2020 में चीन से क्यों नहीं हारेगा भारत? 1962 में क्या हुई थी चूक?

2020 में चीन से क्यों नहीं हारेगा भारत? 1962 में क्या हुई थी चूक?

2020 में भारत चीन से क्यों नहीं हारेगा ? 1962 में चीन से क्यों हार गया था भारत ? तब और अब की सरकार में क्या अंतर है ? 1962 की हार के कारणों का खुलासा करने वाली ब्रुक्स-भगत रिपोर्ट अभी तक संसद के पटल पर क्यों नहीं रखी गयी ? 58 साल से इस रिपोर्ट को क्यों छिपा कर रखा गया है ? भारत और चीन की मौजूदा सामरिक और भूराजनीतिक स्थिति को समझने के लिए इन सवालों के जवाब जरूरी हैं। डोकलाम संकट के बाद यह स्पष्ट हो रहा है कि भारत- चीन सीमा विवाद अब बातचीत से हल नहीं सकता। सीमा पर युद्ध जैसी परिस्थितियां लंबे समय तक रहने वाली हैं।

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    2020 में चीन से क्यों नहीं हारेगा भारत

    2020 में चीन से क्यों नहीं हारेगा भारत

    2020 में चीन की बौखलाहट ही इस बात का प्रमाण है कि अब भारत उसको जवाब देने की स्थिति में गया है। सीमा पर आंतरिक संरचना के विकास में चीन बहुत पहले से आगे था। अब तो वह भारतीय सीमा के पास सड़क के साथ साथ रेल सम्पर्क भी बना चुका है। इसके जवाब में भारत ने भी सीमा पर चीन के पास पहुंच बना ली है। तीन साल पहले भारत ने चीन से लगती सीमा के पास 44 सड़क परियोजनाएं शुरू की थीं। इनमें से अधिकांश पूरी हो गयी हैं। कुछ परियोजनाएं अंतिम चरण में है। लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश में चीन से लगती सीमा पर भारत अब जरूरत के हिसाब से कभी भी हथियार, सैन्य उपकरण और सैनिकों को भेज सकता है। लद्दाख में भारत ने दौलतबेग ओल्डी में सड़क के साथ साथ हवाई पट्टी भी बना ली है। यह हवाई पट्टी वास्तविक नियंत्रण रेखा से केवल 8 किलोमीटर दूर है। लड़ाई के वक्त भारतीय लड़ाकू विमान यहां से उड़ान भर सकते हैं। चीन से लगती सीमा के पास भारत के 270 लड़ाकू विमान और 68 अटैक एयरक्राफ्ट तैनात हैं। भारत के थल और वायु सैनिक अब चीन की सीमा के बिल्कुल पास हैं। वे बहुत कम समय में रिस्पॉन्ड कर सकते हैं। इसके अलावा विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रख कर 51 विमानों को परमाणु हमले के लिए भी तैयार रखा गया है। सैन्य क्षमता में चीन जरूर भारत से आगे है लेकिन वह भारत को हराने की स्थिति में नहीं है।

    ब्रुक्स-भगत कमेटी की गोपनीय रिपोर्ट

    ब्रुक्स-भगत कमेटी की गोपनीय रिपोर्ट

    1962 में चीन से हारने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसके कारणों की जांच की जिम्मेवारी लेफ्टिनेंट जनरल हैंडरसन ब्रुक्स और ब्रिगेडियर प्रेमिन्दर सिंह भगत को सौंपी थी। दोनों सैनिक अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट 1963 में सरकार को सौंप दी गयी थी। यह रिपोर्ट दो भागों में थी। नेहरू सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया। कहा जाता है इस रिपोर्ट में भारत की हार के लिए नेहरू की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया गया था इसलिए इसे उजागर नहीं किया गया था। कांग्रेस की सरकार ने तो इस रिपोर्ट को दबाया ही, बाद की गैरकांग्रेसी सरकारों ने भी इसे ठंडे बस्ते में डाले रखा। हाल ही में लोकसभा में इस रिपोर्ट को सार्वजिनक करने की मांग उठी थी। अरुणाचल प्रदेश से जीते भाजपा के सांसद तापिर गाओ ने मार्च 2020 में लोकसभा में ब्रुक्स-भगत कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की थी। तब उन्होंने सवाल पूछा था कि 58 साल बाद भी आखिर क्यों नहीं इस रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखा जा रहा? आज हर भारतवासी यह जानना चाहता है कि 1962 में भारत क्यों हार गया था ?

    1962 में क्यों हार गया था भारत?

    1962 में क्यों हार गया था भारत?

    लेफ्टिनेंट जनरल हैंडरसन ब्रुक्स एंग्लोइंडियन थे और ब्रिटिश भारत के समय से ही सेना में अधिकारी थे। आजादी के बाद भी वे भारतीय सेना में कार्यरत रहे और लेफ्टिनेंट जनरल के पद तक पहुंचे। जांच रिपोर्ट सौंपने के एक साल बाद 1964 में वे सेना से रिटायर हो गये। रिटारमेंट के बाद ने आस्ट्रेलिया में बस गये। 1997 में उनकी आस्ट्रेलिया में ही मौत हो गयी। कई साल बाद 2014 में आस्ट्रेलिया के पत्रकार मैक्सवेल नेविले को यह रिपोर्ट हाथ लग गयी। माना जाता है कि हैंडरसन के परिजनों के माध्यम से नेविले को ये रिपोर्ट मिली होगी। इसके बाद नेविले ने इस रिपोर्ट के आधार पर एक किताब लिखी जिसका नाम है- इंडियाज चाइना वार। जैसा कि अंदेशा था, नेविले ने 1962 की हार के लिए नेहरू की कई नाकामियों का जिक्र किया है।

    नेहरू की नाकामियों से हारा था भारत !

    नेहरू की नाकामियों से हारा था भारत !

    मैक्सवेल नेविले के मुताबिक, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को चीन पर इतना भरोसा था कि वे कभी युद्ध की कल्पना भी नहीं करते थे। नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को यही लगता था कि अगर युद्ध हुआ तो वह केवल पाकिस्तान से होगा। चीन को मित्र मानने वाले नेहरू को अपने सेना प्रमुख पीएन थापर पर भरोसा नहीं था। थापर 1961 से हथियार और संसाधन की मांग कर रहे थे लेकिन नेहरू ने इस पर ध्यान नहीं दिया। रक्षा मंत्री का अपने अधिकारियों से बेहतर संवाद नहीं था। वे नेहरू को सामने सेना की तैयारी को बढ़ा चढ़ा कर पेश करते थे। इसकी वजह से नेहरू को चीन के नापाक इरादों की भनक नहीं मिली। भारतीय सैनिकों ने दुर्गम बर्फिले इलाकों में चौकियां तो बना लीं थीं लेकिन उनके पास खाना-पानी पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं था। भारतीय सैनिकों के पास भीषण ठंड को झेलने लायक कपड़े नहीं थे। लड़ाई के वक्त उनके पास अतिरिक्त हथियार और गोला बारूद भी नहीं पहुंचाया जा सका। अक्टूबर 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला कर दिया तो भारतीय सैनिक इसके बिल्कुल तैयार नहीं थे। उस समय भारत की वायुसेना चीन से बेहतर थी लेकिन इसके बाद भी इस लड़ाई में एयर फोर्स का इस्तेमाल नहीं किया गया।

    2020 में क्या कर रही है सरकार ?

    2020 में क्या कर रही है सरकार ?

    लद्दाख की गलवान घाटी में भारत के 20 जवानों के शहीद होने के बाद मोदी सरकार ने सेना को जवाब देने की खुली छूट दे दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ विपिन रावत ने तीनों सेना के प्रमुखों से स्थिति की जानकारी ली। इसके बाद मोदी सरकार ने सेना के ये अधिकार दे दिया है कि वे आत्मरक्षा में किसी भी हथियार का प्रयोग कर सकते हैं, इसके लिए किसी प्रोटोकॉल की बाध्यता नहीं रहेगी। अब स्थानीय कमांडर स्थिति के हिसाब से मौके पर फैसला ले सकते हैं। किसी ऊपरी आदेश की प्रतिक्षा में उन्हें अपनी जान जोखिम में डालने की कोई जरूरत नहीं। भारतीय सेना के अफसरों और सौनिकों का मनोबल ऊंचा है। प्रधानमंत्री खुद स्थिति पर निगाह रखे हुए हैं। तब और अब में यही फर्क है।

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