प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना: मोदी ने लॉन्चिंग के लिए गोरखपुर को ही क्यों चुना?
दिल्ली- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को बीजेपी 2019 के चुनावों के लिए एक बड़े गेमचेंजर के तौर पर देख रही है। उसके हिसाब से यह सोच सही भी है। देश के 12 करोड़ से ज्यादा छोटे और मझोले किसानों के खातों में चुनाव से ठीक पहले 2 हजार रुपये की रकम सीधे पहुंचना कोई छोटी बात नहीं रहने वाली है। बीजेपी जिन लोक-लुभावन फैसलों के जरिए चुनावी वैतरणी पार करने की आस लगाए बैठी है, उसमें यह बहुत ही अहम है। लेकिन, सवाल ये उठता है कि इस भारी-भरकम योजना को लॉन्च करने के लिए नरेंद्र मोदी ने आखिर गोरखपुर को ही क्यों चुना?

पूर्वांचल और बुंदेलखंड पर नजर
एक आंकड़े के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल करीब 2.17 करोड़ छोटे और मझोले किसान हैं। लॉन्चिंग के पहले ही दिन इनमें से करीब 40 लाख किसानों के खातों में सीधे नई योजना के तहत पैसे पहुंच गए। अगर पश्चिमी और सेंट्रल यूपी से तुलना करें तो पूर्वांचल और बुंदेलखंड के इलाकों में किसानों की हालत ज्यादा दयनीय है। लेकिन, फिर भी इन इलाकों के ज्यादातर लोग खेती और उसी से जुड़े रोजगारों पर निर्भर हैं। गोरखपुर के आसपास गन्ना किसानों की भी भारी तादाद है। इसलिए शायद मोदी को लगा कि अगर वोट में तब्दील होने वाले किसानों तक सीधे पहुंच बनानी है, तो गोरखपुर से बेहतरीन विकल्प नहीं हो सकता।

मोदी-योगी का गढ़
गोरखपुर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ है, तो वाराणसी खुद प्रधानमंत्री मोदी का। अगर भाजपा ये दावा कर रही है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में वो यूपी की 80 में से 73 के बदले 74 सीटें जीत सकती है,लेकिन 72 नहीं होगी, तो वह पूर्वांचल को कभी नजरअंदाज नहीं कर सकती। इस क्षेत्र में लोकसभा की 26 सीटें हैं- गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, देवरिया, कुशीनगर, बांसगांव, फैजाबाद, बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, डुमरियागंज, महराजगंज, अंबेडकरनगर, बस्ती, संत कबीर नगर, सलेमपुर, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, भदोही, मिर्जापुर, फतेहपुर, फूलपुर, इलाहाबाद(प्रयागराज) और प्रतापगढ़। 2014 में इसमें से आजमगढ़ को छोड़कर सारी सीटें बीजेपी और उसकी सहयोगी अपना दल ने जीती थी। 2016 में भी मोदी गोरखपुर में ही खाद कारखाने का शिलान्यास कर गए थे। यही नहीं, कहा जाता है कि यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी की शानदार सफलता के पीछे उज्ज्वला योजना का बहुत बड़ा रोल है। 1 मई, 2016 को पीएम मोदी ने इसकी शुरुआत भी पूर्वांचल यानि बलिया से ही की थी।

प्रियंका फैक्टर
वैसे तो प्रियंका गांधी वाड्रा पहले से ही अपने भाई और मां के लिए राजनीतिक अभियान में शामिल होती रही हैं। अब जब राहुल गांधी ने उन्हें आधिकारिक रूप से पार्टी की जिम्मेदारी सौंपी है, तो उन्हें पूर्वी यूपी की ही जिम्मेदारी मिली है। शायद पहली बार अमेठी और रायबरेली की पुश्तैनी सीट से निकलकर प्रियंका बीजेपी को पूर्वांचल में चुनौती देने जा रही हैं। बीजेपी को भी इस बात का पूरा इल्म है। ऊपर से भले ही वो उन्हें ज्यादा भाव नहीं देना चाहती, लेकिन कहीं न कहीं पीएम किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत के लिए गोरखपुर को चुनने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है।

उपचुनाव हुई हार और साथियों की नाराजगी का डर
2014 की लोकसभा और यूपी विधानसभा चुनावों में भारी जीत के बाद यूपी के जिन तीन लोकसभा उपचुनावों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था, उनमें कैराना को छोड़कर गोरखपुर और फूलपुर दोनों ही पूर्वांचल में हैं। उप चुनाव के बारे में कहा जाता है कि बीजेपी को उसकी सहयोगियों ने दिल से साथ नहीं दिया था। आज भी अनुप्रिया पटेल और ओम प्रकाश राजभर की नाराजगी की खबरें आए दिन सुर्खियों में रहती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह या यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सबको पता है कि दिल्ली जीतनी है, तो यूपी की उपेक्षा नहीं कर सकते और यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को फतह करना भी उतना ही जरूरी है।
एक खास बात ये भी है कि गोरखपुर जिला बिहार के गोपालगंज,सीवान और चंपराण से सटा है। यहां कि बोली-वाणी भी मिलती है। बीजेपी और मोदी को पता है कि 2019 में भी 2014 दोहराना है, तो पूर्वांचल में पिछले चुनाव के प्रदर्शन को बरकरार रखना होगा और बिहार में स्थिति और बेहतर करनी है। क्योंकि, लखनऊ के रास्ते दिल्ली जाने वाली गाड़ी तभी 7 लोक कल्याण मार्ग तक पहुंचेगी, जब वो पूर्वांचल से मस्ती भरी चाल में चल पड़ेगी।












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