केरल में संघ और वाम समर्थकों में हिंसक टकराव क्यों

केरल में संघ और वाम मोर्चा समर्थकों के बीच पिछले एक साल में हिंसा की वारदातों में 30 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है.

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दक्षिण भारत का राज्य केरल तेज़ी से वैचारिक लड़ाई का ख़ूनी अखाड़ा बनता जा रहा है.

हिंसा और हत्या की बढ़ती वारदातों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और वाम मोर्चा के कार्यकर्ता और समर्थक मारे जा रहे हैं

संघ ने केरल के मुख्यमंत्री पर बयान देने वाले नेता को 'निकाला'

दोनों पक्ष हिंसा के लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

नफ़रत फैलाने का आरोप

भाजपा कार्यकर्ता
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केरल के जेके नंदकुमार संघ के प्रमुख प्रचारक हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, "भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी हमें केरल से मिटा देना चाहती है."

लेकिन माकपा के पोलित ब्यूरो सदस्य और केरल के नेता एके पद्मनाभन ने संघ पर नफ़रत और हिंसा फैलाने के आरोप लगाए.

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उन्होंने कहा, "गुरुवार को मध्यप्रदेश में संघ प्रचारक कुंदन चंद्रावत ने हमारे मुख्यमंत्री (पिनाराई विजयन) की हत्या करने वाले को एक करोड़ रुपए का इनाम देने का एलान किया. यह हिंसा नहीं तो और क्या है?"

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हालांकि संघ ने इस बयान की निंदा की और इससे खुद को अलग किया है. लेकिन पद्मनाभन पूछते हैं, "क्या पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की है?"

केरल में संघ और वाम मोर्चा के बीच लड़ाई दशकों पुरानी है. एक-दूसरे के ख़िलाफ़ आरोप भी उतने ही पुराने हैं.

हिंसा में 30 फ़ीसद का इजाफ़ा

जेके नंदकुमार कहते हैं कि वाम मोर्चा ने 1947 में संघ प्रमुख गोलवलकर की एक सभा पर हमला किया था. केरल में संघ की स्थापना 1942 में हुई थी और नंदकुमार के अनुसार संघ को उसी समय से दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

लेकिन, पद्मनाभन इस इलज़ाम को सिरे से ख़ारिज करते हैं

स्थानीय मीडिया के मुताबिक़, पिछले एक साल में हिंसा की वारदातों में 30 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है.

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पुलिस के हवाले से मीडिया में छपी रिपोर्टों के अनुसार, कन्नूर ज़िले में पिछले साल मई से अब तक हिंसा की 400 घटनाएं घटी हैं. इनमें सीपीएम के 600 और बीजेपी-संघ से जुड़े 280 लोग गिरफ़्तार किए गए हैं.

भाजपा के वोट बढ़े

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पद्मनाभन के अनुसार, हिंसा की वारदातों के बढ़ने के कई कारण हैं.

वे कहते हैं, "केंद्र में भाजपा की सरकार के आने के बाद से संघ के नफ़रत फैलाने के काम में तेज़ी आई है."

दूसरी ओर, नंदकुमार के मुताबिक़, बढ़ती हिंसा के पीछे पिछले साल के विधानसभा चुनाव के नतीजे हैं. इस चुनाव में भाजपा ने न केवल एक सीट हासिल करके केरल में अपना खाता खोला बल्कि 2011 विधानसभा चुनाव के मुक़ाबले अपना वोट शेयर सौ फ़ीसद बढ़ा लिया.

पाटी को पिछले चुनाव में 15 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे जबकि, 2011 में इसे सिर्फ़ 7 प्रतिशत से वोट हासिल हुए थे.

वे कहते हैं, "सीपीएम और एलडीएफ के वोट शेयर दो प्रतिशत कम हुए".

नंदकुमार के अनुसार. ये नतीजे "सीपीएम और साझेदार पार्टियों को हज़म नहीं हुए."

'सांस्कृतिक रूप से संघ आगे बढ़ा है'

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केरल में संघ की स्थापना के 75 साल हो चुके हैं. सियासी तौर पर उसे अधिक सफलता भले न मिली हो, लेकिन सांस्कृतिक रूप से संघ 'आगे बढ़ा है'.

नंदकुमार के अनुसार, केरल में आरएसएस की 4,000 शाखाएं हैं. यह संघ के किसी भी दूसरे संगठनात्मक प्रान्त की शाखाओं से ज़्यादा है.

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में केरल से अधिक शाखाएं हैं, लेकिन आरएसएस ने प्रशासनिक सुविधा के लिए बड़े राज्यों को कई प्रांतों में बांट दिया है. इसके इलावा राज्य में संघ के 500 स्कूल हैं. नंदकुमार कहते हैं, "हम सांस्कृतिक परिवर्तन चाहते हैं और इसमें हमें कामयाबी मिली है."

वाम मोर्चा ने हमेशा संघ पर देश और समाज को बांटने के एजेंडे पर काम करने का आरोप लगाया है. मोर्चे ने अक्सर संघ के विचारों के ख़िलाफ़ लड़ने की बात कही है. तो क्या केरल में संघ का फैलना वाम मोर्चे की नाकामी है?

'समाज को बांटने की कोशिश'

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पद्मनाभन इससे इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "उन्होंने पहले दिन से केरल के समाज को बांटने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें कामयाबी कभी नहीं मिलेगी".

वे आगे कहते हैं, "केरल सेक्युलर भारत के लिए एक मिसाल है. इसकी रक्षा करने के लिए हमने अपनी जान दांव पर लगा दी है."

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