क्यों याद आ रही निक्सन और माओ की वो मुलाक़ात

डोनल्ड ट्रंप, किम जोंग उन, उत्तर कोरिया, अमरीका, चीन, माओ त्सेतुंग, रिचर्ड निक्सन
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डोनल्ड ट्रंप, किम जोंग उन, उत्तर कोरिया, अमरीका, चीन, माओ त्सेतुंग, रिचर्ड निक्सन

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन की 12 जून को सिंगापुर में मुलाक़ात होने वाली है. ये एक ऐतिहासिक मुलाक़ात मानी जा रही है.

कुछ समय पहले एक-दूसरे के दुश्मन नज़र आ रहे इन देशों की मुलाक़ात इतिहास की वो मुलाक़ात याद दिलाती है जब पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के सर्वोच्च नेता माओ त्सेतुंग 1972 में मिले थे.

इन दोनों मुलाक़ातों में कई समानताएं हैं. उत्तर कोरिया की तरह उस वक़्त चीन भी सांस्कृतिक क्रांति की उथल-पुथल के कारण पूरी दुनिया से अलग-थलग हो गया था. उसके अमरीका से क़रीब दो दशकों तक कोई औपचारिक संबंध नहीं थे.

जैसे किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के लोगों को बता रहे हैं कि उन्हें अमरीका के साथ शांतिपूर्वक रहने की ज़रूरत है, उस वक्त चीनी सरकार को भी अपने लोगों को यह समझाना पड़ा था कि तीसरी दुनिया की क्रांति में अमरीकियों का साथ ज़रूरी है.

बीबीसी के युवेन वु 1972 में एक छात्र थे और उन्होंने देखा था कि कैसे चीन में इस मुलाक़ात के लिए तैयारियां की गई थीं और निक्सन ने इसे "दुनिया को बदलने वाला हफ़्ता कहा था".


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कैसे हुई दौरे की घोषणा?

15 जुलाई 1971 को स्थानीय समयानुसार शाम 7 बजे रिचर्ड निक्सन ने कैलिफ़ोर्निया में एनबीसी टेलीविजन से घोषणा की थी कि उन्होंने "दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य करने के लिए" प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई का चीनी दौरे का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है.

ठीक उसी समय 16 जुलाई को बीजिंग में सुबह 10 बजे चीन के राष्ट्रीय प्रसारक ने भी यही घोषणा की​ जिससे ये साफ़ हो गया कि राष्ट्रपति निक्सन ने पहले चीन जाने की मंशा ज़ाहिर की थी.

इस घोषणा ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. ये साफ़ था कि इस घोषणा के लिए बहुत सावधानी से तैयारी की गई थी.

माओ त्सेतुंग
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माओ त्सेतुंग

माओ का रणनीतिक गुणाभाग

अमरीकी राष्ट्रप​ति को बुलाने के पीछे एक बड़ा कारण ये था कि चीन के सोवियत संघ के साथ रिश्ते ख़राब हो रहे थे और उसे अमरीका से ज़्यादा सोवियत संघ से ख़तरा महसूस हो रहा था.

पहले, माओ ने 1970 में अमरीकी पत्रकार एदगार स्नो से अमरीका के साथ संबंधों को सुधारने के लिए उनकी मंशा को लेकर बात की. इसके बाद 1971 में चीन ने अमरीकी टेबल टेनिस टीम को चीन में आमंत्रित किया.

इसके कुछ महीनों बाद रिचर्ड निक्सन के सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने बीजिंग का एक गुप्त दौरा किया. इस दौरान चीन ने अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन को चीन आने का न्यौता दिया.

जब एक बार चीन का मक़सद तय हो गया तो उस दौरे को सफल बनाने के लिए हर ​तरह की कोशिश की गई. इसमें प्रोपेगेंडा मशीन के इस्तेमाल से लेकर लोगों को संगठित करना तक शामिल था.


डोनल्ड ट्रंप, किम जोंग उन, उत्तर कोरिया, अमरीका, चीन, माओ त्सेतुंग, रिचर्ड निक्सन
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मीडिया को निर्देश

मैं तब 15 साल का था और बीजिंग में एक स्कूल में पढ़ता था. मुझे उस दौरे के बारे में और उसे लेकर दोस्तों के बीच होने वाली बातों के बारे में ज़्यादा याद नहीं है.

लेकिन, हम सभी को एक चीज़ याद है और वो है अमरीकी यात्रियों को लेकर चीनी सरकार ने अपना रुख़ तय कर रखा था: "न विनम्रता न घमंड, न ठंडा न गर्म."

कई सालों बाद मैंने कई ऐसे दिलचस्प और हास्यास्पद उदाहरणों के बारे में सुना जिनमें सरकार ने अपने इस सिद्धांत को अपनाया था.



चीन में सेंट्रल ब्रॉडकास्टिंग स्टेशन के पूर्व प्रमुख यांग चेंगक्वान बताते हैं कि उस वक्त मीडिया को ये निर्देश दिए गए थे कि अमरीका को लेकर चीन के रवैये में कोई बदलाव नहीं दिखाया जाएगा.

इसका मतलब था, "हम अब भी उनके ख़िलाफ़ थे, लेकिन राष्ट्रपति निक्सन हमारे अतिथि हैं तो उनके सामने हम उन पर चिल्ला नहीं सकते."

नतीजतन मीडिया के लिए अमरीका विरोधी कुछ कॉन्टेंट बनाया तो जाता रहा, लेकिन अब बहुत ज़्यादा नहीं था.

चीन ये भी समझता था कि ये दौरा अमरीका में कैसे देखा जा रहा था और रिचर्ड निक्सन अमरीकियों को इस दौरे की प्रगति की जानकारी देने के लिए कैसे लाइव प्रसारण करना चाहेंगे.

अमरीकी टेक्नीशियन चीन में एक सैटलाइट स्टेशन तक लगाना चाहते थे, लेकिन बीजिंग ने इससे इनकार कर दिया था. लेकिन, बाद में चीन इसे लेकर थोड़ा नरम हो गया.

प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई ने इसकी इजाज़त दे दी. पर इसके लिए चीन ने अमरीकी सैटलाइट उपकरण ख़रीदा और शाम के समाचार लाइव प्रसारण करने के लिए उसे अमरीकियों को किराए पर दिया.

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सुरक्षा को लेकर हंगामा

इस दौरे में सुरक्षा एक बहुत बड़ा मसला था. मेजबान देश के लिए यह बहुत ज़रूरी था कि ये मुलाक़ात बिना किसी गड़बड़ के हो.

चीन को लेकर जिज्ञासा रखने वाले अमरीकियों को भी वो चीन के बारे में ज़्यादा कुछ जानने से रोकना चाहते थे.

जैसे-जैसे दौरे का समय नज़दीक आता गया, राजधानी बीजिंग में सुरक्षा अभियान चलाया गया और कई अपराधियों को पकड़ा गया, किसी को हाउस अरेस्ट किया तो किसी को निगरानी में रखा गया.

उस दौरान कुछ ऐसी ख़बरें भी आई थीं कि स्कूल और ऑफिस का टाइम बढ़ा दिया गया है ताकि रात आठ बजे से पहले बहुत ज़्यादा लोग बाहर न दिखें.

मेरी टीचर को याद है कि उन्हें बोला गया था कि टीचर्स को अपनी-अपनी क्लास को संभालना है ताकि सड़कों पर कोई हंगामा न हो. एक बच्चे को इसलिए गिरफ़्तार कर लिया गया था क्योंकि उसके पास चाक़ू मिला था.

कुछ वि​द्यार्थियों ने बताया कि कैसे उन्हें विदेशी मीडिया से बात करना सिखाया गया था ताकि वो मुश्किल सवालों से बच सकें. कुछ ऐसे सवाल जैसे कि ''मार्शल लिन बियाओ कहां हैं?''

कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व नेता और माओ के चुने हुए उत्तराधिकारी मार्शल चीन से भाग गए थे और मंगोलिया में विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी.

विद्यार्थियों को ये बोला गया था, "ये अब भी एक रहस्य है ​जिसे विदेशियों के सामने जाहिर नहीं करना है."

कुछ इस तरह के सवालों के लिए भी तैयारी कराई गई थी जैसे, "क्या आपके पास खाने और पहनने के लिए पर्याप्त सामान हैं?" और "क्या आप अमरीका को पसंद करते हैं?"

ऐसे सवालों के जवाब में उन्हें कहना था कि "सवाल समझ नहीं आया या तुरंत भाग जाना था."

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दीवार पर नक़ली पर्यटक

एक दोस्ताना माहौल बनाने के लिए ऐसे सभी नारे लिखे पोस्टर हटा दिए गए जो परेशानी पैदा कर सकते थे. इसके बदले उस वक़्त के हिसाब से फिट होने वाले नारे लगा दिए गए.

दुकानों में कई तरह के सामान मुहैया कराने के लिए ट्रकों के ज़रिए आपूर्ति कराई गई.

यहां तक कि निक्सन के साथ आने वाले प्रतिनिधिमंडल और मीडिया से मिलाने के लिए कुछ लोग भी तैयार किए गए थे.

न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार मैक्स फ्रैंकल ने रिचर्ड निक्सन के दौरे को लेकर एक रिपोर्ट की थी जिसके लिए उन्हें 1973 में ​पुलित्ज़र पुरस्कार दिया गया. मैक्स भी चीन जाने वाले पत्रकारों में शामिल थे.

उन्होंने 24 फ़रवरी को निक्सन के दौरे में देखा था कि "चीन की दीवार पर कुछ पर्यटकों को जानबूझकर खड़ा किया गया है जो कैमरे के सामने ठीक से मिल सकें. एक अच्छी तरह से तैयार होकर आई महिला को हाथ मिलाने की इजाज़त ​दी गई थी."

इससे पता चलता था कि ये 'पर्यटक' इस राजनीतिक काम को करने के लिए ख़ासतौर पर तैयार किए गए हैं.

फ़ीनिक्स न्यूज़ वेबसाइट के लिए लिखने वाले एक व्यक्ति ने 2008 में कहा था कि जब वह एक छोटी सी फ़ैक्ट्री में काम करते थे तब उन्हें राजनीतिक रूप से भरोसेमंद 10 लोगों को लाने के लिए कहा गया था, जो इस कार्यक्रम में​ हिस्सा ले सकें.

उन्हें अच्छी तरह तैयार होने के लिए कहा गया था. उन्हें चीन की दीवार पर पर्यटक बनना था और अमरीकियों से दूरी बनाए रखनी थी ताकि कोई सवाल पूछने पर वो यह दिखा सकें कि उन्हें समझ में नहीं आया.


जब हुई थी बर्फ़बारी

चीन की दीवार का दौरा करने से पहले बर्फ़बारी होने लगी थी. चीन के हजारों लोगों और सेना के जवानों ने रात भर काम करके गलियों में रास्ता बनाया ताकि अमरीका से आया दल वहां से जा सके. अमरीकी इससे बहुत प्रभावित हुए.

वहीं, रिचर्ड निक्सन को चीन की दीवार बहुत पसंद आई जिसके लिए उन्होंने कहा कि "चीन अतीत में कैसा था और भविष्य में कैसा होगा ये इसका प्रतीक है."

उन्होंने पत्रकारों और चीनी मेहमानों से कहा था, "जब हम इस दीवार को देखते हैं तो हम लोगों के बीच किसी भी तरह की दीवार को नहीं चाहते."

1972 के बाद से अमरीका और चीन के संबंध काफी उतार-चढ़ाव वाले रहे. लेकिन, राष्ट्रपति निक्सन की ऐतिहासिक यात्रा ने इन रिश्तों की शुरुआत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अब सबकी निगाहें इस उम्मीद से डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन की मुलाकात पर है कि यह छह दशकों की दुश्मनी के अंत की शुरुआत और कोरियाई प्रायद्वीप पर शांति और स्थिरता का प्रारंभ कर पाएगी.

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