इटली में मिलीं 18वीं शताब्दी की तमिल पांडुलिपियां, भारतीय एक्सपर्ट ने खोल दिए उसके राज
उत्तरी इटली के अर्मेनियाई मठ में 18 शताब्दी की कुछ पांडुलिपियां रखी गई हैं। उन पर काफी रिसर्च हुई, लेकिन किसी को वो समझ में नहीं आई। अब भारत के एक एक्सपर्ट ने उसके रहस्य से पर्दा उठाया है। साथ ही दुनिया को बताया कि वो 18वीं शताब्दी की तमिल पांडुलिपियां हैं।
दरअसल तमिल भारतन दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में विशेष तमिल अध्ययन केंद्र के डॉक्टरेट एक्सपर्ट हैं। हाल ही में उनको उत्तरी इटली के मठ में रखी पांडुलिपियों को देखने की अनुमति मिली। जिस पर उन्होंने उसको समझा और दुनिया को उसके बारे में बताया।

भारतन के मुताबिक उन्होंने कई दिनों तक उन पांडुलिपियों तक पहुंच के लिए इटली के अधिकारियों से निवेदन किया, तब जाकर उनको इसकी इजाजत मिली। वो हाल ही में वेनिस आयोजित एक सेमिनार में गए थे। वहां से वो उत्तरी इटली के मठ चले गए।
वहां पर पहुंचने के बाद भारतन ने मार्गेरिटा ट्रेंटो से मदद मांगी, जो एक प्रोफेसर हैं। उन्होंने रोमन कैथोलिकों और तमिलनाडु में ईसाई धर्म की स्थापन पर काफी रिसर्च की है। ट्रेंटो का मानना है कि ये तमिल में इग्नाटियस के आध्यात्मिक अभ्यास के पहले अनुवाद की एक प्रति हो सकती है।
भारतन के मुताबिक लाइब्रेरी ने पांडुलिपियों को 'इंडियन पेपिरस लैमुलिक लैंग्वेज-XIII सेंचुरी' के नाम से रखा तो था, लेकिन उनको ये नहीं पता था कि वो तमिल भाषा है। मठ का मानना है कि चेन्नई में अर्मेनियाई लोग पांडुलिपियों को इटली ले गए होंगे। यहां आपको ये भी बताना जरूरी है कि तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है।
फिलहाल अच्छी बात ये है कि भारतन ने पांडुलिपियों को सूचीबद्ध करने का काम अपने हाथ में ले लिया है। वो जल्द ही चेन्नई में रोजा मुथैया लाइब्रेरी आगे की रिसर्च के लिए जाएंगे।
इस खोज से क्या फायदा?
ये ताड़ पांडुलिपियां ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज्ञान को संरक्षित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वे उस समयावधि के बारे में बहुत सारी जानकारी देंगी। साथ ही बताएंगी कि उस दौर में सामाजिक, साहित्यिक और धार्मिक प्रथाएं क्या-क्या थीं।












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