6th जेनरेशन फाइटर जेट बना रहे तीन दोस्त देशों को चाहिए पार्टनर, क्या सऊदी अरब के साथ भारत को होना चाहिए शामिल?
6th-Gen Fighter: भारत का सबसे बड़ा दुश्मन इस वक्त दो अलग अलग तरह के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को ऑपरेट कर रहा है और उसने छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। जाहिर तौर पर, ये अत्याधुनिक लड़ाकू विमान युद्ध में गेमचेंजर साबित होंगे।
लेकिन, भारत के पास अभी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान नहीं हैं और जो भी भारतीय प्रोजेक्ट्स हैं, खासकर एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) प्रोजेक्ट के फाइनल होने में अभी कम से कम 7 से 10 सालों का वक्त लगने वाला है। वहीं, ऐसे प्रोजेक्ट्स में इतनी ज्यादा लागत होती है, कि विकासशील देशों के लिए अपने दम पर ऐसा करना अत्यधिक मुश्किल होता है।

लेकिन, भारत के लिए एक अच्छी खबर है, वो भी पांचवीं नहीं, बल्कि छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को लेकर।
खबर ये है, कि इटली ने जैसे ही ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) संधि की पुष्टि की, उसके ठीक एक हफ्ते के बाद जापान, यूके और इटली के नेताओं ने 19 नवंबर को छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने के अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों को शामिल करने की संभावना तलाशने के लिए बैठक की। इस बैठक का मकसद ये था, कि इस प्रोजेक्ट में और देशों को शामिल किया जाए, और विमान के निर्माण का खर्च सभी देश मिलकर उठाएं।
GCAP को साल 2022 में बनाया गया था, जिसमें यूके, जापान और इटली शामिल हैं। इस कार्यक्रम का मकसद अगली पीढ़ी के चालक दल वाले लड़ाकू विमान को डिजाइन करना, उनका निर्माण करना और निर्माण होने के बाद उनका निर्यात करना है।
इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी, जापानी प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने मौजूदा साझेदारी को बढ़ाने के लिए अपने समर्पण को दोहराते हुए कार्यक्रम पर प्रगति में तेजी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह बैठक ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई, जो इस प्रोजेक्ट के लिए काफी महत्वपूर्ण क्षण था।
बैठक के बाज जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया, "वे परियोजना को तेजी से आगे बढ़ाने के महत्व पर सहमत हुए हैं और चल रहे सहयोग को और मजबूत करने के अपने साझा इरादे की पुष्टि की।" ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टारमर ने तीनों की "भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों की व्यापक श्रेणी में भागीदारी को व्यापक बनाने की महत्वाकांक्षा" पर प्रकाश डाला। हालांकि, किन देशों को शामिल किया जाएगा, उनकी भूमिका क्या होगा, उन जानकारियों का फिलहाल खुलासा नहीं किया गया है।
इस बैठक में GCAP का विस्तार कर अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठन (GIGO) के निर्माण पर बात की गई है, जिसका काम अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के डेवलपमेंट और टेक्नोलॉजी का मैनेजमेंट करना है। 20 नवंबर के संयुक्त बयान के मुताबिक, मल्टी-बिलियन डॉलर के इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए एक कंपनी स्थापित करने के लिए एक ज्वाइंट वेंचर समझौते पर "जल्द ही" हस्ताक्षर किए जाने की उम्मीद है।
प्रोजेक्ट में कौन कौन सी कंपनियां होंगी शामिल?
जापान की मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज, इटली की लियोनार्डो और ब्रिटेन की बीएई सिस्टम्स सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व करेंगी। एडवांस लड़ाकू विमानों के निर्माण की मुश्किलों को देखते हुए, इस कार्यक्रम में एक जटिल ग्लोबल सप्लाई चेन शामिल होगी। जापानी प्रधानमंत्री इशिबा ने GCAP के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए इसे "आने वाले दशकों में तीनों देशों के बीच व्यापक सहयोग की आधारशिला" बताया।
कौन से देश GCAP में शामिल हो सकते हैं?
ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) में कौन से देश शामिल हो सकते हैं, इस बारे में फिलहाल कोई और जानकारी नहीं दी गई है। स्वीडन, जो कभी ब्रिटिश नेतृत्व वाली पहल में भागीदार था, उसने नवंबर 2023 तक औपचारिक रूप से खुद को अलग कर लिया।
नवंबर 2023 में, स्वीडिश सरकार ने अपने फैसले की पुष्टि की थी और कहा था, कि "स्वीडन पुष्टि करता है कि टेम्पेस्ट में भागीदारी अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई है। हम लगभग एक साल पहले यूके और इटली के साथ त्रिपक्षीय स्टडी से अलग हो गए और मैं इस सवाल का जवाब नहीं दूंगा, कि यह यूके और FCAS के साथ क्यों काम नहीं कर पाया।"
स्वीडन ने अपनी अगली पीढ़ी की लड़ाकू क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र रास्ते तलाशने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।
इस बीच, सऊदी अरब इस कार्यक्रम के लिए एक संभावित उम्मीदवार के रूप में उभरा है, जिसकी दिलचस्पी 2023 से इस प्रोजेक्ट में बढ़ रही है। मार्च 2023 में सऊदी अरब ने समय से पहले GCAP में अपनी भागीदारी की घोषणा की थी और ये एक ऐसा दावा था, जिसे बाद में यूके ने वापस ले लिया। इस गलत कदम के बावजूद, चल रही चर्चाओं के संकेत मिले हैं, कि सऊदी को इसमें शामिल किया जा सकता है।
सितंबर 2023 में, एक ब्रिटिश अधिकारी ने सऊदी अरब के आखिरकार इस कार्यक्रम में शामिल होने के बारे में आशा जताते हुए कहा, कि "मुझे लगता है, ब्रिटेन के नजरिए से हमें उम्मीद है, कि हम इसी दिशा में आगे बढ़ेंगे।"
हालांकि, सऊदी अरब के शामिल होने का रास्ता अनिश्चित बना हुआ है। जापान ने कथित तौर पर सऊदी अरब के शामिल होने का विरोध किया है, और किसी भी नए भागीदार के लिए तीन मौजूदा सदस्यों- ब्रिटेन, जापान और इटली- की सर्वसम्मति से मंजूरी की जरूरत पर जोर दिया है।
सऊदी अरब के GCAP में शामिल होने की संभावना ने यूके-सऊदी संबंधों को मजबूत किया है, जबकि कुछ आलोचकों ने सऊदी अरब के मानवाधिकार रिकॉर्ड के बारे में चिंता जताई है, लेकिन यूके ने रियाद के साथ अपने दशकों पुराने रक्षा संबंधों का बचाव किया है।
दिसंबर 2023 में, तत्कालीन यूके रक्षा सचिव ग्रांट शैप्स ने इस संबंध की गहराई पर प्रकाश डालते हुए कहा था, कि "यूके का सऊदी के साथ रक्षा संबंध बहुत गहरा है और कई दशकों पुराना है।" फिर भी इस प्रोजेक्ट के लिए बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई है। सऊदी अरब ने कहा है कि वह रक्षा लेनदेन को तब तक आगे नहीं बढ़ाएगा, जब तक कि उनमें स्थानीय उत्पादन और डेवलपमेंट शामिल न हो।
लेकिन, यूनाइटेड किंगडम विमान का निर्माण और डेपलपमेंट अपने देश में चाहता है, क्योंकि टेक्नोलॉजी सपोर्ट उसके पास है और सऊदी अधिकारियों ने कहा है, कि अगर सऊदी अरब में निर्माण नहीं होता है, तो "ये प्रोजेक्ट हमारे लिए कोई मतलब नहीं रखता है।"
क्या जर्मनी हो सकता है प्रोजेक्ट में शामिल?
जर्मनी पहले भी ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) में संभावित भागीदारी के लिए एक अप्रत्याशित उम्मीदवार के रूप में उभरा है।
नवंबर 2023 में, यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था, कि जर्मनी अपने प्राथमिक भागीदार फ्रांस के साथ लगातार असहमति के कारण यूरोप की दूसरी बहुराष्ट्रीय छठी पीढ़ी के लड़ाकू परियोजना, फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हटने पर विचार कर सकता है।
बर्लिन और पेरिस के बीच तनाव, FCAS कार्यक्रम के लिए अलग-अलग प्राथमिकताओं और अलग अलग सोच से उपजा है, जिसे अपनी शुरुआत से ही कई देरी और फंडिंग विवादों का सामना करना पड़ा है। इस अटकल ने जर्मनी द्वारा GCAP पहल सहित एडवांस लड़ाकू विमान डेवलपमेंट के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने के बारे में चर्चाओं को हवा दी है।
अगर जर्मनी अपना रुख बदलता है और GCAP में शामिल होता है, तो यह कार्यक्रम के लिए एक परिवर्तनकारी पल होगा। जर्मनी के प्रवेश से औद्योगिक क्षमता, उन्नत तकनीक और वित्तीय संसाधन आ सकते हैं, जिससे GCAP के विकास को बढ़ावा मिलेगा और छठी पीढ़ी के प्रमुख लड़ाकू पहल के रूप में इसकी स्थिति में वृद्धि होगी।

क्या भारत को होना चाहिए प्रोजेक्ट में शामिल?
भारत के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू कार्यक्रम की धीमी प्रगति भविष्य में गतिशीलता को बदल सकती है, जिससे संभावित रूप से GCAP विकल्प पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। भारत स्थित जियो-पॉलिटिकल और डिफेंस एक्सपर्ट शशांक एस. पटेल ने यूरेशियन टाइम्स को बताया है, कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती 2030 से पहले एडवांस मीडियम लड़ाकू विमान (AMCA) का सफल घरेलू विकास है।
अपनी हवाई लड़ाकू क्षमताओं को एडवांस करने की तत्काल आवश्यकता के साथ, भारत विदेशी निर्माताओं से एडवांस लड़ाकू जेट खरीदने के लिए मजबूर है और ये एक ऐसा फैक्टर है, जो GCAP पहल में भारत के शामिल होने का रास्ता खोल सकता है।
उन्होंने कहा, "चूंकि GCAP के सदस्य विस्तार के लिए सहमत हो गए हैं, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है, कि भारत को इस छठी पीढ़ी के लड़ाकू जेट कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण मिलेगा। भारत के शामिल होने से परियोजना के पूरा होने में लगने वाला समय अगले दशक के मध्य में शुरू होने की योजना की तुलना में कुछ साल कम हो जाएगा। यह कोई हैरान करने वाली रक्षा पहेली नहीं है, कि भारत ऐसे प्रस्तावों पर विचार करने के लिए तैयार है, क्योंकि भारत-फ्रांस ने इस तरह की संयुक्त विकास पहल को आकार देने के लिए पहले भी इस तरह की बातचीत की है।"
पटेल ने तर्क दिया, "ऐसी अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजिकल इनिशिएटिव में शामिल होना भारतीय वायु क्षमताओं के पक्ष में है, जो पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की वर्तमान रोलिंग को बढ़ाएगा और साथ ही भविष्य के छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के देशों में भारत को शामिल करेगा। मूल बात यह है कि 'कितनी जल्दी और कब यह बहुराष्ट्रीय समूह ऐसे जेट विमानों को आगे बढ़ाने के लिए सुपरसोनिक 130kN+ थ्रस्ट क्लास इंजन विकसित करता है।"
भारत को क्यों चाहिए एडवांस फाइटर जेट्स?
भारत के सामने फिलहाल सबसे बड़ी मुश्किल भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान बेड़े की कम होती संख्या है। IAF के पास फिलहाल सिर्फ 31 स्क्वाड्रन ही बचे हैं, जबकि इसकी संख्या 42 होनी चाहिए। यानि, भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की संख्या में भारी कमी आ गई है।
भारतीय वायुसेना के लिए आधिकारिक तौर पर 42 स्क्वाड्रन निर्धारित की गई है, जिसका लक्ष्य भारत की सीमाओं पर रणनीतिक खतरे के स्तर को दर्शाना है। इसके अलावा, भारत सोवियत संघ के जमाने के मिग विमानों को अब बेड़े से बाहर कर रहा है, जिससे विमानों की संख्या और कम हो जाएगी, जिससे खतरा बढ़ता जा रहा है।
दूसरी बड़ी चुनौती ये है, कि भारतीय वायु सेना के मौजूदा अधिकारी हों, या रिटायर्ड अधिकारी, वो बार बार मध्यम बहु-भूमिका लड़ाकू विमान (MMRCA) की तत्काल खरीद पर जोर दे रहे हैं। अधिकारियों का कहना है, कि देरी, भारत की सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इस प्रोजेक्ट के तहत 114 लड़ाकू विमानों को खरीदना है, लेकिन भारत सरकार ने अभी तक उदासीन है, जिसकी वजह से भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन की संख्या में और गिरावट आएगी। वहीं, इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए, कि जब भारत सरकार ऑर्डर देगी, तो विमानों के बनकर आने में भी कम से कम 5 से 6 सालों का वक्त लगेगा।
इस बीच, चीन और पाकिस्तान जैसे भारत के विरोधी ए़डवांस लड़ाकू तकनीक विकसित कर रहे हैं। चीन अब दो स्टील्थ लड़ाकू विमानों को ऑपरेट करता है, जबकि पाकिस्तान चीन से J-35 स्टील्थ विमान हासिल करने की कोशिश कर रहा है।
लिहाजा, ब्रिटेन के नेतृत्व वाले छठी पीढ़ी के कार्यक्रम में शामिल होना भारत के लिए एक आकर्षक विकल्प बन सकता है। हालांकि, पटेल का ये भी कहना है, कि ऐसी संभावना है कि GCAP का अंतिम डिजाइन भारत की जरूरत से मैच ना करे, जिसे आने वाले वर्षों में स्वदेशी AMCA कार्यक्रम में शामिल कर बेहतर तरीके से संबोधित किया जा सकता है।
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