Women Reservation Bill: विपक्षी पार्टियों का क्या है स्टैंड? नंबर गेम जुटाना NDA के लिए क्यों मुश्किल?

Women Reservation Bill 2026: संसद में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल पर बहस जारी है, जबकि सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' को 16 अप्रैल 2026 से लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। इससे भ्रम की स्थिति बनी है, क्योंकि एक ओर संशोधन बिल पर चर्चा चल रही है और दूसरी ओर कानून लागू कर दिया गया। यह कानून लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देता है।

हालांकि, इस कानून में संशोधन और इसे 2029 से लागू करने पर लोकसभा में बहस और शुक्रवार (17 अप्रैल) को वोटिंग होनी है। लोकसभा में 540 सक्रिय सांसदों के बीच बिल पास करने के लिए करीब 360 वोट जरूरी हैं, जबकि NDA के पास 293 सांसद हैं, यानी अभी भी बहुमत से 67 सांसद दूर है। ऐसे में नंबर गेम जुटाना NDA के लिए बहुत मुश्किल होने वाला है।

Women Reservation Bill 2026

विपक्ष इसे 'बीजेपी शक्ति बिल' कह रहा है। अलग-अलग राजनीतिक दलों का इसपर स्टैंड अलग है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने एक नई बहस छेड़ दी है-क्या महिला आरक्षण में SC, ST और OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए। ममता बनर्जी की पार्टी TMC और उद्धव ठाकरे गुट वाली शिवसेना ने कहा है कि भाजपा इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है। RLD का कहना है कि इस बिल से विपक्ष को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

आइए इस महा-बहस का पूरा विश्लेषण समझते हैं और 131वां संविधान संशोधन बिल पास करान के लिए संसद में बहुमत का आंकड़ा क्या है।

🔷 नोटिफिकेशन की टाइमिंग और तकनीकी पेंच

हैरानी की बात यह है कि संसद में जब इस कानून के संशोधनों पर चर्चा चल रही थी, ठीक उसी वक्त इसे 16 अप्रैल से लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई। हालांकि, सरकार के अधिकारियों ने इसे सिर्फ एक 'तकनीकी कारण' बताया है।

इस नोटिफिकेशन का सीधा मतलब यह है कि अब संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के प्रावधान प्रभावी हो गए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि मौजूदा लोकसभा में महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिलेगा। नियम के मुताबिक यह आरक्षण अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही जमीन पर उतरेगा।

लोकसभा सीटें 850 करने का प्लान: परिसीमन क्या है? North vs South विवाद भड़का, विपक्ष क्यों है खिलाफ—Explain
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🔷 सरकार ये तीन बिलों को पास करने की कोशिश

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: लोकसभा सीटें 850 करने का प्रस्ताव है। राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेश से 35 सीटें हो सकती हैं।

परिसीमन (संशोधन) विधेयक, 2026: परिसीमन के लिए 'जनसंख्या' की परिभाषा में बदलाव किया जाएगा। ताकि 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाए।

केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: यह विधेयक पुडुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के कानूनों में संशोधन करता है, ताकि परिसीमन और महिला आरक्षण बिल लागू हो सकें।

🔷 मायावती का हमला: 'बिना SC-ST, OBC कोटे के ये बिल सिर्फ छलावा

बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती ने इस बिल पर सरकार के साथ-साथ कांग्रेस और सपा को भी आड़े हाथों लिया है। मायावती ने साफ शब्दों में कहा कि महिला आरक्षण के नाम पर पिछड़ों और दलितों के साथ राजनीति हो रही है। हालांकि BSP ने इस बिल का सपोर्ट किया है। लेकिन बसपा के एक भी सांसद हैं। तो ये सपोर्ट नैतिक है।

मायावती की मुख्य दलीलें

कोटे के भीतर कोटा: मायावती का कहना है कि जब तक इस 33% आरक्षण में SC-ST और OBC वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोटा तय नहीं किया जाता, तब तक यह बिल अधूरा है।

कांग्रेस पर प्रहार: उन्होंने कांग्रेस को 'गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली पार्टी' करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसने कभी दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों को पूरा करने की नीयत नहीं दिखाई।

सपा को घेरा: मायावती ने समाजवादी पार्टी पर तंज कसते हुए कहा कि जब वे सत्ता में होते हैं, तो पिछड़ों का हक भूल जाते हैं और बाहर होते ही बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। उन्होंने साफ संदेश दिया कि अगर सरकार सच में गंभीर है, तो उसे 2011 की जनगणना के आधार पर इसे तुरंत लागू करना चाहिए।

Women Reservation Bill: 850 सीटों वाली नई संसद और 33% महिला आरक्षण, बदल जाएगी राजनीति की तस्वीर? Explainer
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🔷 कांग्रेस का क्या है स्टैंड? 2029 की शर्त और राजनीति की 'बू'

कांग्रेस की ओर से मोर्चा संभालते हुए प्रियंका गांधी ने सदन में सरकार की नीयत पर गहरे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस बिल का समर्थन करती है, लेकिन बिल के प्रारूप में छिपी शर्तें संदेह पैदा करती हैं। कांग्रेस के वर्तमान में लोकसभा में 99 सांसद है। कांग्रेस का स्टैंड अभी तक इन बिलों के विरोध में रहा है। हालांकि ऐसा भी हो सकता है कि कांग्रेस विरोध में वोट ही ना करें और वॉक आउट कर जाए।

परिसीमन का डर: प्रियंका ने आरोप लगाया कि सीटों की संख्या को 850 तक बढ़ाने के लिए परिसीमन का जो रास्ता चुना गया है, उसमें राजनीति की बू आ रही है।

नई जनगणना की शर्त क्यों?: उन्होंने सवाल किया कि 2023 के बिल में नई जनगणना की जो बात थी, उसे अब घुमाया क्यों जा रहा है? उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "सावधान हो जाइए, महिलाएं बहकाने वाले पुरुषों को पहचान लेती हैं।"

🔷 उद्धव ठाकरे गुट शिवसेना का क्या कहना है?

शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मांग की है कि 33% आरक्षण को बिना किसी देरी के अभी लागू किया जाना चाहिए, लेकिन परिसीमन के मुद्दे को 'ठंडे बस्ते' (Backburner) में डाल देना चाहिए। शिवसेना (UBT) के लोकसभा में फिलहाल 9 सांसद हैं। उम्मीद है ये विरोध में वोट करेंगे। शिवसेना (शिंदे गुट) के 7 सांसद हैं, जो NDA सरकार के साथ हैं।

उद्धव का मानना है कि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन एक संवेदनशील मुद्दा है जो देश की एकता को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इस पर जल्दबाजी के बजाय गहरी चर्चा की जरूरत है।

वहीं संजय राउत ने इसे 'बीजेपी शक्ति बिल' बताते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी परिसीमन के बहाने निर्वाचन क्षेत्रों को अपने राजनीतिक फायदे के लिए दोबारा तैयार करना चाहती है। उन्होंने पूछा कि अगर आरक्षण देना ही है, तो मौजूदा 543 सीटों पर ही क्यों नहीं दिया जा रहा?

🔷 TMC का गंभीर आरोप: 'वोटर लिस्ट से नाम काटने की साजिश'

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर NRC और वोटर लिस्ट से जोड़ दिया है। कूचबिहार की एक रैली में उन्होंने आरोप लगाया कि महिला आरक्षण और परिसीमन के बीच जो संबंध जोड़ा जा रहा है, वह असल में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटने और NRC लागू करने की एक बड़ी 'साजिश' का हिस्सा है। टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने भी सवाल उठाया कि चुनाव के बीच में इस विशेष सत्र की क्या जरूरत थी, जब कई सांसद प्रचार में व्यस्त हैं। वर्तमान में TMC की लोकसभा में 29 सांसद हैं। उम्मीद यही है कि ये विपक्ष में ही वोट करेंगे।

🔷 अखिलेश यादव की मांग: पिछड़ों और मुस्लिमों को जोड़कर हो जनगणना, सपा का स्टैंड क्या है?

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने मांग की है कि पहले जातिगत जनगणना हो और उसके बाद ही परिसीमन किया जाए। उनका कहना है कि सरकार पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहती। परिसीमन की रणनीति इस तरह बनाई जा रही है जिससे केवल सत्ता पक्ष को फायदा मिले। समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के लोकसभा में कुल 37 सांसद (MPs) हैं। ऐसी संभावना है कि ये भी बिल के विरोध में वोट करेंगे या वॉक आउट करेंगे।

🔷 नवीन पटनायक की पार्टी बीजु जनता दल का पक्ष क्या है?

बीजेडी (BJD) प्रमुख नवीन पटनायक ने ओडिशा के सभी सांसदों को पत्र लिखकर महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर पार्टी का रुख साफ किया है। उन्होंने कहा कि सांसद परिसीमन बिल का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित होना चाहिए कि ओडिशा के प्रतिनिधित्व में किसी तरह की कटौती या समझौता न हो। हालांकि नवीन पटनायक की पार्टी बीजु जनता दल के लोकसभा में एक भी सांसद नहीं हैं। राज्यसभा में वर्तमान में 7 सांसद हैं।

पटनायक ने अपने पत्र में चिंता जताई कि महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने का प्रस्ताव दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि यह प्रक्रिया अगली जनगणना के बाद ही लागू होगी, जिससे राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। इससे पहले पटनायक ने ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से कहा था कि परिसीमन बिल पर विस्तृत चर्चा के लिए राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए। उनका मानना है कि इतने अहम मुद्दे पर व्यापक बहस जरूरी है, ताकि राज्य के हित सुरक्षित रह सकें।

🔷 बाकी अन्य विपक्षी दलों का क्या है पक्ष?

  • द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के भी अब तक इन बिलों के विरोध में है। लोकसभा में DMK के 22 सांसद हैं और इनकी भी विरोध में वोटिंग की संभावना है।
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोकसभा में 2 सांसद हैं,इनकी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
  • झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के लोकसभा में 3 सांसद हैं। ये विरोध में वोट कर सकते हैं। महिला आरक्षण बिल पर JMM सांसद महुआ माझी ने कहा है कि यह विशेष सत्र क्यों बुलाया गया? यह तो पहले ही घोषित हो चुका है कि महिला आरक्षण बिल लागू किया जाएगा। बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव चल रहे हैं और कई नेता यहां नहीं आ पा रहे हैं।
  • राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के लोकसभा में 4 सांसद हैं। ये भी विरोध में ही वोट करेंगे।

🔷 NDA के प्रमुख साथी दल (NDA Alliance MPs)

  • एनडीए (National Democratic Alliance) के पास वर्तमान में बहुमत का आंकड़ा है।
  • भारतीय जनता पार्टी (BJP): 240
  • तेलुगु देशम पार्टी (TDP): 16
  • जनता दल (यूनाइटेड) (JD-U): 12
  • शिवसेना (एकनाथ शिंदे): 7
  • लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास): 5
  • जनता दल (सेकुलर) (JD-S): 2
  • जनसेना पार्टी (JSP): 2
  • राष्ट्रीय लोक दल (RLD): 2
  • अपुना दल (सोनेलाल) (AD-S): 1
  • राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP - अजित पवार): 1
  • हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (HAM-S): 1
  • सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा (SKM): 1
  • असोम गण परिषद (AGP): 1
  • AJSU पार्टी: 1

लोकसभा की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक वर्तमान में एनडीए गठबंधन की कुल शक्ति 293 सांसदों के करीब है।

🔷 संविधान (131वां संशोधन) विधेयक को लोकसभा में पास कराने के लिए बहुमत का आंकड़ा क्या है?

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को पास कराने का गणित सामान्य बिलों से अलग और थोड़ा जटिल होता है, क्योंकि यह एक संवैधानिक संशोधन है। ऐसे मामलों में सिर्फ साधारण बहुमत से काम नहीं चलता, बल्कि "विशेष बहुमत" (Special Majority) की जरूरत होती है।

संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक इस तरह के संशोधन को पास कराने के लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं।

  • पहली शर्त यह है कि सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसद इसके पक्ष में वोट दें।
  • दूसरी और उतनी ही अहम शर्त यह है कि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या (543) के आधे से ज्यादा यानी 50% + 1 सांसदों का समर्थन भी जरूरी होता है। इसका मतलब है कि कुल मिलाकर करीब 272 से अधिक सांसदों का समर्थन अनिवार्य है, लेकिन व्यवहार में यह संख्या अक्सर 350-360 के आसपास पहुंच जाती है, अगर लगभग सभी सदस्य मौजूद होकर वोटिंग करें।

मान लीजिए लोकसभा के सभी 540 सक्रिय सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेते हैं, तो ऐसे में बिल को पास कराने के लिए करीब 360 सांसदों का समर्थन चाहिए होगा (यानी दो-तिहाई बहुमत)। यानी सिर्फ आधे से ज्यादा सांसदों का समर्थन काफी नहीं है, बल्कि भारी संख्या में समर्थन जुटाना जरूरी होता है।

16 अप्रैल 2026 को जब यह विधेयक पेश किया गया, तब 251 सांसदों ने इसके पक्ष में वोट दिया, जबकि 185 सांसद विरोध में रहे। यह आंकड़ा दिखाता है कि सरकार को अभी भी इस बिल को पूरी तरह पारित कराने के लिए ज्यादा समर्थन जुटाने की जरूरत है, क्योंकि यह संख्या आवश्यक विशेष बहुमत से काफी कम है।

एक और अहम बात यह है कि यह बिल सिर्फ लोकसभा से पास होना ही काफी नहीं है। संविधान संशोधन के लिए इसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अलग-अलग इसी विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी होता है।

कुल मिलाकर लोकसभा में फिलहाल 540 सक्रिय सांसद हैं (3 सीटें खाली हैं), ऐसे में इस संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए करीब 360 वोट जरूरी होंगे। NDA के पास 293 सांसद हैं, जो बहुमत के आंकड़े से 67 कम है। हालांकि, अगर बड़ी संख्या में सांसद वोटिंग से दूर रहते हैं, तो आवश्यक संख्या घट सकती है, लेकिन इसके लिए विपक्ष के काफी सदस्यों का अनुपस्थित रहना जरूरी होगा।

🔷 परिसीमन क्या है और अब क्या बदलेगा? (Understanding Delimitation)

अभी तक भारत में सीटों का आधार 1971 की जनगणना थी। लेकिन अब सरकार इसमें बदलाव कर रही है:

  • आबादी की नई परिभाषा: सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए अब 2011 या आगामी किसी जनगणना को आधार बनाया जा सकेगा।
  • परिसीमन आयोग: सरकार एक आयोग बनाएगी जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड या वर्तमान जज करेंगे।
  • अंतिम फैसला: इस आयोग का निर्णय अंतिम होगा और इसे किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

🔷 क्या है महिला आरक्षण कानून? (What is Women Reservation Law)

2023 में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया था।

लेकिन इस कानून की एक शर्त है-यह तभी लागू होगा जब नई जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। मौजूदा चर्चा इसी प्रक्रिया को तेज करने और 2029 तक इसे लागू करने को लेकर है। संशोधन बिल में लोकसभा सांसदों की संख्या 850 करने का प्रस्ताव है किस राज्य में कितने सीट बढ़ने की संभावना है।

STATE 850 MPS

असल मुद्दा क्या है?

पूरी बहस का केंद्र सिर्फ महिला आरक्षण नहीं, बल्कि उसका लागू होने का तरीका है।

तीन बड़े सवाल हैं:

  • क्या यह 2029 से पहले लागू हो सकता है?
  • क्या इसमें OBC महिलाओं को अलग कोटा मिलेगा?
  • क्या परिसीमन राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल होगा?

महिला आरक्षण कानून का लागू होना निश्चित रूप से ऐतिहासिक कदम है, लेकिन इसके साथ जुड़े सवाल इसे और जटिल बना देते हैं। एक तरफ सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का बड़ा फैसला बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति के तौर पर देख रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या यह कानून वास्तव में 2029 तक जमीन पर उतर पाएगा या फिर यह भी राजनीतिक बहसों में उलझकर रह जाएगा।

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