SC Bihar SIR Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने SIR को संवैधानिक ठहराया, फिर भी विपक्ष क्यों मान रहा इसे अपनी जीत?
Supreme Court Bihar SIR Verdict: ECI द्वारा वोटर लिस्ट शुद्धीकरण के लिए चलाए जा रहे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) अभियान पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद देश का सियासी पारा पूरी तरह चढ़ गया है। SC ने EVM विवाद के बाद इस मुद्दे पर भी विपक्ष को बड़ा झटका देते हुए 'SIR' की संवैधानिक वैधता पर अपनी मुहर लगा दी है, वहीं विपक्षी दलों ने इस फैसले के भीतर छिपे तकनीकी कानूनी मोर्चों पर अपनी नई घेराबंदी शुरू कर दी है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ पर अंतिम फैसले दिए जाने के तुरंत बाद, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ सांसद और देश के जाने-माने अधिवक्ता कल्याण बनर्जी (Kalyan Banerjee) ने इस पर अपनी पहली कानूनी प्रतिक्रिया दी है।

उन्होंने साफ किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 'SIR' को भले ही संवैधानिक माना हो, लेकिन कानूनी सुरक्षा को लेकर चुनाव आयोग के हाथ भी बांधे हैं, जिससे पश्चिम बंगाल का केस अभी भी खुला हुआ है।
Kalyan Banerjee Reaction Supreme Court SIR Verdict: फैसला केवल बिहार पर लागू, बंगाल का मामला अलग- कल्याण बनर्जी
सुप्रीम कोर्ट से याचिकाएं खारिज होने के बाद भी विपक्षी खेमा इस फैसले को अपनी आंशिक जीत के रूप में देख रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता और टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने फैसले की बारीक कानूनी व्याख्या करते हुए मीडिया के सामने एक बड़ा बयान दिया।
कल्याण बनर्जी ने कहा-"सुप्रीम कोर्ट ने जो न्याय दिया है, वह पूरी तरह से बिहार के मामले और वहां के घटनाक्रमों पर आधारित है। यह पूरे भारत (All-India) पर एक समान रूप से लागू नहीं होता है। इस फैसले में कोर्ट ने माना है कि बिहार के मामले में चुनाव आयोग द्वारा प्रदान किए गए सुरक्षा उपाय (Safeguards) पर्याप्त थे। लेकिन, कोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण बात कही है, जो हमारे पक्ष को मजबूत करती है।"
Bihar SIR पर CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?
फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या चुनाव आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है? क्या SIR के तहत की जा रही जांच एक वैध उद्देश्य पर आधारित है? और क्या इसके लिए अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अनुरूप है?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि SIR प्रक्रिया का सीधा संबंध स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत SIR का अधिकार है। इसलिए SIR को केवल इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि इसकी प्रक्रिया सामान्य वोटर लिस्ट संशोधन से अलग है।
हालांकि, शीर्ष अदालत के फैसले की सबसे अहम बात नागरिकता को लेकर रही। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। अगर किसी व्यक्ति का नाम नागरिकता पर संदेह के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो उस मामले को नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास भेजना होगा।
नागरिकता तय करने पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
कल्याण बनर्जी ने फैसले के उस हिस्से को बताया जहां सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के कार्यक्षेत्र की लक्ष्मण रेखा तय की है। बनर्जी के अनुसार, कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि:
चुनाव आयोग के पास अधिकार नहीं: ECI के पास यह तय करने का कोई कानूनी या संवैधानिक अधिकार नहीं है कि कौन भारत का नागरिक है और कौन नहीं।
सम्बन्धित अथॉरिटी को भेजें मामला: यदि चुनाव आयोग ने 'नागरिकता' के संदेह के आधार पर किसी भी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से काटा है, तो आयोग को वह मामला तुरंत नागरिकता अधिनियम (Citizenship Act) के तहत गठित उपयुक्त प्राधिकारी (Appropriate Authority) के पास भेजना होगा।
अंतिम निर्णय नागरिकता बोर्ड ही यह तय करेगा कि संबंधित व्यक्ति नागरिक है या गैर-नागरिक। यदि वह नागरिक पाया जाता है, तो उसका नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल करना होगा।
विपक्ष क्यों मान रहा अपनी जीत?
कल्याण बनर्जी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा,-हम लंबे समय से यही कह रहे थे कि केंद्र सरकार या पुलिस के पास सीधे तौर पर यह तय करने की शक्ति नहीं है। जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है, हमारा मामला बिहार से पूरी तरह अलग है।
बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा बड़े पैमाने पर Logical Discrepancies और प्रोसीजर कमियां हैं। हालांकि सिद्धांत रूप में सुप्रीम कोर्ट ने 'SIR' को संवैधानिक माना है, लेकिन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को लेकर कोर्ट ने जो कड़े निर्देश दिए हैं, वे हमारे केस को मजबूत करेंगे।
एक तरफ जहां चुनाव आयोग को यह बड़ी राहत मिली है कि उसके मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान को कानूनी वैधता मिल गई है, जिससे विपक्ष के 'बैकडोर एनआरसी' वाले नैरेटिव को झटका लगा है। दूसरी तरफ, कोर्ट ने चुनाव आयोग के हाथ यह कहकर बांध दिए हैं कि वह खुद किसी को 'विदेशी' घोषित कर उसका वोट नहीं काट सकता।














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