबान ने पूर्व में अपने ख़िलाफ़ लड़ने वाले या फिर पूर्व सरकार का हिस्सा रहे अफ़ग़ानिस्तान के सभी लोगों को आम माफ़ी देने का एलान किया है.
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हालांकि देश छोड़कर गए कुछ लोगों ने बीबीसी को बताया कि वो तालिबान पर भरोसा नहीं करते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के अलग-अलग हिस्सों से इस तरह कि रिपोर्टें सामने आईं हैं कि काबुल पर कब्ज़े के बाद अपने नेताओं के वादों के उलट तालिबान लड़ाकों ने आम नागरिकों की जान ली है.
https://www.youtube.com/watch?v=K8y_WLhgMNg
बीते हफ्ते तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याक़ूब ने एक ऑडियो संदेश जारी किया था.
इसमें ये बात मानी गई थी कि ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं जिनमें कहा गया है कि तालिबान के लड़ाकों ने 'बदले की कार्रवाई के तहत' आम लोगों की 'जान ली' है.
उन्होंने इस बारे में ज्यादा ब्योरा नहीं दिया और ख़ास घटनाओं के बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी.
इस ख़बर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पोस्ट के चलते संभावित हमलों को लेकर डर का माहौल बना और फ़ेसबुक अफ़ग़ानिस्तान के यूज़र्स के लिए एक अतिरिक्त फीचर लेकर आया.
इसमें यूज़र्स को अपना प्रोफ़ाइल लॉक करने की इजाज़त मिली. यूज़र्स ने क्या पोस्ट किया है, उसे कोई और नहीं देख सकेगा, ये सहूलियत भी इस फ़ीचर के ज़रिए उनके पास होगी.
इसे लेकर बीबीसी ने अफ़ग़ानिस्तान के दो लोगों से बात की. इनमें से एक काबुल में हैं और दूसरे एक अन्य बड़े शहर में हैं.
इन दोनों के ही सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर रहे हैं. तालिबान के सत्ता में आने के पहले इन्हें काफ़ी असरदार माना जाता था.
तालिबान के कब्ज़े के बाद से इन दोनों ने निशाना बनाए जाने डर से अपने अकाउंट डिलीट कर दिए. अफ़ग़ानिस्तान के हालात को देखते हुए बीबीसी से बात करने वाले दोनों लोगों के नाम इस रिपोर्ट में बदल दिए गए हैं.
सिर में गोली मार देंगे
काबुल में रहने वाले फ़िदा सोशल मीडिया पर काफी चर्चित थे और तालिबान के धुर विरोधी थे. वो तालिबान की नीतियों और तौर तरीकों की लगातार आलोचना करते थे.
लेकिन अब फ़िदा ने अपना फ़ेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया है. उनका नाम ऐसे लोगों की लिस्ट में शामिल है जिन्हें पश्चिमी देश अपने यहां पनाह दे देंगे.
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा किया तो रिश्तेदारों ने उन्हें बताया कि वो ख़तरे में हैं. वजह ये है कि 'कब्ज़ा करने वालों' के ख़िलाफ़ तालिबान की जंग में उन्होंने नुक़सान पहुंचाने वाली भूमिका निभाई है.
फ़िदा ने बताया, "उन्होंने मेरे रिश्तेदारों से कहा आम माफ़ी के बाद भी लोग माफ नहीं करेंगे."
रिश्तेदारों ने बताया कि उनका नाम उस लिस्ट में था जिसे लेकर कहा गया कि वो 'जब भी मिलेंगे सिर में गोली मार दी जाएगी.'
फ़िदा ने बताया कि 16 अगस्त यानी तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के एक दिन बाद उन्होंने अपने सारे सोशल मीडिया अकाउंट डिलीट कर दिए. फिदा ने बताया कि फ़ेसबुक पर उनकी आख़िरी पोस्ट तालिबान विरोधी थी और वो अब अफ़ग़ानिस्तान में रहना नहीं चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "मैं अब यहां रहने की बजाए मर जाऊंगा."
हैरिस अफ़ग़ानिस्तान के किसी और शहर में रहते हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के दो दिन पहले ही उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट डिलीट कर दिए.
वो बताते हैं कि उन्हें लगा 'तालिबान राज आ रहा है और लोकतंत्र जा चुका है.'
बदल गए हालात
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े के कई साल पहले से तब की सरकार पर आरोप लगाए जाते थे कि वो स्पॉन्सरशिप देकर सोशल मीडिया अकाउंट चलवा रही है.
तब की सरकार पर ये आरोप था कि वो वेतन देकर सोशल मीडिया पर सरकार के समर्थन और तालिबान की आलोचना वाली पोस्ट कराती है.
लेकिन हैरिस का कहना है कि उन्होंने कभी किसी के अनुरोध या पैसे लेकर कुछ भी पोस्ट नहीं किया. हैरिस उन सैकड़ों युवाओं में शामिल हैं जो जल्दी ही देश छोड़कर बाहर शरण लेंगे.
वो कहते हैं, "मैं लोकतंत्र के पक्ष में था. राष्ट्रपति अशरफ ग़नी के पक्ष में नहीं."
वो बताते हैं कि उन्होंने अशरफ़ ग़नी की आलोचना वाली पोस्ट भी लिखी थीं.
ये पूछे जाने पर कि तालिबान के आम माफ़ी के एलान के बाद भी वो अफ़ग़ानिस्तान क्यों छोड़ देना चाहते हैं, हैरिस कहते हैं, वो ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं.
उन्होंने कहा, "वो अब भी लोगों को निशाना बना रहे हैं. लोगों की जान ले रहे हैं और उनकी तलाश कर रहे हैं. इंतज़ार कीजिए ये तो बस शुरुआत है."
हैरिस कहते हैं कि उन्हें लगता है कि आने वाले दिनों में तालिबान पूरे देश में शरिया क़ानून को कड़ाई से लागू करेंगे.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि कोई पढ़ा लिखा अफ़ग़ान यहां रह पाएगा."
तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को बार-बार कहा है कि वो देश छोड़ न जाएं और राष्ट्रीय संस्थानों में उनके साथ काम करें ताकि देश के पढ़े लिखे लोग दूसरे देशों के बजाए अपने देश की सेवा करें.
हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान के कई युवाओं का कहना है कि वो तालिबान और उनके वादों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं. वो जल्दी से जल्दी देश छोड़कर बाहर जाने की योजना बना रहे हैं.
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