एशिया में अब तक इस कदर उपेक्षित क्यों रहा भारत?
आसियान का जन्म जब आज से लगभग 40 साल पहले हुआ. तब वियतनाम युद्ध में क़रारी शिकस्त के बाद अमेरिकी फ़ौज दक्षिण पूर्व एशियाई मोर्चे से घर वापसी के लिए मजबूर हो चुकी थीं और 1954 में विभाजित वियतनाम का एकीकरण हो रहा था.
ऐसा जान पड़ता था कि निकट भविष्य में 'वियतनाम लाल सलाम' के नारे को बुलंद करने वाले इस पूरे भूभाग में अपना क्रांतिकारी परचम लहराने लगेंगे. इस चुनौती का एक अन्य आयाम चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना था.
विश्लेषकों का मानना है कि आसियान का गठन मलयवंशी, साम्यवाद विरोधी देशों को चीनी और साम्यवादी ख़तरे से बचाने के लिए एक क्षेत्रीय संगठन के रूप में किया गया था.
उस समय यूरोपीय समुदाय भी खस्ताहाल नहीं था और यह सुझाने वालों की कमी नहीं थी कि यही मॉडल दूसरी जगह अपना कर ही छोटे राज्य अपना हित साध बेहतर कर सकते हैं.
तब से अब तक दुनिया और आसियान बहुत बदल चुके हैं. हमारी समझ में इस बदले परिप्रेक्ष्य में ही भारत और आसियान के संबंधों की, भविष्य में इसकी संभावनाओं की पड़ताल की जानी चाहिए.
क्या यह चीन की बढ़ती ताक़त का नज़ारा है?
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भारत आरंभ से ही आसियान के समीप आने का प्रयास करता रहा है परंतु उसे इसमें मनचाही कामयाबी नहीं हासिल हो सकी है.
आसियान +3 वाली बिरादरी में चीन, जापान और कोरिया हैं. पर इतना लंबा समय बीतने पर भी हम 'संवाद के साथी' भर बन सके हैं.
एक बात और ध्यान देने की है. आज आसियान में सिर्फ़ मलयवंशी- मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, ब्रूनेई ही नहीं-हिंद चीन के वियतनाम, कंबोडिया, लाओस और थाईलैंड भी शामिल हैं. म्यांमार उर्फ़ बर्मा को न भूलें.
इन सदस्यों का वर्गीकरण इस्लाम के अनुयायीयों, बौद्धों और ईसाइयों के अलावा औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के दौर में यूरोपीय मालिकों के सांस्कृतिक प्रभाव के अनुसार भी किया जा सकता है और ऐसा करना ज़रूरी भी है.
कुछ देश हैं जिनके साथ भारत के सदियों पुराने आर्थिक-सांस्कृतिक रिश्ते रहे हैं, राष्ट्रकुल की बिरादरी का नाता भी है पर अन्य के साथ भाषा और राजनीतिक विचारधारागत मतभेद पुराना है.
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मलेशिया हो या सिंगापुर अथवा बर्मा यह ब्रिटेन के उपनिवेश रहे हमारी तरह परंतु आज यह बात अहमियत नहीं रखती कि इनके विकास में कितनी बड़ी भूमिका भारतवंशी प्रवासियों ने निबाही थी या कि हमारे लिए पड़ोस के इस बाजार की क्या अहमियत है?
कड़वा सच यह है कि हम चाहे 'पूरब की तरफ देखने' का अभियान शुरू करें या 'पूरब में कुछ करने' के लिए कमर कसें- तब तक प्रगति नहीं हो सकती जब तक दूसरा आसियान वाला पक्ष भी इतनी ही उत्सुकता नहीं दिखलाता.
विडंबना यह है की भारत को इस समय चीन के आक्रामक विस्तारवादी तेवरों के मद्देनज़र वियतनाम सामरिक साझेदार नजर आ रहा है क्योंकि वियतनाम आज हो-चि-मिन्ह और जियाप का वियतनाम नहीं है.
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वियतनाम अमरीकनों के क़रीब है कुछ वैसे ही जैसे 1965 के गेस्टापु तख्तापलट के बाद इंडोनेशिया का कायाकल्प हो गया था. जब कभी भारत ने इस उभयपक्षी रिश्ते को सामरिक रूप देने की कोशिश की है तो उसे चीन की चेतावनी सुननी पड़ी है.
दक्षिणी चीनी सागर में समुद्र के गर्भ में छिपे तेल भंडार का अन्वेषण हो अथवा तकनीकी सहकार, बात ज़्यादा आगे नहीं बढ़ सकी है.
मलेशिया में हाल के वर्षों में कट्टरपंथी इस्लाम का प्रभाव बढ़ा है. इसके चलते भारत के साथ संबंधों में कभी-कभार बंदी प्रत्यार्पण जैसे विषयों में मनमुटाव भी देखने को मिला है.
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आर्थिक और शैक्षणिक क्षेत्र में भी मलेशिया, ऑस्ट्रेलियाई विकल्प को भारत पर तरजीह देते रहे हैं.
सिंगापुर बहुत छोटा राज्य है- किसी भारतीय महानगर की अनेक में एक महापालिका सरीखा, पर सुशासन के मामले में भारत को सबक-सलाह देने में वह नहीं हिचकता.
थाईलैंड अधिकांश भारतीयों के लिए सस्ता पर्यटन स्वर्ग है इससे अधिक नहीं. फिलीपीन्स की गतिविधियों के बारे में हमारी जानकारी अधकचरी आधी-अधूरी ही रहती है.
कंबोडिया में गृहयुद्ध में क्षतिग्रस्त अंगकोर वाट की मरम्मत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने कठिन परिस्थितियों में हाथ बँटाया था. पर आज इस हिंदू-बौद्ध संस्कृति वाले कभी बृहत्तर भारत कहे जाने वाले देशों का राजनीतिक महत्व हम अक्सर नज़रंदाज करते हैं.
बर्मा की याद हमें तभी आती है जब रोहिंगिया शरणार्थियों का संकट सिर पर सवार होता है. लाओस और ब्रूनेई तो याद दिलाने पर ही याद आते हैं.
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इन बातों का जरा विस्तार से ज़िक्र इसलिए जरूरी है कि यह समझा जा सके कि जिन देशों के साथ हमारे उभयपक्षीय रिश्ते बहुत कम वजनदार हैं और जिनके परस्पर संबंध भी तनाव रहित नहीं, उनको एक समूह में रख देने भर से वह हमारे राष्ट्र हित की प्राथमिकता सूची में ऊपर नहीं चढ़ जाते.
चीन के प्रस्तावित नए रेशम राज मार्ग को संतुलित करने के लिए पुराने मसाला राजपथ को पुनर्जीवित करने की मरीचिका हमें पथ से भटका सकती है.
आसियान के साथ भारत का व्यापार बहुत कोशिश के बाद भी हमारे कुल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का 10 फ़ीसदी ही है.
इस क्षेत्रीय संगठन के तेल उत्पादक देशों- मसलन इंडोनेशिया- को देखते यह अटपटा ही लगता है. उनके साझेदारों की फेहरिश्त में हम नगण्य हैं- चीन, जापान, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया आदि की तुलना में.
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दिलचस्प बात यह है कि जब कोई मेहमान भारत पहुंचता है तो उसी का महिमामंडन अतिरंजित तरीक़े से होने लगता है. इस घड़ी भी कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा है. अन्यथा ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन, जी-20 आदि के बाद हिंद-प्रशांत धुरी की चर्चा संगत नहीं लगती.
कट्टरपंथी जिहादी दहशतगर्दी के मुक़ाबले में जिस संयुक्त मोर्चे के गठन के लिए भारत प्रयास कर रहा है उसमें आसियान के सभी सदस्यों की आम सहमति संभव नहीं- भले ही इंडोनेशिया ख़ुद इनके निशाने पर रहा है.
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भारत की 'उदार शक्ति' के उदाहरण स्वरूप इन देशों की गिनती गिनाई जा सकती है पर यह कल्पना करना कठिन है कि निकट भविष्य में आसियान के शिखर सम्मेलनों की सदाशयी घोषणाएं ऐसे कार्यक्रम लागू करने में कामयाब होंगी जो भारत के राष्ट्रहित के लिए मुफ़ीद होंगी.
यदि भारत को दक्षिण पूर्व एशिया में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज़ करानी है तो यह काम इस क्षेत्रीय संगठन के सदस्य देशों के साथ उभयपक्षी संबंधों को ही प्रगाढ़ कर किया जा सकता है. कम से कम पिछले चार दशकों का अनुभव यही सिखलाता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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