यशवंत सिन्हा ने साधा रंजन गोगोई पर निशाना, कहा- स्वतंत्र न्यायपालिका के ताबूत में आखिरी कील ठोकी
नई दिल्ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देश के पूर्व न्यायाधीश रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है। इसके बाद से ही कई विपक्षी पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। अब भाजपा का हिस्सा रहे और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने रंजन गोगोई पर तंज कसा है। उन्होंने कहा है कि गोगोई ने ये ऑफर स्वीकार करके न्यायपालिका की ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी जिक्र किया
यशवंत सिन्हा ने इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी जिक्र किया है। उन्होंने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर कहा, 'राज्यसभा नामांकन स्वीकार करके रंजन गोगोई ने भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है। शर्म करो शर्म। मोदी है तो संभव है।' इससे पहले भी उन्होंने इस मामले पर ट्वीट किया था।

एक दिन पहले भी किया था ट्वीट
उन्होंने एक दिन पहले इस मामले पर ट्वीट कर कहा, 'मुझे उम्मीद है कि पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई राज्यसभा सीट के लिए 'न' कहने की समझ रखते हैं। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं, तो वह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को बेहिसाब नुकसान पहुंचाएंगे।' बता दें कभी खुद भाजपा का हिस्सा रहे यशवंत सिन्हा अब नरेंद्र मोदी सरकार के कड़े आलोचक बन गए हैं। वह दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वित्त मंत्री और विदेश मंत्री थे। राजनीति में लंबा समय गुजारने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति को कुछ समय पहले ही अलविदा कह दिया था।
कांग्रेस ने भी किया विरोध
वहीं रंजन गोगोई को राज्यसभ सीट पर नामित करने पर और भी कई नेता उनकी आलोचना कर रहे हैं। इस मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने ट्वीट करते हुए कहा, 'न्यायमूर्ति एच आर खन्ना अपनी ईमानदारी, सरकार के सामने खड़े होने और कानून का शासन बरकरार रखने के लिए याद किए जाते हैं।' सिब्बल ने आगे लिखा, 'न्यायमूर्ति रंजन गोगोई राज्यसभा जाने की खातिर सरकार के साथ खड़े होने और सरकार एवं खुद की ईमानदारी के साथ समझौता करने के लिए याद किए जाएंगे।'

ओवैसी ने उठाए सवाल
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किए जाने पर सवाल उठाए हैं। ओवैसी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया है। इसमें उन्होंने लिखा, 'क्या ये की गई मदद का ईनाम है? लोगों को जजों की स्वतंत्रता पर भरोसा कैसे रहेगा? बहुत से सवाल हैं।'












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