3 देशों ने रूस को दिए, तो दक्षिण अफ्रीका ने खुद नष्ट कर डाला अपना एटमी हथियार, क्या थी इसकी वजह?
1993 तक अमेरिका और रूस के बाद सबसे अधिक परमाणु हथियार यूक्रेन के पास थे। लेकिन बेहतर रिश्तों की चाह और संयुक्त राष्ट्र के भरोसे में आकर यूक्रेन ने एटमी हथियार का सारा जखीरा रूस को दे दिया।

Image: Oneindia
दुनिया के 9 देशों के पास परमाणु हथियार हैं। इजरायल भी वह देश है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसके पास परमाणु हथियार है। खास बात यह है कि इजरायल ने कभी सार्वजनिक तौर पर यह नहीं माना है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं।
हालांकि इजरायल ने कभी कहा भी नहीं है कि उसके पास परमाणु हथियार नहीं है। इस बीच पहली बार इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री ने ये चौकाने वाला खुलासा किया है कि उनके देश के पास एटम बम है।
एहुद बराक ने सोशल मीडिया पर हिब्रू भाषा में ट्वीट कर लिखा है कि यदि इजरायल में तानाशाही आती है तो इसका असर अरब दुनिया और इजरायल के परमाणु हथियारों पर भी पड़ेगा। हालांकि गलती का आभास होते ही उन्होंने ये अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।
ऐसे वक्त में जब दुनिया एक बार फिर से दो पक्षों में बंटी हुई है, फिर से परमाणु हथियारों की चर्चा छिड़ गई है। जहां हर देश चाहता है कि उसके पास 'अपना' परमाणु हथियार हो, दुनिया में 4 ऐसे देश हैं जिन्होंने परमाणु हथियारों से मोह छोड़ दिया था।
यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान 3 ऐसे देश थे जिन्हें परमाणु हथियार विरासत में मिले। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ ने एटम बम और उन्हें ढोने वाली मिसाइलें इन देशों में तैनात की थीं। लेकिन दो वजहों से इन देशों को अपने परमाणु हथियारों को रूस को सौंपना पड़ा।
सोवियत संघ के सदस्य रहे ये देश आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हो चुके थे। उन्हें पश्चिम के आर्थिक व कारोबारी सहयोग की जरूरत थी और बदले में शांति व लोकतंत्र का रास्ता चुनना था। इसके अलावा इन देशों के पास नियंत्रण और रखरखाव के साधन भी नहीं थे।
यही वजह थी कि इन देशों ने रूस को ये हथियार सौंप देना उचित समझा। हालांकि इस दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भरोसा दिलाते हुए ये कहा था कि परमाणु हथियारों वाला कोई देश यूक्रेन, बेलारूस और कजाखस्तान के लिए खतरा बनेगा तो वे इन देशों की मदद करेगी।
हालांकि ये सिर्फ एक मेमोरंडम था। इन देशों ने इसे उस वक्त संधि में बदलना शायद जरूरी नहीं समझा। संयुक्त राष्ट्र के भरोसे इन देशों ने अपने हथियार रूस को सौंप दिए। आज यूक्रेन संयुक्त राष्ट्र के उस भरोसे पर यकीन करने की कीमत चुका रहा है।
इन तीनों देशों के अलावा दक्षिण अफ्रीका एक ऐसा देश था जिसने खुद ही अपने सारे परमाणु हथियार नष्ट कर डाले। शीत युद्ध के वक्त दक्षिण अफ्रीका का लगा कि उसे एटमिक हथियारों की जरूरत पड़ सकती है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर द. अफ्रीका अलग-थलग पड़ा हुआ था।
रंगभेद की नीति की वजह से द. अफ्रीका पर कई प्रतिबंध लगाए जा चुके थे। जिनमें हथियार खरीदने पर लगे प्रतिबंध भी शामिल थे। ऐसे में उसे आपातकालीन स्थिति में द. अफ्रीका किसी विदेशी मदद के भरोसे नहीं रह सकता था।
ऐसी स्थिति से निपटने के लिए द. अफ्रीका ने पहला परमाणु बम 1982 में बना लिया। राष्ट्रपति डी क्लार्क ने 2017 में एक पत्रिका द एटलांटिक में खुलासा किया था। उन्होंने कहा कि किसी को देश में पता नहीं था कि वे परमाणु हथियार बना रहे हैं।
जब वे 1980 में खनिज और ऊर्जा मामलों के मंत्री बने तो पहली बार उन्हें इसकी सूचना दी गई। और कुछ सालों बाद जब वे राष्ट्रपति बने तब तक द. अफ्रीका के पास 6 परमाणु बम बनकर तैयार हो चुके थे और सातंवे पर काम चल रहा था।
डी क्लार्क ने कहा कि 90 के दौर में बर्लिन की दीवार के गिरने और यूएसएसआर के टूटने के साथ, सोवियत कम्युनिस्ट विस्तारवाद का खतरा दूर हो गया था। नामीबिया स्वतंत्र हो गया था। और अंगोला में शांति सेना समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके थे।
क्यूबा से सैनिकों को वापस बुलाया जा चुका था। द. अफ्रीका की घरेलू राजनीति भी बदल रही थी। ऐसे में परमाणु बम रखने के अपने खतरे थे। दुनिया शांत हो चुकी थी। और अपने ही देश में परमाणु बम गिराने का कोई मतलब नहीं था।
ऐसा भी कहा जाता है कि डी क्लार्क को अंदाजा लग चुका था कि अब द. अफ्रीका में अश्वेतों का राज आने वाला है। वे नहीं चाहते थे कि मंडेला के हाथों में परमाणु हथियार की चाभी हो। ऐसे में उन्होंने खुद ही इसे नष्ट करने का फैसला लिया।
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