आश्चर्य नहीं होगा अगर हिंदुत्व को लेकर कल शिवसेना में दो फाड़ हो जाए!
बेंगलुरू। महाराष्ट्र में 28 नवंबर शाम 6:40 बजे नई सरकार का शपथ ग्रहण होने जा रहा है। नए सरकार के मुखिया बनने जा रहे शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र की सत्ता के लिए करीब 44 वर्ष पुरानी पार्टी शिवसेना के विचारधारा से न केवल समझौता करना पड़ा है बल्कि धुर विरोधी कांग्रेस के साथ गलबहियां भी करनी पड़ी है। शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे महाराष्ट्र में कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करते थे और महाराष्ट्र में उनकी भूमिका किंगमेकर के रूप में मानी जाती थी।

पिछले 4 दशकों से महाराष्ट्र में कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करने वाली शिवसेना का बदला हुआ रूप और रंग शिवसेना से जुड़े एक आम कार्यकर्ताओं को बिल्कुल नहीं सुहा रहा है, क्योंकि जो कार्यकर्ता कल सड़कों पर पर हिंदुत्व की राजनीति करते थे अब उन्हें कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन वाली सरकार के चलते कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के अनुसार राजनीति करने के लिए विवश होना पड़ेगा। यही कारण है कि धीरे-धीरे ही सही शिवसेना में नई तरह की राजनीति के खिलाफ विरोध शुरू हो गया है।

इसकी तस्दीक शिवसेना नेता और आईटी सेल के सरंक्षक रमेश सोलंकी के इस्तीफ से किया जा सकता है। रमेश सोलंकी के मौजूदा गठबंधन सरकार के प्रति नाराजगी जताते हुए शिवसेना से इस्तीफा दिया है। उन्होंने अपनी नाराजगी बाकायदा ट्विटर पर जाहिर करते हुए लिखा है कि जो श्रीराम का नहीं, वो मेरे काम का नहीं। सोलंकी शिवसेना के फैसले से इतने आहत थे कि इस्तीफे के बाद उन्होंने एक के बाद एक कुल 9 ट्विट किए।

रमेश सोलंकी ने ट्वीट करके आगे लिखा, 'यह कहावत है, जब जहाज डूबता है तो सबसे पहले चूहे कूदकर भागते हैं, लेकिन मैं पार्टी की जीत के मौके पर उसे छोड़ रहा हूं। सोलंकी ने लिखा कि मैं पार्टी उस वक्त छोड़ रहा हूं जब शिवसेना मजबूत स्थिति में है और महराष्ट्र में सरकार का गठन कर रही है मैं पार्टी से बड़े गर्व के साथ एक शिवसैनिक के तौर पर अलग हो रहा हूं, मैं अपने सिद्धांतों और उसूलों पर पार्टी से अलग हो रहा हूं।
अगले ट्विट में सोलंकी लिखते हैं, 'पिछले कुछ दिनों से लोग मुझसे मेरे पक्ष के बारे में पूछ रहे हैं। मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं, जो श्रीराम का नहीं है (कांग्रेस) वो मेरे किसी का काम का नहीं है। सोलंकी शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे के निर्णयों से इतने आहत थे कि उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट एक साथ किए।

अगले ट्वीट में सोलंकी ने कांग्रेस पर सीधा निशाना साधते हुए लिखा कि कांग्रेस हिंदुवादी विचारधारा के नहीं हैं, लेकिन शिवसेना ने सत्ता हासिल करने के लिए उनसे हाथ मिलाया है। सोलंकी हालांकि शिवसेना के बड़े नेता नहीं है, लेकिन सोलंकी पिछले 21 साल से शिवसेना के साथ है इसलिए उनके द्वारा शिवसेना छोड़ने से शिवसेना के खिलाफ माहौल जरूर बन गया है।

माना जा रहा है कि शिवसेना को वोट करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग शिवसेना के पाला बदलने से नाराज है। नाराज शिवसैनिकों को यह बात सबसे बुरी लगी होगी जब मुंबई के हयात होटल में सजाई गई मिनी असेंबली में कांग्रेस अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम लेकर शिवसेना के विधायकों को शपथ दिलवाए गए, क्योंकि शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे और सोनिया गांधी के बीच छत्तीस का आंकड़ा था, लेकिन शिवसैनिक सत्ता के लिए हयात होटल में सोनिया गांधी की कसम खा रहे थे, जिनके हमेशा खिलाफ बालासाहेब ठाकरे बयानबाजी करते रहे।

गौरतलब है बालासाहेब ठाकरे ने वर्ष 2004 लोकसभा चुनाव के बाद सोनिया गांधी को यूपीए का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध किया था। वर्तमान में महाराष्ट्र में चौथे नंबर की पार्टी महाराष्ट्र ही नहीं, देश की राजनीति में मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुकी है और शिवसेना चीफ सत्ता के लिए पार्टी के मूल विचारों को छोड़कर कांग्रेस के साथ सरकार बनाने जा रहे हैं।
शिवसेना कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की वजहें कुछ भी हों, लेकिन शिवसैनिकों को यह बात बुरी लग रही है कि जिन सिद्धांतों को लेकर पार्टी आगे बढ़ी और राजनीति में शिखर पहुंची, सिर्फ सत्ता के लिए वह अब अपने मूल सिद्धांतों के साथ समझौता कर बैठी है। यह बात शिवैसनिक ही कहते तो बड़ी नहीं थी, क्योंकि महाराष्ट्र में बेमेल गठबंधन सरकार के खिलाफ पार्टी के बाहर भी आलोचना हो रही है।

चुनाव विश्लेषक और पूर्व आम आदमी पार्टी नेता योगेंद्र यादव ने भी ट्वीट करके लिखा है कि महाराष्ट्र में जनादेश की डकैती असफल होने का जश्न जरूर मनाएं लेकिन चोरी से भी आंखे न मूंदे। उन्होंने आगे लिखा है कि अगर भाजपा व अजित पवार की सरकार अनैतिक और असंवैधानिक थी तो क्या सेना-कांग्रेस-एनसीपी की सरकार नैतिक है। योगेंद्र यादव ने महाराष्ट्र में निर्मित मौजूदा गठबंधन पर भी सवाल खड़ा करते हुए लिखा है कि यह प्रदेश की सबसे निकम्मी और भ्रष्ट सरकार साबित हो सकती है।

उल्लेखनीय है 12 नवंबर को जब महाराष्ट्र में सरकार गठन की अनिश्चिचता के बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने महाराष्ट्र मे राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी। तो उसके एक दिन बाद यानी 13 नवंबर को सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा था, जिसमें एक युवक शिवसेना से एनसीपी-कांग्रेस से गठबंधन नहीं करने की अपील कर रहा था।
वायरल वीडियो के मुताबिक युवक नंदुरबार जिले के करली गांव का था। वर्ष 2003 से 2013 में शिवसेना के वर्कर के रूप में कार्य करने वाले शिवसैनिक ने मोबाइल टॉवर पर चढ़कर शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे से अनुरोध कर रहा था कि वो एनसीपी-कांग्रेस के साथ गठबंधन न करें। उसने शिवसेना को बीजेपी के साथ ही गठबंधन में रहने की सलाह दी थी। हालांकि यह वीडियो कब का था, यह स्पष्ट नहीं हो सका था।

साफ है शिवसैनिक दबे मन से शिवसेना के एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन वाली सरकार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे की जिद के चलते सभी चुप है, लेकिन यह चुप्पी कब बनी रहेगी, यह अगले एक दो महीने में तय हो जाएगा, क्योंकि शिवसेना-कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन के सीएम भले ही उद्धव ठाकरे नियुक्त हुए हैं, लेकिन सरकार की सत्ता की असली चाभी एनसीपी चीफ शरद पवार के हाथों में हैं।

इसलिए यह माना जा सकता है कि महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार एनसीपी चीफ शरद पवार रिमोट कंट्रोल से चलाएंगे और उद्धव ठाकरे सिर्फ चेहरा होंगे। वैसे भी उद्धव ठाकरे को सरकार चलाने का अनुभव भी नहीं हैं, जिसका फायदा एनसीपी चीफ बखूबी उठाएंगे।
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महाराष्ट्र में 5 फीसदी मुस्लिम आरक्षण के लिए तैयार हुई शिवसेना
कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करती आयी शिवसेना के लिए अब महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन सरकार में शामिल होने के बाद मुस्लिम हितों के मसले पर समझौता करना काफी मुश्किल हो गया है। यही कारण है कि नई सरकार के गठन से पहले ही शिवसेना शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिमों को 5 फीसदी आरक्षण देने पर राजी हो गयी है। ये शिवसेना का पीछे हटने का बड़ा कदम है। महाराष्ट्र में मुस्लिमों के शिक्षा में आरक्षण देने की ये योजना कांग्रेस-एनसीपी की पिछली सरकार के दौरान शुरू हुई थी, लेकिन बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की सरकार आने के बाद ये स्कीम खटाई में पड़ गयी।

वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग वापस लेगी शिवसेना
बीजेपी को काउंटर करने के मकसद से शिवसेना ने विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग रखी थी। बीजेपी ने तो सरकार बनने पर ऐसा करने का वादा भी कर रखा था। ये मसला भी शिवसेना की तरफ से बड़ा समझौता है क्योंकि वो काफी हद तक मान गयी है कि सावरकर को भारत रत्न देने की जिद छोड़ देगी।

शरद पवार के हाथों में होगा महाराष्ट्र के सीएम का रिमोट कंट्रोल
अब तो सब साफ साफ नजर आ रहा है कि महाराष्ट्र की हालिया सियासत में किसकी की सबसे ज्यादा चल रही है। शिवसेना वही कर रही है जो शरद पवार कह रहे हैं। कांग्रेस भी शरद पवार के बताये रास्ते पर ही बढ़ रही है। जब शरद पवार कांग्रेस कहते हैं रुक जाओ तो रुक जाती है, और जब चलने को कहते हैं तो चल देती है।

गठबंधन सरकार के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम से हिंदुत्व गायब
महाराष्ट्र में सरकार चलाने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम (CMP) का जो ड्राफ्ट तैयार हुआ है, उसमें 40 बिंदुओं पर सहमति बनी है। खास बात ये है कि इसमें तीनों पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल मुद्दों को ही तरजीह दी गई है। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में शिवसेना के हिन्दुत्व पॉलिटिक्स को नहीं दी गई है तरजीह।












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