प्रशांत किशोर की क्यों है इतनी डिमांड, क्या उनके पास है चुनावी जीत का शर्तिया नुस्खा?

प्रशांत किशोर (पीके) की क्यों है इतनी डिमांड?

अमृतसर। प्रशांत किशोर (पीके) अभी पश्चिम बंगाल की राजनीतिक प्रयोगशाला में तृणमूल कांग्रेस की जीत का नुस्खा तैयार कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन्हें अपना प्रधान सलाहकार बना लिया। कैप्टन ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर खास इज्जत भी बख्शी है। अब पता नहीं दीदी ने इस ऑफर को किस रूप में लिया है क्योंकि पश्चिम बंगाल में उनका मुकाबला कांग्रेस से भी है। ममता प्रशांत किशोर पर इस हद तक निर्भर हैं कि वे अब तृणमूल कांग्रेस में एक शक्तिकेन्द्र बन चुके हैं। पीके ने खुल्लमखुल्ला यह शर्त लगायी है कि अगर भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 99 का आंकड़ा पार कर लिया तो वे चुनावी रणनीति बनाने का काम छोड़ देंगे। अगर भाजपा ने ऐसा कर दिया तो पीके कैसे कैप्टन अमरिंदर सिंह की चुनावी नैया पार लगाएंगे ? वैसे द्रमुक नेता एम के स्टालिन ने 2020 में कहा था कि उन्होंने भी 2021 के विधानसभा चुनाव के लिए पीके को अनुबंधित किया है। आखिर देश के कुछ नेता यह क्यों मानते हैं कि प्रशांत किशोर अपनी 'रिसर्च मेथोडोलॉजी’ से चुनावी जीत का फार्मूला खोज ही लेंगे ? देश भर में आखिर उनकी इतनी मांग क्यों है?

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    क्या है पीके की सफलता की दर ?

    क्या है पीके की सफलता की दर ?

    अगर आंकड़ों में बात करें तो प्रशांत किशोर का स्कोर 5-2 से उनके पक्ष में है। यानी उनके खाते में 5 जीत और 2 हार दर्ज है। पीके ने सबसे पहले 2011 में नरेन्द्र मोदी के काम किया था। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 2012 में तीसरी जीत के लिए प्रयासरत थे। नरेन्द्र मोदी तीसरी बार जीते तो प्रशांत किशोर इलेक्शन स्ट्रेटेजिस्ट के रूप में स्थापित हो गये। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय प्रशांत किशोर नरेन्द्र मोदी की कोर टीम में शामिल थे। जब नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गये तो पीके के नाम का डंका बजने लगा। लेकिन जीत के श्रेय को लेकर अमित शाह और पीके में ठन गयी। शक्तिशाली अमित शाह के सामने पीके कमजोर पड़ गये। उन्हें बीजेपी की टीम से बाहर जाना पड़ा। तभी से वे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के मुखर विरोधी बन गये।

    पीके की भाजपा विरोधी नीति और जीत

    पीके की भाजपा विरोधी नीति और जीत

    2015 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे। इस चुनाव में उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ कर लालू यादव और कांग्रेस से गठबंधन कर लिया था। पीके ने नीतीश कुमार के लिए चुनावी रणनीत बनायी। महागठबंधन के नेता के रूप में नीतीश फिर मुख्यमंत्री बने। 2017 में पीके ने पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए सेवाएं दीं। कैप्टन लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुके थे। लेकिन इसबार कमाल हो गया। अकाली-भाजपा सरकार का खात्मा हो गया। अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपनी जीत का श्रेय प्रशांत किशोर और उनकी टीम को दिया। लेकिन 2017 में ही पीके उत्तर प्रदेश के चुनाव में फेल हो गये थे। उन्होंने कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति बनायी थी। उनका कांग्रेस के कई नेताओं से विवाद भी हुआ। नतीजे के तौर पर कांग्रेस की सबसे बुरी हार हुई। 2019 में पीके की चुनावी रणनीति से जगनमोहन रेड्डी को आंध्र प्रदेश में सरकार बनाने का मौका मिला था। जगनमोहन, चंद्रबाबू नायडू को सत्ता से बेदखल करने में सफल रहे थे। 2020 में अरविंद केजरीवाल के लिए इलेक्शन स्ट्रेटेजी बनायी थी। केजरीवाल सत्ता में थे और उनकी सत्ता सलामत रही।

    क्या जीत का गुरुमंत्र है पीके के पास ?

    क्या जीत का गुरुमंत्र है पीके के पास ?

    दिसम्बर 2019 में झारखंड विधानसभा के चुनाव हुए थे। उस समय प्रशांत किशोर जदयू के उपाध्यक्ष थे और पार्टी के स्टार चुनाव प्रचारकों में एक थे। उस समय उन पर चुनावी रणनीतिकार और नेता के रूप में दोहरी जिम्मेवारी थी। लेकिन पीके झारखंड चुनाव में बिल्कुल फेल हो गये। जदयू का खाता तक नहीं खुला। जब कि नीतीश कुमार ने उन्हें पार्टी में नम्बर दो का ओहदा दे रखा था। यानी प्रशांत किशोर जीत की गारंटी नहीं हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय प्रशांत किशोर जदयू में हाशिये पर जाने लगे थे। वे अपनी भाजपा विरोधी नीति के कारण अलग-थलग पड़ने लगे थे। ऐसे में चुनावी रणनीति बनाने की जिम्मेवारी मुख्य रूप से आरसीपी सिंह और ललन सिंह ने उठायी। जदयू को 17 में से 16 सीटों पर जीत मिली। यह जीत प्रशांत किशोर के बिना मिली थी।

    क्या बड़बोले हैं प्रशांत किशोर ?

    क्या बड़बोले हैं प्रशांत किशोर ?

    जनवरी 2020 में जब नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जदयू से निकाल दिया था तब उन्होंने 18 फरवरी 2020 को एक चर्चित प्रेस कांफ्रेंस किया था। इस प्रेसवार्ता में पीके ने नीतीश कुमार पर कई गंभीर आरोप लगाये थे। पीके ने तब कहा था कि नीतीश के विकास का दावा खोखला है। बिहार अभी भी पिछड़ा है। नीतीश कुमार लालू राज से तुलना कर अपनी कमियों को छिपाते रहे हैं। पीके ने यहां तक कहा था कि वे बिहार की राजनीति को बदलने के लिए 10 साल की कार्ययोजना लेकर आये हैं। उन्होंने यह समझाया था कि कैसे युवा लोगों को राजनीति से जोड़ कर वे 10 साल में बिहार को दस विकसित राज्यों में खड़ा देंगे। पीके ने बिहार के लोगों को भरोसा दिलाया था कि जब तक वे जिंदा रहेंगे बिहार के लिए समर्पित रहेंगे। लेकिन जब करने का समय आया तो उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। माना जा रहा था प्रशांत किशोर के इस धमाके से नीतीश कुमार को आठ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त नुकसान उठाना पड़ेगा। लेकिन इसके उलट नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने। प्रशांत किशोर विधानसभा चुनाव के दौरान बिहार में कहीं नजर ही नहीं आये। बिहार की राजनीति को बदलने का उनका ब्लू प्रिंट धरा का धरा रह गया। अब पीके बिहार छोड़ कर पश्चिम बंगाल में हैं। उनका दावा है कि ममता बनर्जी फिर सत्ता में आएंगी और भाजपा दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी।

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