OIC में भारत को 'गेस्ट ऑफ ऑनर' के तौर पर बुलाने पर पाकिस्तान को क्यों लगी मिर्ची?

नई दिल्ली- आतंक को पनाह देने की नीतियों के कारण आज पाकिस्तान को न केवल भारत का बेहद सख्त रवैया झेलना पड़ रहा है, बल्कि उसकी ऐसी हालत बन है कि मुस्लिम देश भी उससे कन्नी काटने लगे हैं। पाकिस्तान की चेतावनियों को नकार कर जिस तरह से पहलीबार 47 मुस्लिम बहुल देशों के समूह ऑरेगेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (OIC)में भारत को अपनी बात रखने का मौका मिला है, वह उसे सुधर जाने की आखिरी चेतावनी है। अब यह पाकिस्तान पर निर्भर है कि वो बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों को स्वीकार करे या अपनी बर्बादी का रास्ता खुद से तैयार करे।

मुस्लिम देशों के मंच से आतंकवाद को सख्त संदेश

मुस्लिम देशों के मंच से आतंकवाद को सख्त संदेश

ओआईसी के मंच पर 'गेस्ट ऑफ ऑनर' के तौर पर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आतंकवाद पर देश की नीति से मुस्लिम देशों को आसान शब्दों में परिचय करा दिया है। उन्होंने कहा है,"आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह हो भी नहीं सकता। जैसे इस्लाम का असल अर्थ ही शांति है, अल्लाह के 99 नामों में से एक का भी अर्थ हिंसा से नहीं है। उसी तरह दुनिया का हर धर्म शांति,संवेदना और भाईचारे के लिए है।" उन्होंने कहा कि वो महात्मा गांधी की धरती से आई हैं, जहां हर प्रार्थना का अंत सबके लिए शांति के आह्वान के साथ होता है। उन्होंने साफ किया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई मानवीयता और अमानवीय शक्तिों के बीच है। सुषमा स्वराज किसी धर्म संसद में बोलने नहीं गई थीं। उन्होंने भले ही पाकिस्तान का नाम न लिया हो, लेकिन उनके इशारे सबके लिए स्पष्ट थे। ये भी संयोग है कि जिस मंच का उपयोग पाकिस्तान कई दशकों से भारत के खिलाफ आग उगलने लिए करता था, उसी मंच पर अब मुस्लिम देश भारत की बात संजिदा होकर सुन रहे थे और पाकिस्तान उससे नदारद था।

पाकिस्तान को अपने संगठन ने ही दिया झटका

पाकिस्तान को अपने संगठन ने ही दिया झटका

अगर ऑरेगेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (OIC) के इतिहास को टटोलें तो वहां पर भारत को आतंकवाद के खिलाफ बोलने का मौका मिलना बहुत ही बड़ी बात है। जिस मंच को 52 साल पहले यानि 1967 में पाकिस्तान के विरोध के चलते भारत को छोड़ना पड़ा था, वही मंच आज भारत की मौजूदगी से खुशी का इजहार कर रहा है। पाकिस्तान ने अबतक इस मंच को भारत विरोधी हथियार के तौर पर ही इस्तेमाल किया था। चाहे जम्मू-कश्मीर का मामला हो या अयोध्या विवादित ढांचे का मामला या फिर भारतीय मुसलमानों का मानवाधिकार का बहाना, हर बात में पाकिस्तान ने इसका जमकर दुरुपयोग किया। शुरू में तो भारत ने पाकिस्तान की इस हरकत का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार विरोध दर्ज कराया, लेकिन 21वीं सदी आते-आते कोई प्रतिक्रिया देना भी बंद कर दिया था। अब समझा जा सकता है कि जिस संगठन का पाकिस्तान कभी इतना चहेता था, वह भारत के लिए अगर उसे छोड़ने के लिए तैयार हो चुका है, तो इसके मायने क्या हैं।

पाकिस्तान से मुस्लिम देशों की बेरुखी का कारण समझिए

पाकिस्तान से मुस्लिम देशों की बेरुखी का कारण समझिए

आज खाड़ी के कई मुस्लिम देश पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से परेशान हो चुके हैं। जबकि, वे जानते हैं कि भारत आतंकवाद से लड़ रहा है, किसी धर्म या देश के खिलाफ नहीं। हमेशा से ही भारत की नीति शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की रही है। हम अनेकता में एकता को जीने वाले देश हैं, यह बात अब मुस्लिम देशों को भी समझ आ चुकी है। कहा जा रहा है कि भारत को इस सम्मेलन में बुलाने में सबसे बड़ी भूमिक सऊदी अरब की रही है, जिसका इस संगठन पर दबदबा है। सऊदी अरब के साथ ही संयुक्त अरब अमीरात के दखल ने भी भारत के लिए पाकिस्तान को किनारे रखने का रास्ता बनाया है। इनके अलावा तुर्की, जॉर्डन,मोरक्को और ईरान की भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। मतलब इतने सारे मुस्लिम राष्ट्र आज भारत के लिए पाकिस्तान से दूरी बनाने के लिए तैयार हैं। मतलब, जिस आतंकवाद को पाकिस्तान ने अबतक अपना जरिया बनाया, आज वही उसे सबसे दूर कर रहा है। कहा जा रहा है कि इस सम्मेलन में भारत को शामिल किए जाने में अमेरिका और इजरायल ने भी परोक्ष रूप से अपनी भूमिका निभाई है।

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