क्या सच में हो सकता है सुशांत केस का दाभोलकर जैसा हाल ? CBI की नाकामियों की लंबी है फेहरिस्त
देश भर में चर्चा का विषय बने सुशांत सिंह राजपूत केस को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सौंप दिया। कोर्ट ने सीबीआई को जांच का अधिकार देते हुए महाराष्ट्र सरकार को इसमें सहयोग करने को भी कहा। इसी बीच महाराष्ट्र के दिग्गज नेता और महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार ने सीबीआई जांच को लेकर तंज कसा है। पवार ने ट्वीट कर लिखा है कि महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए जांच में सहयोग करेगी। उन्होंने एक दूसरे ट्वीट में नरेंद्र दाभोलकर केस को याद करते हुए लिखा कि उम्मीद करता हूं कि सुशांत केस का हाल दाभोलकर जैसा न हो। बता दें कि 20 अगस्त 2013 को दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले की जांच सीबीआई को दी गई लेकिन आज तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है।
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सीबीआई की नाकामियों का पुराना रिकॉर्ड
सीबीआई के अगर पुराने रिकॉर्ड को देखें तो शरद पवार की बात में दम तो लगता है। वैसे भी सुशांत सिंह राजपूत केस में अब तक जो कुछ हुआ है उसे अगर देखा जाय तो लगता नहीं कि मामले की जांच सीबीआई के लिए इतनी आसान होगी। मामले में अब तक जिस तरह महाराष्ट्र सरकार और बिहार सरकार एक दूसरे पर आरोप लगा चुकी हैं उससे ये केस राजनीति के पेच में भी उलझता नजर आ रहा है। पहले तो मुंबई पुलिस ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत को आत्महत्या बता दिया लेकिन जब मामले में मोड़ तब आया जब सुशांत के पिता ने पटना में एफआईआर दर्ज कराई। जिसमें रिया चक्रवर्ती पर सुशांत को आत्महत्या के लिए उकसाने और अन्य धोखाधड़ी के आरोप लगाए थे।

जांच में बार-बार डाली गई रुकावट
पटना में एफआईआर को लेकर कई सवाल उठाए गए। जब पटना पुलिस कैडर के एक आईपीएस अधिकारी जांच के लिए मुंबई पहुंचे तो उन्हें मुंबई पुलिस ने क्वारंटीन करने पर मजबूर कर दिया। इसी बीच बिहार सरकार ने जांच सीबीआई को सौंपने की संस्तुति कर दी। केंद्र सरकार ने संस्तुति मंजूर कर दी। इसी बीच रिया चक्रवर्ती एफआईआर को मुंबई ट्रांसफर कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट चली गईं जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई और कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दे दिया। अब सीबीआई इस मामले की जांच करेगी लेकिन सीबीआई की राह इतनी आसान नहीं है। खास तौर पर इस एजेंसी का अब तक की नाकामियों का जो रिकॉर्ड रहा है उसे देखते हुए ये सही भी है। आइए कुछ ऐसे ही चर्चित केस पर नजर डालते हैं जिनमें सीबीआई गुत्थी सुलझाने में नाकाम रही।

नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड
20 अगस्त को पुणे अंधश्रधा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के विरोध में देश भर में प्रदर्शन हुए थे। शुरुआत में मामले की जांच पुणे पुलिस कर रही थी लेकिन पुलिस जांच पर सवाल उठने के बाद 2014 में मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। 20 अगस्त को हत्याकांड को सात साल पूरे हो गए लेकिन आज भी दाभोलकर के परिवार को न्याय नहीं मिल सका है। दाभोलकर की बेटी मुक्ता दाभोलकर ने कहा कि सीबीआई अब तक हत्या के सूत्रधार का पता तक नहीं लगा पाई है। मामले को लेकर विभिन्न संगठनों ने बार-बार प्रदर्शन किया लेकिन जांच का कोई नतीजा नहीं निकला। वहीं दाभोलकर के बेटे ने भी सीबीआई जांच पर सवाल खड़े किए।

आरुषि-हेमराज मर्डर केस
गाजियाबाद में 2102 को हुआ आरुषि तलवार और हेमराज हत्याकांड देश के सबसे चर्चित और रहस्यमयी हत्याकांडों में एक था। तेरह साल की आरुषि तलवार और नौकर हेमराज घर में मृत पाए गए थे। उत्तर प्रदेश की तत्काली मुख्यमंत्री मायावती ने मामले की जांच सीबीआई की सौंप दी। सीबीआई ने आरुषि के माता-पिता नूपुर तलवार और राजेश तलवार को ही आरोपी बनाया। 2013 में गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई। मामला जब हाईकोर्ट में पहुंचा तो ठहर नहीं पाया। हाईकोर्ट ने सीबीआई की जांच में कई खामियां पाईं और राजेश और नूपुर को बरी कर दिया। आखिरकार पता ही नहीं चला कि आरुषि-हेमराज का कत्ल किसने किया। अब सीबीआई ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ अपील की है।

बोफोर्स घोटाला कांड
देश के सबसे चर्चित घोटालों में एक रहा बोफोर्स कांड भी जांच सीबीआई को सौंपी गई। आरोप था कि स्वीडिश निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स ने हॉवित्जर तोपों की सप्लाई भारतीय सेना को करने के लिए हुए सौदे को पाने के लिए भारत के राजनेताओं को रक्षाकर्मियों को घूस दी थी। इस सौदे को 1437 करोड़ रुपये आंका गया था। 19 साल तक अदालत में लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकर जांच एजेंसी ने 2009 में मुख्य आरोपी क्वात्रोच्ची के खिलाफ मामला बंद करने की सिफारिश की थी। इसे जांच एजेंसी की बड़ी नाकामियों में गिना जाता है।

एयरसेल-मैक्सिस घोटाला
साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित टेलीकॉम घोटाले की जांच सीबीआई को करने को कहा था। कोर्ट ने एजेंसी को ये पता लगाने को कहा था कि क्या उस वक्त टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन ने मलेशिया की कंपनी मैक्सिस के हाथों एयरसेल के अधिग्रहण में रिश्वत ली थी। इस मामले में एजेंसी की जांच का कोई नतीजा नहीं निकला। 2019 में सीबीआई की विशेष अदालत ने मंत्री दयानिधि मारन, उनके भाई कलानिधि मारन और अन्य के खिलाफ आरोप रद्द कर दिए। इस केस में भी जांच एजेंसी की बड़ी बदनामी हुई।












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