सेना से रिटायर हैं शहीद भगत सिंह के भतीजे, 28 घंटे तक आतंकियों पर हमला करने की वजह से मिला वीर चक्र

नई दिल्‍ली। 28 सितंबर को देश और दुनिया भारत की आजादी के लिए शहीद हो जाने वाले युवा क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह को उनके जन्‍मदिन पर याद कर रही थी। लेकिन देर शाम होते-होते उनके भतीजे शेहोनान सिंह के बारे में हर तरफ चर्चा होने लगी। लोग कहने लगे कि भतीजे ने अपने चाचा का नाम रोशन किया और उनकी विरासत को आगे बढ़ाया। शहीद भगत सिंह के भतीजे शेहोनान सिंह इंडियन आर्मी से रिटायर हैं और उनका नाम हैं मेजर जनरल (रिटायर्ड) शेहोनान सिंह। मेजर जनरल सिंह एक प्रशिक्षित कमांडो थे और जम्‍मू कश्‍मीर जैसे सेक्‍टर्स में तैनात रह चुके हैं।

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    Indian Army से रिटायर हैं शहीद Bhagat Singh के भतीजे, जानिए उनके वीरता की कहानी | वनइंडिया हिंदी

    छोटे भाई रणबीर सिंह के बेटे

    छोटे भाई रणबीर सिंह के बेटे

    मेजर जनरल सिंह, भगत सिंह के छोटे भाई सरदार रणबीर सिंह के बेटे हैं। पंजाब के लुधियाना में उनका जन्‍म सन् 1950 में हुआ था। मेजर जनर सिंह ने 30 साल तक इस राज को अपने दिल में छिपाकर रखा था कि वह भगत सिंह के भतीजे हैं। शेहोनान सिंह के पिता रणबीर सिंह ने समाज में जारी कुरीतियों को तोड़ने के लिए एक विधवा से शादी की थी। मेजर जनरल सिंह को सन् 1988 में वीर चक्र से भी सम्‍मानित किया जा चुका है। उन्‍होंने 12 साल तक जम्‍मू कश्मीर में उस दौर में अपनी सेवाएं दी जब वहां पर आतंकवाद ने सिर उठाना शुरू कर दिया था। सेना से रिटायर होने के बाद मेजर जनरल सिंह अब आगरा में अपना जीवन बिता रहे हैं।

    ऑपरेशन पवन का अहम हिस्‍सा थे शेहोनान

    ऑपरेशन पवन का अहम हिस्‍सा थे शेहोनान

    वीरता, भगत सिंह के खून में थी और मेजर जनरल सिंह ने इस बात को सेना में अपनी सर्विस और ऑपरेशन पवन के दौरान साबित किया। 11 अक्टूबर, 1987 को भारतीय शांति सेना ने श्रीलंका में जाफना को लिट्टे के कब्जे से मुक्त कराने के लिए ऑपरेशन पवन लॉन्‍च किया। भारत और श्रीलंका के बीच 29 जुलाई 1987 को एक शांति समझौता हुआ था। यह समझौता भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जे.आर. जयवद्धने के बीच साइन हुआ था। इसके तहत ही भारतीय सेना को वहां भेजा गया। सन् 1987 में मेजर जनरल सिंह मेजर रैंक के ऑफिसर थे। वह उस समय यूनाइटेड नेशंस के पीस कीपिंग मिशन के तहत भारतीय दल का नेतृत्‍व कर रहे थे। वह श्रीलंका में 10 पैरा कमांडो यूनिट के साथ बतौर सेकेंड-इन-कमांड तैनात थे।

    सम्‍मानित हुए वीर चक्र से

    सम्‍मानित हुए वीर चक्र से

    12 अक्‍टूबर 1987 को रात करीब दो बजे मेजर जनरल सिंह की बटालियन को आतंकियों ने घेर लिया था। उनकी बटालियन तब कोंडेविल इलाके में एक आतंकियों के अड्डे पर थी। मेजर जनरल सिंह और उनके साथ कमांडो ने छत पर हेलीकॉप्‍टर से लैंडिंग की। इसके बाद उन्‍होंने अपनी पोजिशन ली। 28 घंटे तक उन्‍होंने मोर्चा संभाले रखा और आतंकियों पर भारी पड़े। 13 अक्‍टूबर 1987 को सुबह 6 बजे उनका संपर्क भारतीय सेना से हो सका। इस पूरी अवधि में मेजर जनरल सिंह ने आतंकियों को हावी होने से रोका और प्रभावी ढंग से उन्‍हें उलझा कर रखा। 6 बजकर 40 मिनट पर ही उन्‍होंने अपनी पोजिशन को छोड़ा। मेजर जनरल सिंह ने एक कमांडो और कमांडिंग ऑफिसर होने के नाते जिस अदम्‍य साहस और वीरता का प्रदर्शन किया था, उसकी वजह से उन्‍हें सन् 1988 में गणतंत्र दिवस के मौके पर वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था।

    'हमने भगत सिंह के विचारों को मार दिया'

    'हमने भगत सिंह के विचारों को मार दिया'

    पिछले वर्ष शहीद भगत सिंह की 88वीं पुण्‍यतिथि पर बोलते हुए मेजर जनरल सिंह ने कहा था कि 23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने भगत सिंह को फांसी पर लटककार उन्‍हें मार दिया था लेकिन आज 2019 में हम उनके विचारों को खत्‍म कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा था, 'वह चाहते थे कि लोग उनके विचारों के बारे में पढ़ें और उन्‍हें समझें। भगत सिंह खुश होंगे अगर एक भी व्‍यक्ति आज अपनी राय कायम कर सके, अगर कुछ असल वैचारिक व्‍यक्ति है और जो अपने दिमाग की सुन सके। जो लोग टीवी देखकर और सोशल मीडिया पर अपनी राय को आधारित करते हैं, वह वास्‍तविक विचारक नहीं हैं।' उनका कहना था कि सन् 1920 में भगत सिंह ने लिखा था कि 20वीं सदी में हम धर्म, जाति और रंग की बात करते हैं और यह शर्मनाक है। लेकिन आज 100 साल बाद भी देश में इस पर ही चर्चा होती है।

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