क्या उत्तर प्रदेश में कभी कांग्रेस के अच्छे दिन आएंगे?
लखनऊ के नज़दीक बाराबंकी लोकसभा चुनावी क्षेत्र में ग़रीब किसानों का समुराय नाम का एक गांव है. इस गांव की अर्थव्यवस्था गन्ने की खेती पर टिकी है. जब मैं वहां पहुंचा तो कांग्रेस के कार्यकर्ता एक सभा कर रहे थे.
ये बिल्कुल बूथ लेवल के वर्कर्स थे. इस तरह की सभाएं कई गॉंवों में आयोजित की जा रही थीं. ये सभाएं सालों से लगभग ठप चुके कांग्रेस पार्टी के ढांचे को दोबारा ज़िन्दा करने के लिए की जा रही थीं.
यूथ कांग्रेस के स्थानीय नेता तनुज पुनिया काफ़ी जोश में कहने लगे, "इन गॉंवों में लोग हमारी पार्टी के साथ हज़ारों की संख्या में जुड़ रहे हैं"
हाल में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में पार्टी की सरकारें बनने के बाद, दूसरे राज्यों की तरह, उत्तर प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ताओं में एक नया जोश देखने को मिल रहा है.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी लगभग तीन दशकों से सत्ता में नहीं है लेकिन अब इसके दोबारा जीवित होने के आसार नज़र आ रहे हैं. प्रियंका गांधी के पार्टी में शामिल होने से कार्यकर्ताओं का हौसला और भी बुलंद हो गया है.
कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है. हाल ही में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक किसान रैली में लोगों से यह वादा भी किया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अगर उनकी सरकार बनी तो वह सभी ग़रीबों के लिए एक न्यूनतम आमदनी का इंतज़ाम करेंगे.
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रधानमंत्री किसानों के लिए एक बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा करने वाले थे. लेकिन राहुल गांधी ने इससे पहले न्यूनतम आमदनी का एलान करके बीजेपी सरकार को मात देने की कोशिश की है.
मैंने उत्तर प्रदेश के अपने हाल के दौरे में ये महसूस किया कि कांग्रेस पार्टी एक स्पष्ट रणनीति के तहत काम कर रही है, कुछ नीतियां देश भर के लिए हैं और कुछ अलग-अलग राज्यों के लिए.
पार्टी पहले चाहती थी कि वह आम चुनाव सपा और बसपा के साथ मिलकर लड़े लेकिन जब दोनों पार्टियों ने कांग्रेस को अपने गठबंधन में शामिल नहीं किया तो पार्टी ने प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का इंचार्ज बनाकर सियासी मैदान में उतारा. पार्टी के कार्यकर्ता इस फ़ैसले से बहुत ख़ुश हैं.
लोकसभा की सबसे अधिक 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी की रणनीति काफ़ी सोची-समझी और स्पष्ट नज़र आती है.
पार्टी प्रवक्ता और इसके वरिष्ठ नेता अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं, "राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में अभी नीचे से काम शुरू किया है. मतलब ब्लॉक अध्यक्ष, ज़िलाध्यक्ष स्तर से. और वो स्थानीय लोगों की सहमति से बना है. ये नहीं कि दिल्ली और लखनऊ से सब तय हो गया."
उत्तर प्रदेश में पार्टी की रणनीति के कुछ मुख्य बिंदु ये हैं:
*उत्तर प्रदेश पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण है. यहाँ दूसरे राज्यों के मुक़ाबले पार्टी का किसानों पर ध्यान थोड़ा अधिक है. पार्टी के अनुसार किसान मोदी सरकार से नाराज़ है जिससे फ़ायदा उठाया जाए.
*पार्टी में ये भी सोच आम है कि किसानों की तरह युवा पीढ़ी भी मोदी सरकार से ख़फ़ा है. इसलिए नई नस्ल के लोगों को लुभाने की अधिक कोशिश की जाए.
*बसपा और सपा से सीधी टक्कर न ली जाए और कोशिश हो कि 2009 के लोकसभा चुनाव की तरह 21 या इससे अधिक सीटें जीती जाएँ.
*नए भर्ती होने वाले कार्यकर्ता किसान समुदाय से अधिक हों.
*पार्टी में महिलाओं के लिए आरक्षण पहले से है लेकिन उन्हें तालुका और ज़िला स्तर पर अहम पदों पर बैठाया जाए.
बाराबंकी की जिन सभाओं में मैं गया वहां बहुसंख्यक किसान थे. राज्यसभा सांसद पीएल पुनिया यहाँ से 2009 में चुनाव जीते थे. लेकिन पिछले चुनाव में मोदी लहर के कारण उनकी हार हुई थी.
उनके बेटे तनुज पुनिया ने दावा किया कि अध्यक्ष राहुल गांधी किसानों का दर्द समझते हैं, "उन्होंने किसानों की ज़रूरतों को समझा, ये समझा कि वो आत्महत्या करने पर क्यों मजबूर हैं. उनके नेतृत्व में पंजाब, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में क़र्ज़ माफ़ी की गयी है, उससे भारी संख्या में किसान अब कांग्रेस की तरफ़ आ रहे हैं"
एक समय था जब उत्तर प्रदेश में पार्टी को चुनाव में हराना कठिन था. पार्टी के बुरे दिन 1989 लोकसभा चुनाव के समय से आये. उस साल हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को केवल 15 सीटें मिली थीं.
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र नाथ भट कहते हैं, "पार्टी का पतन उस समय से शुरू हुआ जब वीपी सिंह ने 1989 के बाद मंडल रिपोर्ट को लागू किया उसी दौर में बसपा और बाद में सपा का उदय हुआ. और 1986 में राम मंदिर का ताला खुला, मंडल, दलित और सांप्रदायिक राजनीति, इन तीनों फैक्टर का कांग्रेस सामना नहीं कर सकी."
अखिलेश प्रताप सिंह पार्टी की लगातार हार के कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, "हम लोग मंडल की राजीनीति में कमज़ोर होते गए. जाति और धर्म की राजनीति के बीच भी हमने अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया. हमने सत्ता के लिए कोई मोलभाव नहीं किया. हम कुछ कमज़ोर हुए और उसके बाद गठबंधन के दौर में आ गए. हमने समर्थन देना शुरू कर दिया. पार्टी और भी कमज़ोर हो गई."
पिछले लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा राज्य से पार्टी के सभी उम्मीदवार हार गए थे. ब्लॉक स्तर के नेता नेकचंद त्रिपाठी पुराने कांग्रेसी हैं. उनके अनुसार पार्टी के पतन के कई कारण हैं लेकिन उनकी नज़रों में सबसे बड़ी वजह निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ किया जाना है.
वह कहते हैं, "पार्टी के बड़े नेताओं ने कार्यकर्ताओं की अनदेखी की. उसी का नतीजा है कि हम 27-28 साल से उत्तर प्रदेश में (सत्ता से) बाहर हैं".
ऐसा लगता है कि पार्टी के बड़े नेताओं को अपनी ग़लती का अहसास हुआ है, जैसा कि अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा, "नेताओं की कमी थी. जिस उत्साह से हमें लड़ना (चुनाव) चाहिए था, उसकी जगह उत्तर प्रदेश में बैसाखियों (गठबंधन) के सहारे लड़ने लगे"
पार्टी में नया जोश देखने को ज़रूर मिल रहा है लेकिन आज भी राज्य में पार्टी के पास कोई क़द्दावर नेता नहीं है.
पत्रकार वीरेंदर नाथ भट कहते हैं, "आज यूपी में कांग्रेस के पास एक भी जाना-माना नेता नहीं है, राज बब्बर तो हैं लेकिन वो असल में एक समाजवादी हैं, पार्टी अभी भी यूपी में किसी नेता को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं कर रही है."
भट का कहना है कि पार्टी की दूसरी चुनौती ये है कि वह सांप्रदायिक और आइडेंटिटी पॉलिटिक्स का मुक़ाबला कैसे करे?
अब जब कि बसपा-सपा गठबंधन में पार्टी शामिल नहीं है तो इसकी अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति भी साफ़ होनी चाहिए.
ऐसा लगता है कि पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश, प्रियंका गांधी की एंट्री और राहुल गांधी के किसान समर्थक बयानों पर निर्भर कर रही है. पार्टी के कार्यकर्ताओं के आत्मविश्वास का हाल ये है कि अधिकतर कार्यकर्ता इस बात से ख़ुश हैं कि पार्टी सपा-बसपा गठबंधन में शामिल नहीं है.
लखनऊ में पार्टी के मुख्य दफ़्तर में बैठे कुछ कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं. एक ने कहा, "हम तो पॉज़िटिव हैं. हम आपसे कह रहे हैं कि हम लोग स्वतंत्र होकर अकेले चुनाव लड़ेंगे और यहाँ सरकार राहुल जी की बनाएंगे.''
उसके साथ बैठे दूसर कार्यकर्ता ने कहा, "हम एक पुराने राजनीतिक दल हैं और हमारा एक बड़ा संगठन है. हम हमेशा तैयार हैं. हम पूरी तरह से तैयार हैं."
उनके इस आत्मविश्वास की एक वजह ये भी है कि पार्टी में ये विचार आम है कि अगर 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा से गठबंधन नहीं किया होता तो नतीजे कुछ और होते. इस चुनाव में बीजेपी और इसकी सहयोगी पार्टियों ने 325 सीटें हासिल की थीं जब की सपा-कांग्रेस का गठबंधन बुरी तरह से फ्लॉप हो गया था.
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक महासचिव सत्यदेव सिंह ने कहा, "वह नेतृत्व का निर्णय था, हम उसे ग़लत-सही नहीं कहेंगे. लेकिन गठबंधन होने से पहले बहुत अच्छी स्थिति थी. वही हालात होते और आज इस पोज़िशन में रहते तो सरकार भारतीय जनता पार्टी की नहीं होती.''
दिलचस्प बात यह है कि कुछ विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि सपा-बसपा एक साथ केवल बीजेपी के कारण नहीं मिले हैं. समझा ये जा रहा है कि कांग्रेस के हालिया उभार से सपा और बसपा के खेमों में एक तरह की बेचैनी है.
वरिष्ठ पत्रकार वीरेंदर नाथ भट कहते हैं, "कांग्रेस के उभार से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में बेचैनी स्वाभाविक है. जो सियासी जगह कांग्रेस की थी, उस पर सपा-बसपा का क़ब्ज़ा है. और देर-सवेर कांग्रेस उस पर अपना दावा ठोकेगी. इसमें समय लग सकता है."
सपा और बसपा ने भले ही अपने चुनावी गठबंधन में कांग्रेस को शामिल न किया हो लेकिन कांग्रेस का एक ही उद्देश्य है और वह है बीजेपी को हराना. कांग्रेस उम्मीदवारों के चुनाव और टिकट के बँटवारे के समय इस उद्देश्य का ध्यान ज़रूर रखेगी.
आम राय ये है कि फ़िलहाल कांग्रेस अपने बूते लोकसभा में सफलता हासिल करने की स्थिति में नहीं है.
वीरेंदर नाथ भट के मुताबिक़ पार्टी के लिए आगामी लोकसभा चुनाव थोड़ा जल्द आ गया है लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी अकेले लड़ने के योग्य बन सकती है, "इतना मान लीजिए कि मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि 2022 में कांग्रेस अपने दम पर भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में होगी."
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