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क्या मिजोरम से कांग्रेस को मिलेगी संजीवनी? पूर्वोत्तर में हो चुकी है साफ, बीजेपी का लगातार बढ़ा है ग्राफ

असम समेत पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में से कई राज्यों को पहले कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। लेकिन, आज की तारीख में पार्टी कहीं भी सत्ता में नहीं है। जबकि, बीजेपी आज इस इलाके में सबसे ताकतवर दल के रूप में स्थापित हुई है।

पार्टी के खोए हुए जनाधार को वापस लेने के इरादे से कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को मिजोरम की राजधानी आइजोल की सड़कों पर पदयात्रा निकाली है। 2018 में 40 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को सिर्फ 4 सीटें मिली थीं। 7 नवंबर के चुनाव में पार्टी इससे कहीं अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद लेकर चुनाव मैदान में उतरी है।

 rahul gandhi on mission mizoram

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में कांग्रेस की करारी हार हुई
इसी साल फरवरी-मार्च में भी पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में चुनाव हुए थे। त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड। तब इस क्षेत्र की कभी सबसे बड़ी पार्टी होने वाली कांग्रेस का नागालैंड में खाता भी नहीं खुला था। इन तीनों राज्यों में कुल 180 सीटें हैं और पार्टी को सिर्फ 8 सीटें ही मिल पाईं थी।

पूर्वोत्तर के राज्यों में कांग्रेस की स्थिति लगातार खराब हुई है
वैसे पूर्वोत्तर के कई छोटे-छोटे राज्यों में पहले से ही क्षेत्रीय पार्टियों का प्रभुत्व रहा है। लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर जो भूमिका कभी कांग्रेस की होती थी, आज उससे कहीं बेहतर स्थिति में भाजपा स्थापित हो चुकी है। कांग्रेस का ग्राफ इन आठों राज्यों में लगातार गिरता गया है।

पूर्वोत्तर में आज बज रहा है बीजेपी का डंका
तथ्य यह है कि 2012 के पहले तक पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी अनजान बनी हुई थी। आज की स्थिति यह है कि असम, त्रिपुरा, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में उसकी अपनी और बड़ी बहुमत वाली सरकारें हैं। नागालैंड, मेघालय में भी वह सरकारों का हिस्सा है। लेकिन, कांग्रेस पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में सरकार का हिस्सा नहीं है।

पूर्वोत्तर के राज्यों में 36% बीजेपी के एमएलए
अगर चुनाव आयोग के आंकड़ों को देखें तो पूर्वोत्तर के राज्यों में कुल 498 एमएलए हैं, जिनमें से बीजेपी के विधायकों की संख्या 180 है। वहीं अन्य दलों जिनमें क्षेत्रीय पार्टियों की संख्या ज्यादा है, उनके विधायक 268 हैं। जबकि, कभी पूर्वोत्तर की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली कांग्रेस के एमएलए की संख्या महज 50 है।

11 वर्षों में सिर्फ 11 से 180 हुई भाजपा विधायकों की संख्या
अगर पूरे देश में भाजपा की बढ़त के ग्राफ को देखें तो उसमें पूर्वोत्तर ऐसा क्षेत्र है, जहां भी वह लगातार मजबूत हुई है। जबकि, यह वैसा क्षेत्र है, जहां 2012 तक उसकी मौजूदगी नहीं के बराबर थी। यानी जिन 498 क्षेत्रों की हमने बात की, उसमें उसके सिर्फ 11 एमएलए थे, जो कि कुल सीटों के महज 2% होते हैं। आज की तारीख में इस क्षेत्र में बीजेपी विधायकों का हिस्सा करीब 36% है।

मिशन मिजोरम से कांग्रेस को उम्मीद
पूर्वोत्तर भारत की सियासी फिजा में पिछले करीब एक दशक में जो बदलाव आया है, कांग्रेस को उसमें मिशन मिजोरम के दम पर फिर से परिवर्तन की उम्मीद है। पार्टी को लगता है कि मणिपुर में कई महीनों से जिस कदर हालात बिगड़े हैं, उससे राज्य में भाजपा की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है।

क्योंकि, मणीपुर से हजारों लोग भागकर मिजोरम आए हुए हैं और उसका चुनावों में असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। वैसे भी मिजोरम उन राज्यों में शामिल है, जहां भाजपा विधानसभा में अभी तक बड़ी ताकत नहीं बन पाई है।

मिजोरम में भी भाजपा का बढ़ा है जनाधार
हालांक, तथ्य यह भी है कि इसी साल अप्रैल में मारा ऑटोनोमस ड्रिस्ट्रिक्ट काउंसिल (MADC) के लिए मिजोरम में जो चुनाव हुए थे, उसमें बीजेपी को बड़ी सफलता मिली थी। बीजेपी ने 492 ग्राम परिषद की सीटों में 232 पर कब्जा कर लिया था। इनमें से महिलाओं के लिए रिजर्व 47 सीटें भी शामिल थीं। जबकि, राज्य में सत्ताधारी सत्ताधारी मिजो नेशनल फ्रंट को सिर्फ 127 सीटें मिली थीं। वहीं कांग्रेस को 78 सीटें मिल पाई थीं।

पूर्वोत्तर के राज्यों में लोकसभा चुनावों के नतीजे भी विधानसभा चुनावों से ही मिले-जुले प्रतीत होते रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को मिजोरम से अबकी बार काफी उम्मीदें लगी हुई हैं। जहां तक भाजपा की बात है तो उसकी यही लाइन है कि मिजोरम में अगली सरकार बिना उसके समर्थन के नहीं बन सकती।

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