शैक्षिक यात्रा के लिए जापान रवाना हुए भारत के 64 छात्र, सकुरा साइंस हाई स्कूल प्रोग्राम में होंगे शामिल
वैज्ञानिक जिज्ञासा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की दिशा में 64 भारतीय छात्र जापान यात्रा के लिए रवाना हो गए हैं। ये जापान एशिया यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए चुने गए हैं। इसे विज्ञान में सकुरा एक्सचेंज प्रोग्राम के रूप में भी जाना जाता है।
स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के सचिव, संजय कुमार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए जापान में सकुरा साइंस हाई स्कूल कार्यक्रम 2023 में भाग लेने के लिए चुने गए 64 छात्रों को औपचारिक रूप से हरी झंडी दिखाई।

सीआईईटी-एनसीईआरटी द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम 10-16 दिसंबर तक चलेगा। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए 11 राज्यों के छात्र चुने गए हैं। इसमें असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पंजाब, ओडिशा, लद्दाख, उत्तर प्रदेश और गोवा से केंद्रीय विद्यालयों (केवीएस) और नवोदय विद्यालय समितियों (एनवीएस) के छात्र चुने गए हैं।
जापान रवाना होने वाले 64 छात्रों में से 26 लड़कें और 38 लड़कियों के विविध समूह को उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर चुना गया है।
सकुरा साइंस हाई स्कूल कार्यक्रम, जापान विज्ञान और प्रौद्योगिकी एजेंसी (जेएसटी) और स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसई एंड एल), शिक्षा मंत्रालय के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास का उद्देश्य युवा शिक्षार्थियों के बौद्धिक क्षितिज को व्यापक बनाना है।
2014 में अपनी शुरुआत के बाद से, इस कार्यक्रम ने छात्रों को अल्पकालिक यात्राओं के माध्यम से जापान के अत्याधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और संस्कृति का अनुभव करने का अनूठा अवसर प्रदान किया है।
शिक्षा मंत्रालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुरूप है, जो समग्र, एकीकृत, आनंददायक और आकर्षक सीखने के अनुभवों पर जोर देती है।
क्या है एनईपी
एनईपी एक मानक शिक्षाशास्त्र के रूप में अनुभवात्मक शिक्षा को प्रोत्साहित करता है, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और तकनीकी महत्व के स्थानों पर शैक्षिक यात्राओं और भ्रमण पर जोर देता है।
सकुरा साइंस हाई स्कूल कार्यक्रम में भारत की भागीदारी अप्रैल 2016 में शुरू हुई। अब तक इस कार्यक्रम के तहत 468 छात्र और 75 पर्यवेक्षक जापान का दौरा कर चुके हैं।
इस यात्रा का उद्देश्य न केवल छात्रों को जापान की प्रगति से अवगत कराना है, बल्कि अंतर-सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा देना और वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए जुनून को प्रोत्साहित करना भी है।












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