Women's Day: मिलिए उन अफसरों से, सशस्त्र सेनाओं में जिन्होंने खोली महिलाओं की राह

नई दिल्‍ली। आज रोजाना सेनाओं में किसी न किसी लेडी ऑफिसर को कोई न कोई मुकाम हासिल होता है। वह मुकाम उस ऑफिसर के लिए और पूरे देश के लिए गौरव की बात होती है। आज महिला दिवस के मौके पर उन लेडी ऑफिसर्स के बारे में भी बात करते हैं जिन्‍होंने इन तमाम महिलाओं के लिए रास्‍ते खोले। ऐसी ऑफिसर्स जिन्‍होंने उस समय एक नया इतिहास रचा, जब देश में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए बस बातें ही होती थीं। चलिए इस वीमेंस डे पर आपको मिलवाते हैं, उन ऑफिसर्स से जिन्‍होंने आने वाली पीढ़‍ियों का सफर आसान किया था।

सेना पदक वाली ले. कर्नल मिताली

सेना पदक वाली ले. कर्नल मिताली

लेफ्टिनेंट कर्नल मिताली मधुमिता, भारतीय सेना की पहली महिला अधिकारी हैं जिन्हें बहादुरी पुरस्कार से सम्‍मानित किया गया है। 26 फरवरी, 2010 को मिताली, अफगानिस्‍तान के काबुल में तैनात थीं कि आतंकियों ने भारतीय दूतावास पर हमला बोल दिया था। इस हमले के दौरान दिखाए गए उनके अदम्‍स साहस के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल मिताली मधुमिता को साल 2011 में सेना पदक से सम्‍मानित किया गया था। लेफ्टिनेंट कर्नल ने भारतीय दूतावास में कई घायल नागरिकों और अपने सैन्‍य साथियों को मलबे से बचाया था। साल 2010 के उस आतंकी हमले में सात भारतीयों सहित करीब 19 लोगों की मौत हो गई थी। वह जम्मू-कश्मीर और भारत के नॉर्थ-ईस्‍ट राज्‍यों में भी तैनात रह चुकी हैं। मधुमिता साल 2000 में शॉर्ट सर्विस कमीशन के जरिए सेना में कमीशंड हुई थीं। वह एजुकेशन कोर में शामिल थीं और सेना के अंग्रेजी भाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर अफगानिस्तान में पोस्‍टेड थीं। लेफ्टिनेंट कर्नल मधुमिता ने ही सेना में लेडी ऑफिसर्स के लिए स्‍थायी कमीशन की लड़ाई शुरू की थी। साल 2014 से वह इस जंग को लड़ रही हैं।

कारगिल गर्ल गुंजन सक्‍सेना

कारगिल गर्ल गुंजन सक्‍सेना

फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्‍सेना, इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) की इस बहादुर पायलट के बारे में उस समय बातें शुरू हुईं जब पिछले वर्ष करन जौहर ने अपनी एक फिल्‍म का पोस्‍टर जारी किया। गुंजन पर बनी यह फिल्‍म इस वर्ष ही रिलीज होगी इसलिए महिला दिवस के मौके पर उनका जिक्र भी करना जरूरी है। ताकि उन लोगों को उनके बारे में पता चल सके जो उन्‍हें नहीं जानते हैं। 44 साल की गुंजन अब रिटायर हो चुकी हैं। उन्हें 'कारगिल गर्ल' के नाम से जाना जाता है। गुंजन को उनकी वीरता, साहस और देशप्रेम के लिए शौर्य पुरस्कार से सम्‍मानित किया जा चुका है। कारगिल की जंग के दौरान गुंजन ने युद्ध क्षेत्र में निडर होकर चीता हेलीकॉप्टर उड़ाया। इस दौरान वह द्रास और बटालिक की ऊंची पहाड़ियों से उठाकर वापस सुरक्षित स्थान पर लेकर आईं। पाकिस्तानी सैनिक लगातार रॉकेट लॉन्चर और गोलियों से हमला कर रहे थे। गुंजन के एयरक्राफ्ट पर मिसाइल भी दागी गई लेकिन निशाना चूक गया और गुंजन बाल-बाल बचीं। बिना किसी हथियार के गुंजन ने पाकिस्तानी सैनिकों का मुकाबला किया और कई जवानों को वहां से सुरक्षित निकाला।

वॉरशिप पर तैनात पहली नेवी ऑफिसर संध्‍या सूरी

वॉरशिप पर तैनात पहली नेवी ऑफिसर संध्‍या सूरी

18 अगस्‍त 1994 को इंडियन नेवी में 22 साल की एक ऐसी लेडी ऑफिसर कमीशंड हुईं जिन्‍हें देश की सेवा करने का वह अवसर मिला जो बहुत ही कम ऑफिसर्स को मिलता है। संध्‍या सूरी देश की पहली ऐसी नेवी ऑफिसर हैं जो सर्विस के दौरान किसी वॉरशिप पर तैनात रहीं हैं। सात साल तक देश की सेवा करने के बाद और नेवी में पोस्टिंग के बाद वह रिटायर हो गईं। मगर अपने पीछे वह एक ऐसा इतिहास छोड़ गईं जो आज तक प्रेरणा देता है। संध्‍या नेवी के एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर तैनात थीं। संध्‍या, आईपीएस की तैयारी कर रहीथीं और वह देश की 14 ऐसी उम्‍मीदवारों में शामिल हैं जिन्‍हें नेवी एकेडमी के तीसरे बैच में जगह मिली थी। जम्‍मू के कालूचक के आर्मी स्‍कूल में संध्‍या इंग्लिश पढ़ा रही थीं। नेवी के अलावा उन्‍होंने सेना और वायुसेना में भी जाने का सपना संजोया था। वह एयरफोर्स के लिए एसएसबी में शामिल होने के लिए गईं थी कि तभी उन्‍हें नेवी एकेडमी से कॉल आ गई और फिर उन्‍होंने नेवी को ही अपना साथी बना लिया।

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