हीरो से जीरो बनते जा रहे हैं राहुल

नयी दिल्ली। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने तय कर लिया है कि 2014 का चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, लेकिन पार्टी ने राहुल को पीएम पद की जिम्मेदारी नहीं दी है। पार्टी ने साफ किया है कि राहुल प्रचार की कमान संभालेंगे।

मतलब तो साफ है कि अगर कांग्रेस को अगर मौका मिला तो पीएम राहुल ही होंगे। पार्टी कह रही है कि राहुल को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन हकीकत ये भी है कि राहुल को अब तक कामयाबी की तुलना में नाकामी ज्यादा मिली है।

राहुल राजनीति के रेस में पिछड़ रहे हैं। टीवी चैनलों और अखबारों में हो रहे सर्वे से यहीं बात सामने आ रही है कि मोदी दूसरे से तीसरे पायदान पर फिसल गए है। राहुल गांधी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल से भी पिछड़ रहे है। ऐसे में अहम सवाल ये है कि आखिर कांग्रेस के इस युवराज की हालत ऐसी कैसे हो गई? ये वहीं राहुल है जिन्होंने 2009 में मुंबई लोकल ट्रेन में सफर कर लोगों को चौंका दिया था। दलित महिला के घर खाना खाकर अपनी लोकप्रियता को चार चांद लगा दिया था, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस का ये हीरो जीरो बनता जा रहा है।

नहीं किया कोई चमत्कार

नहीं किया कोई चमत्कार

राहुल ने 2004 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की, लेकिन उनके नाम पर कोई बड़ी कामयाबी नहीं जुड़ पाई। उन्हें युवा और ऊर्जावान चेहरे बतौर पेश करने की बार-बार कोशिश की गई, लेकिन नतीजे नहीं मिल पाए। उनके नेतृत्व में पार्टी ने बिहार और यूपी समेत 4 अहम राज्यों में सीटें गंवाई।

जिम्मेदारी से भागने की छवि

जिम्मेदारी से भागने की छवि

राहुल की छवि पार्टी में जिम्मेदारी संभालने से भागने वालों के तौर पर बनती जा रही हैं। कभी पार्टी के लोगों की तरफ से पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी संभालने की बात उछली तो कभी सरकार में पद संभालने की। राहुल गांधी ने जनवरी 2013 तक कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं ली। लेकिन इससे ये संकेत गया कि राहुल गांधी कोई जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं।

कांग्रेस को ढांचे को बदलने की कोशिश

कांग्रेस को ढांचे को बदलने की कोशिश

कांग्रेस में ताकत एक जगह केंद्रीकृत रखने की प्रथ रही है। कांग्रेस के नेता अवतार में रहकर काम करना पसंद करते है, राहुल गांधी इस कार्यशैली से उलट एक अलग शैली अपना रहे हैं। राहुल ताकत को विकेंद्रीकृत करने की कोशिश कर रहे है।

जो बोला उसे किया नहीं

जो बोला उसे किया नहीं

राहुल गांधी की सोच अच्छी और आधुनिक है, लेकिन वो अपनी सोच को हकीकत में उतार नहीं पाए। राजनीति में 10 साल बिताने के बाद भी राहुल कोई चमत्कार नहीं कर पाए। राहुल हमेशा कहते रहे कि युवाओं को आगे लाएंगे, सबके लिए पार्टी के दरवाजे खुले रहेंगे, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ।

ठोस समाधान नहीं

ठोस समाधान नहीं

राहुल जब कांग्रेस के लिए बोलते है लगता है कि कोई विरोधी बोल रहा है। राहुल कहते है बदलाव आना है। इसे बदलना है। ऐसे में सवाल यहीं है कि जब सत्ता आपके हाथ में है तो अबतक बदला क्यों नहीं। इसी बात को लेकर राहुल गांधी की विश्वसनीयता पर सवाल उठता जा रहा है। राहुल के पास समस्याओं की लिस्ट तो है लेकिन उसका कोई ठोस जवाब नहीं है।

जमीनी नेताओं से दूर

जमीनी नेताओं से दूर

राहुल गांधी के सलाहकार दून स्कूल टाइप के लोग हैं। दून स्कूल का होने में कोई बुराई नहीं है। पर उनके वार रूम में जमीनी नेताओं के लिए कोई जगह नहीं है। अफसोस कि उन्हें कोई इस बात को बताता भी नहीं कि लुटियंस की दिल्ली में बैठकर गरीबों,मजदूरों,दलितों वगैरह की राजनीति नहीं होती।

गरीबी एक मानसिकता है

गरीबी एक मानसिकता है

राहुल गांधी ने हाल ही में कहा कि गरीबी एक प्रकार की मानसिकता है। अब जरा बताइये कि जिस देश में 30 करोड़ से भी अधिक लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहते हैं, वहां पर इस तरह की गैर-जिम्मेदार बयानबाजी करने वाला नेता कितना संवेदनहीन होगा। उसके मानसिक दिवालियापन का कोई भी अंदाजा लगा सकता हैं। साफ है कि राहुल गांधी को देश के मूल सवालों की अभी समझ नहीं है।

नहीं संभाल पाए नेतृत्व

नहीं संभाल पाए नेतृत्व

राहुल को नेतृत्व तो मिला, लेकिन वो उनको अपने गुणों की वजह से नहीं बल्कि सोनिया के बेटे होने के चलते मिला। उन्हें मिली ये जिम्मेदारी पैतृक थी। राहुल इन नेतृत्व को संभाल नहीं पाएं।

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