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Abraham Accords: अब्राहम अकॉर्ड क्या है? कैसे पाकिस्तान इसमें एंट्री लेकर ईरान को दे रहा डबल धोखा

Abraham Accords: अब्राहम अकॉर्डस या अब्राहम समझौता एक ऐतिहासिक राजनयिक पहल है। अब्राहम अकॉर्डस मिडिल ईस्ट देशों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण समझौता है। यह इजरायल और कुछ मिडिल ईस्ट देशों के बीच राजनितिक संबंधों को अच्छा बनाने के लिए लाया गया था। लेकिन कुछ एक्सपर्ट इसे इजरायल के फायदे के लिए अमेरिका द्वारा लाया गया एक राजनीतिक हथियार भी बताते हैं।

अमेरिका बना मीडिएटर

यह समझौता मुख्य रूप से, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन के बीच हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद सूडान और मोरक्को भी इसमें शामिल हो गए। इस समझौते में अमेरिका ने मीडिएटर की भूमिका निभाई। 13 अगस्त 2020 को पास होने के बाद इस समझौते का असर मिडिल ईस्ट के जियो पॉलिटिकल इतिहास में एक बड़ा मोड़ लाया। जहां एक ओर पहले इन सभी देशों में अक्सर तनातनी देखी जाती थी लेकिन इस समझौता के बाद इन देशों में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए।

Abraham Accords

क्यों रखा समझौते का नाम अब्राहम?

इस समझौते का नाम 'अब्राहम' अब्राहमिक धर्मों के साझा पूर्वज हज़रत इब्राहिम के नाम पर रखा गया। इब्राहिम यहूदी और इस्लाम दोनों में एक पैगम्बर के रूप में माने जाते हैं। साथ ही ईसाई धर्म भी अब्राहमिक धर्म है। इसलिए इसमें अमेरिका, मुस्लिम देश और इजरायल तीनों हिस्सेदार हैं। समझौते का यह नाम रखने के पीछे एक उद्देश्य यह भी था कि इसे एकता और विश्वास की ओर उठाए गए कदम के लिए जाना जाए। यह समझौता मिडिल ईस्ट में जियो-पॉलिटिकल समीकरणों को बदलने वाला ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है।

क्या है इस समझौते के पीछे की असली वजह?

अब्राहम समझौते को अपनाने के पीछे कई राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक कारण थे। दशकों से इजरायल और अरब देशों के बीच दुश्मनी और संघर्ष का माहौल बना हुआ था। इस दुश्मनी की शुरुआत 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से ही शुरु हो चुकी थी। बड़े पैमाने पर शत्रुता फिलिस्तीन और इसकी संप्रभुता के सवाल के कारण थी। अरब देशों ने तो इजरायल को कई सालों तक राष्ट्र के रूप में नहीं अपनाया। 1948 के बाद अरब देशों और इजरायल के बीच बड़े पैमाने पर तीन प्रमुख युद्ध 1956, 1967 और 1973 में हुए। हालांकि इन सब युद्धों में इजरायल हमेशा जीतता रहा और अरब देशों को हर बार मुंह की खानी पड़ी।

एक-एक कर सभी ने दी मान्यता

इसके बाद इजिप्ट और इजरायल युद्ध के दौरान, इजिप्ट जीत के बेहद करीब था। लेकिन तत्कालीन इजिप्ट राष्ट्रपति, अनवर सदत इजरायल के साथ संघर्षों का नतीजा भी जानते थे इसलिए उन्होंने शांति बहाल करने और अच्छे सम्बन्ध स्थापित करने के लिए नई पहल की शुरुआत की। इस संबंध में कैम्प डेविड समझौते पर इजरायल और इजिप्ट के बीच हस्ताक्षर किए गए। नतीजतन 1979 में इजिप्ट इजरायल को मान्यता देने वाला एक और देश बन गया। इसके बाद 1994 में जॉर्डन ने भी इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता दे दी।

ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद बदले समीकरण

लेकिन समय के साथ कई देशों ने यह महसूस किया कि आपसी सहयोग, सुरक्षा और विकास की दृष्टि से यह टकराव नुकसानदायक भी है। इसलिए, अब्राहम समझौते के माध्यम से उन्होंने पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक नई शुरुआत की। इस समझौते को अपनाने का एक प्रमुख कारण ईरान का बढ़ता प्रभाव भी था। दरअसल ईरान में 1979 में सत्ता परिवर्तन हुआ, पहलवी शासन के बाद आई इस्लामिक क्रांति ने वहां कट्टर इस्लामी गुट को सत्ता पर बिठा दिया और ईरान-इजरायल में दुश्मनी की शुरुआत हो गई। ईरान के दूसरे अरब देशों जैसे कि सऊदी और इराक से संबंध भी खराब हो चुके थे। लिहाजा अरब देशों और इजरायल दोनों को अक्सर ईरान से खतरा बना रहता ईरान से पैदा होने वाले खतरे के कारण इन देशों में एक रणनीतिक भागीदारी के बारे में पहली बार सोचा जिसे बाद अब्राहम अकॉर्ड कहा गया।

क्या है समझौते का महत्त्व?

इस समझौते से सभी देशों को कई तरह के फायदे हुए। अब्राहम समझौते के द्वारा यह तय किया गया की यूएई और बहरीन इजरायल में अपने-अपने दूतावास स्थापित करेंगे। इससे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा भी मिला है। साथ ही साथ पर्यटन, व्यापार और सुरक्षा सहित कई अन्य क्षेत्रों में बाकी देश इजरायल के साथ मिलकर काम करेंगे। इस समझौते का धार्मिक महत्व भी रहा, मुसलमानों को इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों में से एक, यरूशलेम में अल-अक्सा मस्जिद में जाने की अनुमति भी मिलेगी। समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, सूडान और मोरक्को ने उसी साल इजरायल के साथ अपने संबंधों को सामान्य कर दिया। अब्राहम समझौता न केवल मिडिल ईस्ट में एक नई जियो पॉलिटिकल शुरुआत को दिखाता है, बल्कि यह ये भी दर्शाता है कि लंबे समय से चले संघर्ष और विरोध को आपसी हितों और कूटनीति के माध्यम से बदला जा सकता है।

अमेरिका ने चली यहां भी अपनी चाल

मई 2020 में इजरायल और फिलिस्तीन के बीच हालिया संघर्ष के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनका प्रशासन ज्यादा से ज्यादा अरब देशों को इजरायल के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कहने लगा बल्कि गाजा पट्टी में 2022 के युद्ध के बाद मौजूदा सौदों को मजबूत करने के लिए काम भी करता रहा। अमेरिका ने इस समझौते को मिडिल ईस्ट में शांति बहाली के नाम पर आगे बढ़ाना भी शुरू किया। अमेरिका, खासकर कि ट्रंप प्रशासन का इस समझौते के पीछे असल मकसद यह था कि इजरायल और अरब देशों के बीच सब कुछ सामान्य हो सके। जिसके बाद इस इलाके में स्थिरता लाई जाए, ताकि अमेरिका का यहां दबदबा और मजबूत हो सके।

पाकिस्तान की आई अब्राहम अकॉर्डस में रूचि?

ईरान-इजरायल युद्ध के बाद पाकिस्तान अपने कथित मित्र देश को धोखा देने की तैयारी कर रहा है। कथित इसलिए क्योंकि पाकिस्तान ईरान को बताता तो दोस्त है लेकिन युद्ध में हर बार धोखा दे देता है। पाकिस्तान की सरकार इजरायल को देश के तौर पर मान्यता नहीं देती है। साथ ही पाकिस्तान ने बार-बार फिलिस्तीन का समर्थन किया है लेकिन पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का ताजा बयान अब अलग इशारा कर रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने समा टीवी पर एक इंटरव्यू के दौरान इजरायल के साथ संबधों को सामान्य करने के संकेत दिए हैं। अब्राहम अकॉर्ड में पाकिस्तान के शामिल होने के सवाल पर आसिफ ने कहा कि ऐसी कोई स्थिति आती है तो हम अपने फायदे को सबसे ऊपर रखते हुए सोचेंगे और इस पर फैसला लेंगे।

पाकिस्तान का बयान और अरब में खलबली

ख्वाजा आसिफ के इस बयान के बाद अरब देशों की राजनीती में हलचल तेज़ हो गयी है। इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान वह ईरान के समर्थन में मुस्लिम देशों को एकजुट होने की अपील कर रहे थे। लेकिन उनके इस बयां खेल ही पलट कर रख दिया है। उनके इस बयान के बाद अब यह देखना दिलचस्प होता है की क्या पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होगा? और अगर वह दक्षिणपंथी सरकार को खुश करने के लिए यह कदम उठता है तो क्या वो बाकि के अपने मुस्लिम मित्र देशों से दुश्मनी की शुरूआत करेगा?

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में बताएं।

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