लोकसभा चुनाव में 'खतरों की खिलाड़ी' आप पार्टी

अक्सर किसी न किसी बात को मीडिया में हाइलाइट करने वाले केजरीवाल और उनकी आप पार्टी के पास इस पूरे साल सुर्खियों में रहने का यह एक सबसे बड़ा फॉर्मूला है। कहीं न कहीं शायद केजरीवाल यह भी भूलते नजर आ रहे हैं कि हो सकता है कि यह फैसला उनकी पार्टी को ही ले डूबे और पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए।
केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए फरवरी में ही बुरा दौर शुरू हो गया था। सिर्फ 49 दिनों के अंदर केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। केजरीवाल ने उस समय कहा था कि उनके रास्ते में कुछ लोग मुश्किलें पैदा कर रहे हैं और उन्हें ठीक से काम नहीं करने दे रहे। यह कदम उनकी एक ऐसी रणनीति का हिस्सा था जिसके तहत उन्हें आने वाले लोकसभा चुनावों में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने का मौका मिल सके।
मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ना आप पार्टी के लिए सबसे बड़ा नुकसान साबित हो सकता है
कभी कांग्रेस पर निशाना साधने वाले केजरीवाल का सारा ध्यान अब बीजेपी की ओर हो गया है। लेकिन उन्हें इस बात को समझना होगा कि मोदी उन सभी मुद्दों और व्यक्तियों के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़े नेता के तौर पर सामने आ चुके हैं जिनके दम पर केजरीवाल अभी तक सुर्खियों में थे।
जो तरीके केजरीवाल ने दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार को पटखनी देने के लिए अपनाए थे उन तरीकों की ही वजह से हो सकता है कि पार्टी 16 मई के बाद खबरों से ही गायब हो जाए।
आइए आपको उन वजहों के बारे में बताते हैं जिनकी वजह से आप और केजरीवाल खुद को इन चुनावों में 'खतरों के खिलाड़ी' साबित करने पर तुले हुए हैं।
रणनीतियां ले डूबेंगी भविष्य
आप पार्टी ने विधानसभा चुनावों को जीतने के लिए जो भी रणनीतियां अपनाई हों वह सभी रणनीतियां राष्ट्रीय स्तर पर व्यर्थ हैं। ऐसे में उनकी पार्टी भी राष्ट्रीय स्तर अपनी पहचान बना पाएगी, यह बात थोड़ी मुश्किल है। आप पार्टी को यह बात समझनी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर वह एक छोटी संस्था या फिर न के बराबर हैं। ऐसे हालातों में जहां 34 साल पुरानी पार्टी बीजेपी इन चुनावों में सिर्फ नरेंद्र मोदी पर निर्भर है, आप पार्टी वोट हासिल कर पाएगी, काफी मुश्किल सवाल है और जिसका जवाब शायद थोड़ा असंभव नजर आता है।
जहां एक तरफ जहां बीजेपी की ओर से मोदी की एक साफ सुथरी छवि को लोगों के बीच पेश किया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ मोदी के खिलाफ केजरीवाल को खड़ा करके आप पार्टी ने शायद उनका राजनीतिक करियर खत्म करने की ठान ली है। पार्टी की गुरिल्ला रणनीतियां उसे एक मुश्किल रास्ते पर ले जाती हुई नजर आ रही हैं।
पार्टी का अस्पष्ट एजेंडा
आप पार्टी के पास इस समय नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के अलावा और कोई ऐसे मजबूत मुद्दे नहीं बचे हैं जिनके जरिए वह लोकसभा चुनावों में फतह हासिल करने की उम्मीद लागए हैं। इस पार्टी के लगभग सभी नेताओं का मुख्य निशाना सिर्फ नरेंद्र मोदी हैं और यह बात अक्सर मीडिया में नेताओं की ओर से जारी बयानबाजी में नजर आ जाती है। वहीं अगर मोदी की बात की जाए तो वह बिल्कुल इसके उलट अपने चुनाव अभियानों को आयोजित कर रहे हैं।
आप पार्टी को कौन यह बात समझाए कि लोगों को मोदी के विकल्प में कोई रूचि नहीं है बल्कि वह पिछले 10 वर्षों से चले आ रहे बुरे शासन से छुटकारा पाना चाहते हैं। केजरीवाल क्या करते हैं यह तो सभी लोग जानते हैं लेकिन उनकी पार्टी का एजेंडा क्या है यह बात अभी तक किसी की समझ में नही आ रही है।
दिल्ली और उत्तर प्रदेश के फर्क से अनजान पार्टी
मोदी उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से लड़ेंगे और यह सीट बीजेपी की एक अहम रणनीति का हिस्सा है। लेकिन अभी तक किसी को यह समझ नहीं आ रहा है कि आखिर केजरीवाल क्यों वाराणसी से चुनाव लड़ना चाहते हैं। केजरीवाल को वाराणसी सीट से चुनाव लड़ाने की आप पार्टी की मंशा साफ इशारा करती है कि पार्टी ने उत्तर प्रदेश के लिए बहुत ही कम होमवर्क किया है।
यह बात और भी हैरान कर देती है कि पार्टी के जाने-माने समाज शास्त्री योगेंद्र यादव जैसे लोगों की मौजूदगी के बावजूद वह ऐसा निर्णय ले रही है। पार्टी शायद यह भूल गई कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सामाजिक आर्थिक दशा बहुत ही अलग है। ऐसे में सिर्फ केजरीवाल की ईमानदारी के दम प लोकसभा चुनाव में उतरना आत्महत्या करने जैसा ही है।
विचाराधारा से अलग जाना खतरे का इशारा
आप पार्टी का नेतृत्व अक्सर ही बिना सोचे समझे बयानबाजी करने में व्यस्त नजर आता है। इसके अलावा पार्टी की कथनी और करनी में भी जो अंतर है वह लोगों को समझ नहीं आता। पार्टी एक ओर तो आम आदमी की बात करती है लेकिन सिर्फ ब्रांडेड या फिर सेलिब्रिटी स्टेटस वाले लोगों को ही चुनाव मैदान में उतारने में व्यस्त रहती है। जिस तरह से पार्टी अपनी विचारधारा से अलग हो रही है उससे आने वाले समय में आप पार्टी के लिए एक बड़ा खतरा साफ नजर आ रहा है।
साफ है कि केजरीवाल अपने समर्थकों को तो 16 मई तक आकर्षित कर सकते हैं लेकिन 16 मई के बाद उनकी पार्टी शायद इतिहास का हिस्सा भी बन सकती है।












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