स्टालिन ने अब PM मोदी को क्यों लिखा लेटर? श्रीलंका के किस बात पर भड़का तमिलनाडु? भारत की एंट्री अब जरूरी
MK Stalin Letter PM Narendra Modi: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखा गया लंबा और तीखा पत्र अचानक एक बार फिर श्रीलंका के तमिलों के भविष्य को दक्षिण एशिया की राजनीति के केंद्र में ले आया है। यह कोई सामान्य राजनीतिक चिट्ठी नहीं है बल्कि ऐसे वक्त पर उठाया गया कदम है जब श्रीलंका एक नया संविधान बनाने की तैयारी कर रहा है और भारत अब तक इस पूरे मामले में कूटनीतिक संयम बनाए हुए था।
स्टालिन ने यह पत्र भारत और श्रीलंका दोनों के तमिल नेताओं से मिले "विस्तृत अभ्यावेदनों" के बाद लिखा। उनका साफ कहना है कि अगर इस समय भारत ने दखल नहीं दिया तो श्रीलंका के तमिलों को एक बार फिर हाशिए पर धकेला जा सकता है।

श्रीलंकाई तमिलों से तमिलनाडु का भावनात्मक रिश्ता
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक स्टालिन अपने पत्र की शुरुआत ही भावनात्मक लेकिन राजनीतिक रूप से मजबूत आधार पर करते हैं। वह लिखते हैं कि तमिलनाडु और श्रीलंका के तमिलों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध हैं। बतौर मुख्यमंत्री उनका यह कर्तव्य बनता है कि वह श्रीलंका के नए संविधान से जुड़े खतरे पर भारत सरकार को आगाह करें।
उनका कहना है कि श्रीलंकाई तमिलों ने पिछले 77 सालों से भेदभाव, हिंसा और अधिकारों के हनन को झेला है। यह समस्या आज की नहीं बल्कि श्रीलंका के आजादी के बाद बनी राजनीतिक संरचना से जुड़ी हुई है।
श्रीलंका का संविधान और तमिलों की चिंता
स्टालिन श्रीलंका के पुराने संविधानों 1947, 1972 और 1978 का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ये सभी एकात्मक यानी यूनिटरी स्टेट मॉडल पर आधारित रहे हैं। उनके मुताबिक यही ढांचा तमिलों के खिलाफ जातीय हिंसा, जमीन कब्जे और पहचान मिटाने जैसी नीतियों को जन्म देता रहा है।
गृहयुद्ध खत्म होने के बाद भी तमिलों की हालत नहीं सुधरी। उनके पारंपरिक इलाकों में जनसंख्या संरचना बदली गई और उनकी राजनीतिक आवाज को कमजोर किया गया।
नया संविधान और 'एककियाराज्य' का डर
इस पत्र का असली ट्रिगर श्रीलंका में बन रहा नया संविधान है। मौजूदा राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके की सरकार संसद में भारी बहुमत में है और वह संविधान में बदलाव की प्रक्रिया तेज कर रही है।
स्टालिन का आरोप है कि सरकार इसे जातीय विवाद सुलझाने का नाम दे रही है लेकिन असल में इसमें फिर से 'एककियाराज्य' यानी मजबूत यूनिटरी ढांचा थोपने की कोशिश हो रही है। इससे तमिलों की राजनीतिक स्वायत्तता और भी सीमित हो जाएगी।
भारत की जिम्मेदारी क्यों बनती है?
स्टालिन इस मुद्दे को केवल श्रीलंका का आंतरिक मामला मानने से इनकार करते हैं। वह इंडो-श्रीलंका समझौते जैसे उदाहरणों का हवाला देकर कहते हैं कि भारत की इस द्वीपीय देश की राजनीति में ऐतिहासिक भूमिका रही है। उनके मुताबिक भारत सिर्फ पड़ोसी नहीं बल्कि क्षेत्रीय शक्ति है और श्रीलंका में शांति और न्याय बनाए रखना उसकी नैतिक और रणनीतिक जिम्मेदारी भी है।
थिंपू सिद्धांतों की वापसी
स्टालिन ने अपने पत्र में 1985 में भारत की मध्यस्थता में हुए थिंपू सिद्धांतों को फिर से सामने रखा है। ये चार मूल बातें थीं
- श्रीलंका के तमिलों को एक अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता
- उत्तरी और पूर्वी प्रांतों को तमिलों की पारंपरिक मातृभूमि मानना
- तमिलों को आत्मनिर्णय का अधिकार
- एक संघीय शासन व्यवस्था जो सभी को बराबरी दे
स्टालिन का कहना है कि अगर नए संविधान में इन बातों को शामिल नहीं किया गया तो असंतोष और टकराव फिर से भड़क सकता है।
मोदी को क्यों लिखा गया यह पत्र
इस पत्र का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह सीधे प्रधानमंत्री मोदी को संबोधित है। स्टालिन चाहते हैं कि श्रीलंका के तमिलों का सवाल सिर्फ तमिलनाडु की राजनीति न रहकर भारत की विदेश नीति का हिस्सा बने। वह कहते हैं कि संघीय व्यवस्था, अल्पसंख्यकों के अधिकार और भाषाई विविधता वही मूल्य हैं जिन पर भारत का संविधान टिका है और भारत को इन्हीं मूल्यों को श्रीलंका में भी बढ़ावा देना चाहिए।
स्टालिन यह भी साफ करते हैं कि श्रीलंका के तमिलों की हालत तमिलनाडु के लोगों के दिल से जुड़ी है। अगर वहां हालात बिगड़ते हैं तो उसका असर भारत-श्रीलंका रिश्तों और पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा। इसी वजह से यह पत्र सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि भविष्य की चेतावनी भी है।
स्टालिन ने पत्र के अंत में टकराव की भाषा नहीं अपनाई बल्कि उम्मीद जताई कि मोदी के नेतृत्व में भारत श्रीलंका के तमिलों के अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आएगा और वहां एक न्यायपूर्ण और टिकाऊ समाधान की दिशा में काम करेगा। यही वजह है कि यह पत्र सिर्फ एक मुख्यमंत्री की आवाज नहीं बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।












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