West Bengal Election: चुनाव से पहले ममता बनर्जी का दांव! कानून मंत्रालय खुद संभाला, इन 3 वजहों से लिया फैसला
West Bengal Election 2026 (Mamata Banerjee Law Department): पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासत तेज होती जा रही है। इसी बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐसा फैसला लिया है जिसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। राज्य सरकार में बड़ा फेरबदल करते हुए ममता बनर्जी ने कानून और न्यायिक विभाग (Law and Judicial Department) की कमान खुद अपने हाथ में ले ली है। इससे पहले यह जिम्मेदारी मंत्री मलय घटक (Moloy Ghatak) के पास थी।
राज्य सचिवालय नबान्ना की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक अब मुख्यमंत्री अपने पास पहले से मौजूद कई विभागों के साथ कानून मंत्रालय भी संभालेंगी। ममता बनर्जी पहले से ही गृह, स्वास्थ्य, पहाड़ी क्षेत्र, भूमि एवं भूमि सुधार, शरणार्थी राहत एवं पुनर्वास, अल्पसंख्यक मामलों, मदरसा शिक्षा, योजना और सांख्यिकी जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वहीं मलॉय घटक अब केवल श्रम मंत्री के तौर पर काम करेंगे। आइए समझें ममता बनर्जी ने क्यों लिया ऐसा फैसला, इसके कारण क्या हो सकते हैं।

मंत्री से विभाग वापस क्यों लिया गया? (Moloy Ghatak Controversy)
दरअसल मलय घटक लंबे समय से कानून मंत्रालय संभाल रहे थे। 2011 में जब ममता बनर्जी की सरकार पहली बार बनी थी, तब उन्हें यह विभाग मिला था। बाद में उन्हें कृषि विभाग दिया गया लेकिन फिर से कानून मंत्रालय की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी गई थी।
सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ समय से उनके कामकाज को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष था। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री उनके काम करने के तरीके से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थीं। चुनाव से पहले विभाग अपने पास लेकर ममता बनर्जी ने स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार अब कानूनी मामलों में ज्यादा सक्रिय और सख्त रुख अपनाएगी।
ममता बनर्जी ने कानून मंत्रालय की जिम्मेदारी क्यों संभाली? 3 बड़े कारण
1. चुनाव से पहले रणनीति मजबूत करना
पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और इसी को देखते हुए मुख्यमंत्री फ्रंटफुट पर नजर आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कानून विभाग अपने पास रखने से ममता बनर्जी सरकार और पार्टी के खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों पर सीधे नजर रख सकेंगी।यह कदम प्रशासनिक कसावट लाने की कोशिश भी माना जा रहा है। चुनावी माहौल में सरकार चाहती है कि कानूनी फैसले तेजी से हों और सरकार की रणनीति मजबूत बनी रहे।
2. केंद्रीय एजेंसियों से टकराव भी बड़ी वजह
कानून मंत्रालय अपने हाथ में लेने के पीछे एक बड़ी वजह केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता भी मानी जा रही है। कोयला तस्करी मामले में मलॉय घटक का नाम सामने आया था और उन्हें ईडी और CBI की जांच का सामना करना पड़ा था। कई बार पूछताछ के लिए बुलाने पर देरी से पेश होने को लेकर भी विवाद हुआ था।
इसी बीच राज्य में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) और ईडी की कार्रवाई जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री खुद सड़क से लेकर अदालत तक सक्रिय नजर आईं। हाल के दिनों में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक में अपना पक्ष मजबूती से रखा है। इससे साफ संकेत मिलता है कि वह अहम कानूनी मामलों को सीधे नियंत्रित करना चाहती हैं।
3. चुनाव आयोग से भी बढ़ा टकराव
इधर चुनाव की तैयारियों को लेकर राज्य में तनाव भी बढ़ता दिख रहा है। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश की अगुवाई में चुनाव आयोग की टीम ने कोलकाता में अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अधिकारियों को धमकाया गया है।
उन्होंने कहा कि साहस (शहोष) होना अच्छी बात है लेकिन दुस्साहस ठीक नहीं। ममता ने यह भी आरोप लगाया कि असली मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं और इसके पीछे राजनीतिक साजिश हो सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि लगभग 60 लाख मतदाता ऐसे हैं जिनके नाम अभी "अंडर एडजुडिकेशन" श्रेणी में हैं और इनकी वोटिंग का अधिकार बहाल होना चाहिए।

कानून मंत्रालय पर घमासान, भाजपा का ममता सरकार पर तीखा हमला
कानून मंत्रालय सीएम ममता के अपने पास रखने पर भाजपा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला है और सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा पश्चिम बंगाल ने एक्स पोस्ट में लिखा,
"ममता बनर्जी ने आधिकारिक तौर पर पश्चिम बंगाल को कानूनहीनता का अपना निजी मैदान बना दिया है। मलॉय घटक से कानून मंत्रालय इसलिए छीन लिया गया क्योंकि वे ममता के राजनीतिक हितों के लिए कानूनी बिरादरी को 'कंट्रोल' नहीं कर पाए। 'पिशी-भाइपो' की जोड़ी ने साफ संदेश दे दिया है: सिंडिकेट के लिए काम करो, वरना बाहर हो जाओ। कानून विभाग अपने हाथ में लेकर ममता बनर्जी ने संविधान को दरकिनार करने की कोशिश की है। यहां सिर्फ तानाशाही है। ममता कानून से डरती हैं, इसलिए उसे अपने नियंत्रण में लेना चाहती हैं। पूरी ताकत अपने हाथ में लेकर उन्होंने पश्चिम बंगाल को एक 'बनाना रिपब्लिक' बना दिया है। 'मा, माटी, मानुष' का नारा अब 'माय पावर, माय लॉ' में बदल गया है। कानूनी समुदाय को डराया नहीं जा सकता। संविधान सिंडिकेट से ऊपर है और वही जीतेगा। आज बंगाल ऐसा इलाका बन गया है जहां संविधान मानो लागू ही नहीं है और मुख्यमंत्री ही जज, जूरी और जल्लाद बन गई हैं। यह शासन नहीं, बल्कि न्यायपालिका पर सीधा हमला है। आने वाले चुनाव में बंगाल की जनता इस अहंकार का जवाब देगी।"
2026 चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक कानून मंत्रालय को सीधे अपने पास रखना ममता बनर्जी की बड़ी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। इससे सरकार को कानूनी मोर्चे पर ज्यादा आक्रामक तरीके से लड़ने का मौका मिलेगा। साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि चुनाव से पहले सरकार और पार्टी के खिलाफ किसी भी कानूनी चुनौती का जवाब देने के लिए मुख्यमंत्री खुद कमान संभाल रही हैं।
FAQ
1. ममता बनर्जी ने कानून मंत्रालय अपने पास क्यों लिया?
मुख्य वजह चुनाव से पहले कानूनी रणनीति मजबूत करना, केंद्रीय एजेंसियों की जांच और मंत्री के कामकाज से असंतोष माना जा रहा है।
2. पहले कानून मंत्री कौन थे?
पश्चिम बंगाल सरकार में कानून मंत्रालय की जिम्मेदारी मलॉय घटक के पास थी।
3. ममता बनर्जी के पास अब कौन-कौन से विभाग हैं?
मुख्यमंत्री के पास गृह, स्वास्थ्य, भूमि सुधार, अल्पसंख्यक मामले, योजना एवं सांख्यिकी समेत कई अहम विभाग पहले से हैं और अब कानून मंत्रालय भी उनके पास आ गया है।
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