बीजू पटनायक को क्यों नहीं भूल पाता इंडोनेशिया

बिजयानंदा पटनायक को लोग प्यार से बीजू पटनायक कहते थे. बीजू पटनायक की पहचान एक स्वतंत्रता सेनानी, साहसी पायलट और बड़े राजनेता के रूप में रही है.
उन्हें आधुनिक ओडिशा का शिल्पकार भी माना जाता है. इसके अलावा पटनायक को एक वाक़ये के लिए हमेशा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर याद किया जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया के दौरे पर हैं और इंडोनेशिया की आज़ादी में बीजू पटनायक की अहम भूमिका रही थी.
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में जवाहरलाल नेहरू और बीजू पटनायक की दोस्ती काफ़ी भरोसेमंद मानी जाती थी.
प्राचीन समय से ही भारत और इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंध रहे हैं इसलिए नेहरू की दिलचस्पी इंडोनेशिया की स्वतंत्रता की लड़ाई में भी थी.
आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ थे और उन्होंने बीजू पटनायक को इंडोनेशिया को डचों से मुक्त कराने में मदद करने की ज़िम्मेदारी दी थी.
नेहरू ने इंडोनेशियाई लड़ाकों को डचों से बचाने के लिए कहा था. नेहरू के कहने पर बीजू पटनायक पायलट के तौर पर 1948 में ओल्ड डकोटा एयरक्राफ़्ट लेकर सिंगापुर से होते हुए जकार्ता पहुंचे थे.
यहां वो इंडोनेशियाई स्वतंत्रता सेनानियों को बचाने पहुंचे थे. डच सेना ने पटनायक के इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते ही उन्हें मार गिराने कोशिश की थी.
पटनायक को जर्काता के पास आनन-फानन में उतरना पड़ा था. वहां उन्होंने जापानी सेना के बचे ईंधन का इस्तेमाल किया था. इसके बाद उन्होंने कई विद्रोही इलाक़ों में दस्तक दी और वो अपने साथ प्रमुख विद्रोही सुल्तान शहरयार और सुकर्णो को लेकर दिल्ली आ गए थे और नेहरू के साथ गोपनीय बैठक कराई थी.
इसके बाद डॉ. सुकर्णो आज़ाद देश इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति बने. इस बहादुरी के काम के लिए पटनायक को मानद रूप से इंडोनेशिया की नागरिकता दी गई और उन्हें इंडोनेशिया के सर्वोच्च सम्मान 'भूमि पुत्र' से नवाज़ा गया था.
शायद ही यह पुरस्कार किसी विदेशी को दिया जाता है. 1996 में इंडोनेशिया ने 50वां स्वतंत्रता दिवस मनाया और बीजू पटनायक को सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार 'बिंताग जसा उताम' से सम्मानित किया गया था.
जिस दिन सुकर्णो की बेटी पैदा हुई उस दिन तेज़ बारिश हो रही थी और बादल गरज रहे थे, यही वजह थी कि बीजू पटनायक ने नाम सुझाया--मेघावती.
पटनायक ने तिब्बत और भारत को हवाई संपर्क से जोड़ने की कोशिश की थी. ऐसा उन्होंने तिब्बत के 1951 में चीन के क़ब्ज़े से पहले ही किया था, लेकिन सरकार से पूरी मदद नहीं मिलने के कारण वो नाकाम रहे थे.












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