अब अफगानिस्तान कैसा है ? डॉक्टर, इंजीनियर और दुकानदार की जुबानी जानिए हाल
काबुल, 06 सितंबर। अफगानिस्तान में पहले बहुत भ्रष्टाचार था। लेकिन आजादी थी। मर्जी से जीने की आजादी। आम आदमी को कमाने खाने की आजादी। अब भ्रष्टाचार तो खत्म हो गया लेकिन आजादी भी चली गयी। अब जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं। रोजी-रोटी पर आफत है। आजादी का अहसास ठंडी हवा का एक पुरसुकून झोंका था।

अब महसूस हो रहा है कि कितनी कीमती चीज खो दी। तालिबान के हमदर्द लोगों को भी तब और अब में फर्क महसूस होने लगा है। आज के अफगानिस्तान के बारे में वहां के लोग क्या सोचते हैं, जानते हैं उनकी ही जुबानी। हिफाजत के ख्याल से इनके नाम बदल दिये गये हैं।

भ्रष्टाचार तो खत्म हुआ, शासन कैसे चलेगा ?
रहमतुल्ला काबुल में मुद्रा विनिमय का काम करते हैं। वे तलिबान के समर्थक थे। उन्हें लगता था कि तालिबान के आने से इस्लामिक आमिरात की स्थापना हो जाएगी और इस मुल्क से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। हामिद करजई और अशरफ गनी के जमाने में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद इतना ज्यादा था कि आम लोग घुटन महसूस करते थे। पुलिस और सेना बिना पैसों का कोई काम नहीं करती थी। (2012 में अफगानिस्तान दुनिया का तीसरा सबसे भ्रष्ट देश था। अमेरिका की जासूसी संस्था सीआइए अफगानी नेताओं और सैनिक अधिकारियों की वफादारी खरीदने के लिए अमेरिकी डॉलर से भरे सूटकेस भेजती थी। भ्रष्टाचार के कारण अफगानी सेना खोखली हो चुकी थी इसकी वजह से ही उसने बिना लड़े ही हथियार डाल दिये थे।) भ्रष्टाचारियों का गुट बहुत ताकतवर थे। इनके खिलाफ शायद ही कोई शिकायत कर पाता था। तालिबान के आने से भ्रष्टाचार तो खत्म हो गया लेकिन अभी तक शासन का स्वरूप सामने नहीं आया है। स्थानीय स्तर पर कैसा शासन होगा ? लूट खसोट करने वाले अफसर क्या फिर आ जाएंगे ? तालिबान के हथियारबंद सैनिक तो लोकल एडमिनिस्ट्रेशन नहीं चलाएंगे ? इसके लिए तो सिविल सर्वेंट होने चाहिए। सब कुछ अनिश्चित लग रहा है। तालिबन और दूसरे गुटों में तालमेल भी नहीं दिख रहा। अगर पावर के लिए फिर खून-खराबा शुरू हो गया तो इस तब्दीली का क्या मतलब रह जाएगा ?

पेट भरने के लिए रोटी चाहिए और रोटी के लिए पैसा
26 साल के ओबेद काबुल में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। फाइनल ईयर चल रहा है। चार दिन पहले काबुल के अजीजी बैंक की शाखा में पैसा निकालने गये थे। लाइन इतनी लंबी कि सड़क पर कतार लगानी पड़ी। बैंक ने करीब एक सौ लोगों को केवल दो दो हजार अफगानी (अफगानिस्तान की मुद्रा) दिये। इसके बाद कह दिया कि अब बैंक में रुपये नहीं हैं। मेरे आगे एक बुजुर्ग खड़े थे। उनके घर का राशन खत्म हो गया था। आटा खरीदना बेहद जरूरी था। लेकिन मायूस हो कर उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। अब बैंकों में पैसा आने की बात तो सुन रहा हूं। लेकिन इसके बाद भी हालात सुधरेंगे कि नहीं, कह नहीं सकता। लोग घबराये हुए हैं। वे अधिक से अधिक पैसा निकाल कर इत्मिनान होना चाहते हैं। अभी तो कोई बैक में पैसा जमा करने के बारे में सोच भी नहीं रहा। ऐसे में बैंक एक लिमिट के बाद पैसे का भुगतान बंद कर देंगे। अभी सबसे बड़ी समस्या गरीबी है। हालात अच्छे नहीं हैं। मैं किसी भी तरह से यहां से निकलने के बारे में सोच रहा हूं।

“अब जींस-टी शर्ट में दिखे तो गंभीर नतीजे होंगे”
मकबूल काबुल के एक मुख्य व्यवसायिक जिले में जूते की दुकान चलाते हैं। पिछली सरकार ने कुछ भले न दिया हो लेकिन मनपसंद लिबास पहनने की आजादी तो दी थी। 33 साल के मकबूल सफेद टी शर्ट और ब्लू डेनिम जींस में किसी मॉडल से कम नहीं लग रहे थे। जब कोई आदमी एक बार आजादी की हवा में सांस ले लेता है तो फिर ये उसकी आदत हो जाती है। मकबूल फैशनेबल थे लेकिन तालिबान के समर्थक थे। पिछली सरकारों में फैले करप्शन के खिलाफ उनके मन में गुस्सा था। तालिबान के आने के बाद भी वे टी शर्ट और जींस में ही दुकान जाते थे। एक दिन तालिबान के हथियारबंद सैनिक उनकी दुकान पर आ धमके। उन्होंने मकबूल को चेतावनी दी कि अब धार्मिक परम्परा के मुताबिक ही ड्रेस पहननी होगी। अगर दोबारा टी शर्ट और जींस में दिखे तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहना। मकबूल ने डर से उनकी बात मान ली। मकबूल की दुकान अब खाली ही रहती है। फैशनेबल जूते-चप्पल अब कोई नहीं खरीदता। औरतें और लड़कियां तो बिल्कुल नहीं आतीं। जब पेट पर आफत हो तो भला जूतों की फिक्र कौन करे।

अमेरिका ने अफगानिस्तान के लोगों से धोखा किया
सईद कंधार में सिविल इंजीनियर हैं। सईद कहते हैं, तालिबान के लोग एके -47 और रॉकेट लांचर चला सकते हैं लेकिन देश को चलाने के लिए एक अलग सलाहियत चहिए। देश ताकत से नहीं अकल और हुनर से चलता है। अफगानिस्तान में इनक्लूसिव गवर्नमेंट (कई समूहों को शमिल करना) की बात चल रही है। तलिबान समेत इसमें कई गुट हैं। अगर इनके बीच आपसी झगड़ा शुरू हुआ तो शासन कैसे चलेगा। इन सब के लिए जिम्मेवार अमेरिका है। जो बाइडन ने हम लोगों के साथ धोखा किया। उनकी वापसी की शर्तों में यह भी शामिल था कि जब तक अफगानिस्तान में शांति और व्यवस्था सुनिश्चत न हो जाए तब तक उन्हें निगरानी करनी थी। लेकिन अमेरिकी सरकार ने अफगानिस्तान के निवासियों और लोकतंत्र को तलिबान की कदमों में समर्पित कर दिया। अब हमारा कोई भविष्य नहीं है।
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