भारत ने श्रीलंका में चीन को दिया बहुत बड़ा झटका, 700 मिलियन डॉलर का कोलंबो पोर्ट बनाएगा अडाणी ग्रुप

हिंद महासागर में प्रभाव स्थापित करने और खाड़ी देशों तक व्यापार करने के लिए कोलंबो बंदरगाह का रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है, इसीलिए भारत और चीन, दोनों देशों ने इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी ताकत झोंक दी थी।

कोलंबो, अक्टूबर 01: श्रीलंका में भारत ने चीन को बहुत बड़ा झटका देते हुए कोलंबो पोर्ट प्रोजेक्ट अपने नाम कर लिया है। हिंद महासागर में रणनीतिक बढ़त के लिए श्रीलंका पोर्ट को काफी अहम माना जा रहा था और ये प्रोजेक्ट अब भारत को मिल गया है। अडानी ग्रुप ने कोलंबो पोर्ट सिटी बनाने के लिए श्रीलंका की सरकार के साथ बहुत बड़ा करार दिया है। भारत के लिए ये सौदा काफी ज्यादा अहम इसलिए था, क्योंकि अगर ये पोर्ट प्रोजेक्ट भारत के हाथ से चला जाता तो फिर चीन हिंद महासागर में भारत के नाक के नीचे खड़ा हो जाता।

पोर्ट प्रोजेक्ट छिनने से परेशान चीन

पोर्ट प्रोजेक्ट छिनने से परेशान चीन

चीन के अखबार साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने चीन के अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि भारतीय कंपनी अडानी ग्रुप ने श्रीलंका में एक रणनीतिक रूप से काफी अहम गहरे समुद्र में कंटेनर टर्मिनल बनाने के लिए गुरुवार को 700 मिलियन अमेरिकी डॉलर का सौदा किया है। चीन के अधिकारियों ने कहा है कि, भारत का ये कदम इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के रूप में देखा जा रहा है। श्रीलंका पोर्ट्स अथॉरिटी (एसएलपीए) ने कहा है कि, उसने राजधानी कोलंबो में विशाल बंदरगाह पर नया टर्मिनल बनाने के लिए भारत के अडानी ग्रुप के साथ समझौता किया है।

चीन के लिए कैसे है झटका?

चीन के लिए कैसे है झटका?

भारतीय कंपनी अडानी ग्रुप ने श्रीलंका को कोलंगो बंदरगाह पर गहरे समुद्र में जिस नये टर्मिनल को बनाने का करार श्रीलंका की सरकार के साथ किया है, वो कोलंबो बंदरगाह पर ही चीन द्वारा बनाए गये 500 मिलियन डॉलर के जेटी प्रोजेक्ट के ठीक बगल में है। यानि, भारत ने चीन के प्रोजेक्ट के ठीक बगल में नये प्रोजेक्ट के लिए श्रीलंका की सरकार के साथ करार करने में कामयाबी हासिल कर ली है। श्रीलंका पोर्ट्स अथॉरिटी (एसएलपीए) ने एक बयान में कहा है कि, "700 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का समझौता श्रीलंका के बंदरगाह क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश है।"

किसकी कितनी हिस्सेदारी

किसकी कितनी हिस्सेदारी

एसएलपीए ने कहा है कि, अडानी ग्रुप एक स्थानीय समूह जॉन कील्स और श्रीलंका सरकार के स्वामित्व वाले एसएलपीए के साथ मिलकर टर्मिनल का निर्माण करेगा, जिसमें 51 प्रतिशत हिस्सेदारी अडानी ग्रुप की होगी''। वहीं, जॉन कील्स ने कहा कि उनकी कंपनी का 34 प्रतिशत हिस्सा होगा, जबकि अडानी के पास कोलंबो वेस्ट इंटरनेशनल टर्मिनल के रूप में जाने वाले संयुक्त उद्यम में 51 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ नियंत्रण होगा।

कैसा होगा कोलंबो पोर्ट का नया टर्मिनल?

कैसा होगा कोलंबो पोर्ट का नया टर्मिनल?

चीनी मीडिया के मुताबिक, नया कंटेनर जेट्टी 1.4 किमी लंबा होगा, जिसमें 20 मीटर की गहराई और 3.2 मिलियन कंटेनरों को संभालने की वार्षिक क्षमता होगी। कंपनी ने कहा है कि 600 मीटर के टर्मिनल के साथ परियोजना का पहला चरण दो साल के भीतर पूरा किया जाएगा। 35 वर्षों के संचालन के बाद टर्मिनल का स्वामित्व वापस श्रीलंका की सरकार के पास वापस चला जाएगा।

भारत के पास प्रोजेक्ट, बौखलाया चीन

भारत के पास प्रोजेक्ट, बौखलाया चीन

चीन की सरकार की भोंपू मीडिया साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने इस प्रोजेक्ट को लेकर कहा है कि भारतीय कंपनी के पास प्रोजेक्ट जाने से कोलंबो बंदरगाह की योजना कई साल पीछे चली गई है। आपको बता दें कि, कोलंबो पोर्ट सिटी रणनीतिक तौर पर काफी ज्यादा अहम है और चूंकी ये कोलंबो पोर्ट चीन को हिंद महासागर में उतरने की इजाजत देता है, लिहाजा चीन इस पोर्ट प्रोजेक्ट को अपने नाम करने के लिए पूरी ताकत लगा चुका था। वहीं, भारत के पास पहले श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह पर पूर्वी टर्मिनल पर एक प्रोजेक्ट बनाने का भी करार था, लेकिन श्रीलंका में ट्रेड यूनियंस ने भारत को दी गई बड़ी हिस्सेदारी का भारी विरोध किया था, जिसके बाद श्रीलंका की सरकार ने भारत के साथ करार रद्द कर दिया था। सूत्रों के मुताबिक, भारत के हाथ से प्रोजेक्ट निकलवाने के पीछे चीन का हाथ था, जिसका भारत ने कड़ा विरोध किया था। जिसके बाद बताया जा रहा है कि भारत सरकार को खुश करने के लिए श्रीलंका ने भारतीयों से चीनी संचालित कोलंबो इंटरनेशनल कंटेनर टर्मिनल (CICT) से सटे एक नया टर्मिनल बनाने के लिए कहा है।

कितना अहम है कोलंबो पोर्ट प्रोजेक्ट

कितना अहम है कोलंबो पोर्ट प्रोजेक्ट

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो, दुबई और सिंगापुर के प्रमुख केंद्रों के बीच हिंद महासागर में स्थित है, जिसका अर्थ है कि कोलंबो के बंदरगाहों पर प्रभाव जमाने के लिए भारत और चीन एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। 2014 में श्रीलंका के सीआईसीटी में दो चीनी पनडुब्बियां ने डेरा जमा लिया था, जिसका भारत ने श्रीलंका की सरकार के पास कड़ा विरोध किया था। जिसके बाद श्रीलंका ने चीनी पनडुब्बियों को वहां से निकलने के लिए कहा था और उसके बाद से श्रीलंका की सरकार चीन की पनडुब्बियों को तैनात रकरने की इजाजत नहीं देती है। लेकिन, भारत के लिए चिंता लगातार इसलिए बनी हुई है, क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि श्रीलंका की सरकार चीन के प्रभाव में है।

चीन के पास हंबनटोटा बंदरगाह

चीन के पास हंबनटोटा बंदरगाह

दिसंबर 2017 में श्रीलंका की सरकार चीन का एक बहुत बड़ा कर्ज लौटाने में असमर्थ हो गई थी, जिसके बाद श्रीलंका ने चाइना मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स को दक्षिणी हंबनटोटा बंदरगाह पर कब्जा करने की अनुमति दे दी थी। जो दुनिया के सबसे व्यस्त पूर्व-पश्चिम शिपिंग मार्ग का विस्तार करता है। इस सौदे के तहत चीनी कंपनी के पास 99 साल के लिए बंदरगाह का अधिकार आ गया है। श्रीलंका के कई नेताओं ने इस सौदे का विरोध किया था और वैश्विक समुदाय में भी यही संदेश गया कि चीन ने श्रीलंका को कर्ज के जाल में फंसाकर उसके एक बंदरगाह पर कब्जा कर लिया है। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी हंबनटोटा बंदरगाह के चीन के पास जाने को लेकर गहरी चिंता जताई थी। हंबनटोटा बंदरगाह चीन को हिंद महासागर में पैर जमाने और अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार करने का बड़ा मौका देता है।

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