• search

क्या जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस स्वीकार किया जाएगा?

By Bbc Hindi
Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को लेकर अब सबकी नज़रें उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू पर है.

    नायडू महाभियोग के प्रस्ताव को आगे बढ़ाएंगे या अमान्य घोषित करेंगे? यह सवाल सबके मन में कौंध रहा है.

    मीडिया में आ रही रिपोर्टों के मुताबिक़ सरकार का मानना है कि विपक्ष के पास इस क़दम के लिए कोई मज़बूत ज़मीन नहीं है और साथ ही राज्यसभा में उसके पास पर्याप्त सांसद नहीं हैं.

    कहा जा रहा है कि मसला सिर्फ़ इतना है कि विपक्ष के इस नोटिस को किस तरीक़े ख़ारिज किया जाता है. यह भी कहा जा रहा है कि अगर विपक्ष के इस नोटिस को नहीं स्वीकार किया जाता है तो भी अपने आप में असामान्य होगा.

    इतिहास 6 में चार ऐसी मिसालें हैं जब सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों के ख़िलाफ़ महाभियोग का नोटिस दिया गया तो उन्हें स्वीकार किया गया. इन 6 से पांचवें मामले में पैनल बनने से पहले जज ने अपने फ़ैसले को 'संशोधित' कर दिया था.

    वेंकैया नायडू
    Getty Images
    वेंकैया नायडू

    1970 में केवल एक बार महाभियोग के नोटिस ख़ारिज किया गया था. तब मुख्य न्यायधीश स्पीकर के पास पहुंचकर इस बात को समझाने में कामयाब रहे थे कि मामला गंभीर नहीं है.

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार के उच्चस्तरीय सूत्रों का मानना है कि जब राज्यसभा के सभापति महाभियोग के नोटिस को जांच के लिए स्वीकार नहीं कर लेते हैं तब तक भारत के मुख्य न्यायधीश को न्यायिक गतिविधियों से अलग नहीं किया जा सकता है.

    राज्यसभा के सभापति जब महाभियोग के नोटिस को जांच के लिए स्वीकार कर लेंगे तो मुख्य न्यायधीश को न्यायिक फ़ैसलों से ख़ुद को अलग रखना होगा. ज़ाहिर है सरकार के सामने यह प्रश्न भी होगा.

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के मुताबिक़, ''सुप्रीम कोर्ट के जज को उसकी भूमिका से संसद के दोनों सदनों से तो तिहाई बहुमत के आधार पर प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति के आदेश से ही हटाया जा सकता है.''

    न्यायधीश अधिनियम 1968 और न्यायधीश क़ानून 1969 के अनुसार महाभियोग का नोटिस दिए जाने के बाद उसकी पहली ज़रूरत यह होती है कि राज्यसभा के 64 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. इसके बाद राज्यसभा के सभापति नायडू इस पर विचार कर सकते हैं.

    वेंकैया नायडू
    Getty Images
    वेंकैया नायडू

    अगर महाभियोग के नोटिस को नायडू स्वीकार कर लेते हैं तो तीन सदस्यों वाली एक समिति बनाने की ज़रूरत पड़ेगी. इन तीन सदस्यों में पहला सदस्य मुख्य न्यायधीश या सुप्रीम कोर्ट के अन्य जज होंगे. दूसरा किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और तीसरा कोई क़ानूनविद् होगा. ज़ाहिर है जिस मुख्य न्यायधीश के ख़िलाफ़ नोटिस दिया गया है वो नहीं होगा.

    क़ानून के जानकारों का कहना है कि अगर राज्यसभा का सभापति महाभियोग के नोटिस को ख़ारिज कर देता है तो इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. क़ानून के जानकारों का कहना है कि अगर नोटिस सभी शर्तों को पूरा करता है और फिर भी उसे ख़ारिज कर दिया जाता है तो इसे कोर्ट में चुनौती दिया जा सकता है. तीन सदस्यों वाली यह समिति तीन महीने में रिपोर्ट सौंपती है. हालांकि समय और बढ़ाने का भी प्रावधान है.

    इस समिति का काम (अगर ये मामला इस स्तर तक पहुंचा) भारत के मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ मुख्य आरोप तय करना होगा जिसके आधार पर जांच की जाएगी. इस पैनल के पास संबधित व्यक्तियों को समन करने और उनके द्वारा ली गई शपथ के ठीक से निर्वाहन की जांच करने के लिए एक सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां होंगी.

    यह कमेटी प्रत्येक आरोप पर अपने निष्कर्ष के साथ अपनी टिप्पणियों को सदन के सामने पेश करेगी. अगर ये कमेटी पाती है सीजीआई ने किसी तरह का दुराचार नहीं किया तो ये महाभियोग वहीं रुक जाएगा.

    लेकिन अगर ये रिपोर्ट बताती है कि भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश का व्यवहार ग़लत था तो महाभियोग और समिति की रिपोर्ट पर सदन में विचार किया जाएगा.

    अगर ये प्रस्ताव संवैधानिक रूप से स्वीकार कर लिया जाता है तो सर्वोच्च न्यायाधीश के पर लगे आरोपों को सिद्ध किया जाना होगा.

    इसके बाद दोनों सदनों में एक ही सेशन में तय प्रारूप में जज को हटाए जाने के लिए राष्ट्रपति से गुहार लगाई जाएगी.

    हालांकि, ये साफ़ नहीं है कि सांसदों की एक ख़ास संख्या द्वारा प्रस्ताव दिए जाने के बाद ऐसे कितने जज हैं जिन्हें न्यायिक और प्रशासनिक कामकाज से दूर रखा गया या उन्होंने ख़ुद को इससे अलग रखा है.

    सुप्रीम कोर्ट
    Getty Images
    सुप्रीम कोर्ट

    वकील राजू रामचंद्रन ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि कमेटी द्वारा आरोप तय किए जाने के बाद संबंधित जज को सभी कामों से अपने आपको अलग करना होगा. लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश के मामले में एक सख़्त प्रक्रिया लागू की जा सकती है.

    इंडियन एक्सप्रेस से दो प्रमुख सरकारी अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया है कि भारत के उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडु, जो कि राज्यसभा के अध्यक्ष हैं, 'इस मामले को क़रीब से देख रहे हैं और क़ानूनविदों से बातचीत के बाद स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं.''

    इस मामले में लगने वाले समय पर एक अधिकारी ने बताया है कि इसे लेकर कोई समयसीमा नहीं है, लेकिन पिछले मामलों में राज्यसभा अध्यक्ष और लोकसभा अध्यक्ष ने 3 से 13 दिन तक का समय लिया था.

    वहीं एक अन्य अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "एक बार ये प्रस्ताव मान लिया जाता है तो राज्यसभा के सचिव सभी सांसदों के हस्ताक्षरों की तथ्यात्मक पुष्टि करने के बाद अपनी रिपोर्ट पेश करेंगे. इसके बाद राज्यसभा अध्यक्ष क़ानूनविदों से सलाह लेंगे कि क्या शुरुआती जांच के बाद प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त ज़मीन मौजूद है. राज्यसभा अध्यक्ष इस मामले में सर्वोच्च न्यायाधीश से सलाह लेते हैं, लेकिन ये मामला उनके ही ख़िलाफ़ है, ऐसे में उन्हें क़ानूनविदों की सलाह लेनी होगी."

    क्या होता है महाभियोग प्रस्ताव?

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Will Justice impeachment notice against Justice Deepak Mishra be accepted

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X