क्यों हो रही है बीजेपी-पेटीएम के सांठगांठ की बात

भारत में नोटबंदी के बाद 'पेटीएम करो' एक बेहद आकर्षक मुहावरा बन गया था और इसका श्रेय पेटीएम कंपनी के संस्थापक विजय शेखर शर्मा को जाता है.

विजय ऐसा नारा देना चाहते थे जो उनकी कंपनी को गूगल और ज़ेरोक्स की तरह ब्रैंड बना सके क्योंकि सर्च इंजन या फ़ोटोकॉपी के लिए इन कंपनियों के नाम इस्तेमाल होते हैं.

इसी तरह विजय पेटीएम को ई-वॉलेट लेन-देन का पर्याय बनाना चाहते थे. लेकिन हाल में डाटा असुरक्षित होने के आरोपों के बाद कंपनी पर कई सवाल खड़े हुए हैं.

एक मीडिया कंपनी ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया है जिसमें पेटीएम के उपाध्यक्ष और विजय शेखर शर्मा के भाई अजय शेखर शर्मा कथित तौर पर आरएसएस से नजदीकी की बात कर रहे हैं.

वह कह रहे हैं कि भारत प्रशासित कश्मीर में पत्थरबाज़ी की घटना के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनसे पेटीएम यूजर्स का डेटा मांगा था.

इससे डेटा की सुरक्षा पर सवाल खड़े होते हैं.



https://twitter.com/RahulGandhi/status/1000064951522922496

क्या है विवाद?

एक संक्षिप्त बयान में कंपनी ने क़ानूनी रूप से बाध्य डेटा के निवेदन के अलावा किसी तीसरे पक्ष के साथ कोई भी डेटा साझा करने से इनकार किया है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी एनडीए सरकार पर ई-वॉलेट कंपनी का पक्ष लेने का आरोप लगाया है और कहा है कि यह सरकार घोर पूंजीवादी समर्थक है.

ऐसा पहली बार नहीं है कि जब इस प्रकार के आरोप लगे हैं. नवंबर 2016 में जब देश में अचानक नोटबंदी की घोषणा हुई तब पेटीएम भी अप्रत्याशित रूप से ऊपर गई.

साल 2010 में इस कंपनी की शुरुआत नकदी रहित लेनदेन के विकल्प के रूप में हुई थी.

लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं की नकदी पर अधिक निर्भरता के कारण उसके सामने काफ़ी कठिनाइयां थीं.

छह सालों में इसके 12.5 करोड़ उपयोगकर्ता थे. हालांकि, इसको छोटी दुकानों और व्यापारियों के साथ जोड़ भी दिया गया लेकिन फिर भी लेनदेन की संख्या काफ़ी कम रही.



पेटीएम की सफलता

एक दिन में तीन मिलियन लेन-देन का आंकड़ा पार करने पर इसे बड़ी उपलब्धि माना गया और कंपनी ने जश्न मनाया.

लेकिन नोटबंदी की घोषणा के तीन महीने बाद ही इसके उपयोगर्ताओं में 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.

एक झटके में जब नकदी उपलब्ध नहीं थी तब कम से कम मध्यम और निम्न आय वर्ग के 19 करोड़ लोग पेटीएम नेटवर्क पर आ गए.

उस समय व्यवसायी विजय शेखर शर्मा ने एक और क़दम आगे बढ़ाया.

उन्होंने अपनी पैरंट कंपनी वन97 की 1% हिस्सेदारी को 325 करोड़ रुपये में बेच दिया ताकि वह पेटीएम पेमेंट्स बैंक के लिए पैसे इकट्ठा कर सकें.

मोबाइल वॉलेट की ओर उपयोगकर्ताओं के लगातार झुकाव के बाद वो चीनी निवेशक के पास गए.

नोटबंदी की घोषणा के सिर्फ़ छह महीने बाद चीनी निवेशकों अलीबाबा समूह और एसएआईएफ़ भागीदारों से विजय ने अपनी कंपनी के कोष में 200 मिलियन डॉलर डाले.

पेटीएम
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पेटीएम

पेटीएम को कैसे मिला फैलाव?

घरेलू बाज़ार में ई-वॉलेट पर अलीबाबा ने काफ़ी चुनौतियों का सामना किया था लेकिन उसने तब भी रिलायंस कैपिटल और 'वन97' में शेयर ख़रीदे और कंपनी का मूल्यांकन लगभग छह अरब डॉलर तक बढ़ा दिया.

इसके बाद कंपनी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और उसने जापानी निवेशक सॉफ़्टबैंक से पिछले साल मई में 1.4 अरब डॉलर पाए.

धन की व्यवस्था के लिए पेटीएम ने आक्रामक कैश बैक रणनीति अपनाई ताकि वह प्रतिस्पर्धियों को पीछे छोड़ मार्केट का लीडर बन सके.

अब इसमें एक और बैंक जोड़ा गया है जिसे जीवन बीमा और जनरल इंश्योरेंस के उत्पादों के लिए लाइसेंस मिला है.

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि 2015 में सिर्फ़ 336 करोड़ रुपये के राजस्व वाली कंपनी ने ऐसी रफ़्तार पकड़ी की मार्च 2017 में इसका राजस्व 828.6 करोड़ रुपये हो गया.

इसमें ई-कॉमर्स का व्यापार शामिल नहीं है. आज इसके 30 करोड़ उपयोगकर्ता औसत रूप से हर रोज़ 70 लाख लेन-देन करते हैं जिसकी क़ीमत 9.4 अरब डॉलर है.

विजय शेखर शर्मा और अरुण जेटली
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विजय शेखर शर्मा और अरुण जेटली

राजनीतिक सरगर्मियां

स्टिंग ऑपरेशन में पेटीम के वरिष्ठ उपाध्यक्ष का कहना था कि बच्चों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किताब 'एग्ज़ाम वॉरियर' को उनकी ऐप के होमपेज पर प्रचारित किया गया था.

विपक्ष ने इस पर चिंता जताते हुए सवाल खड़े किए थे कि डिजिटल पेमेंट कंपनी द्वारा दक्षिपंथी एजेंडे को प्रसारित करना अनैतिक अभ्यास है.

इसमें कोई शक नहीं है कि विजय शेखर शर्मा प्रधानमंत्री मोदी और उनकी नीतियों के खुले समर्थक रहे हैं.

नोटबंदी के बाद पेटीएम ने प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ प्रमुख अख़बारों में फ़ुल पेज का विज्ञापन दिया था जिसमें उनके नोटबंदी के फ़ैसले की तारीफ़ की गई थी.

इस कैंपेन की विपक्ष ने आलोचना की थी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सत्तारुढ़ पार्टी पर पेटीएम का पक्ष लेने का आरोप लगाया था.

वहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी को 'पेटीएम वाला' कहकर उन पर तंज़ कसा था और राहुल गांधी ने 'पेटीएम को पे टू पीएम' कहा था.

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पेटीएम पर जुर्माना

सरकार ने भी इस नुकसान की भरपाई के लिए प्रधानमंत्री की तस्वीर बिना अनुमति छापने के लिए पेटीएम पर जुर्माना लगा दिया था लेकिन पेटीएम ने तीन महीने बाद माफ़ी मांग ली.

वहीं, आम आदमी पार्टी ने एक वीडियो जारी किया था जिसमें दिल्ली बीजेपी के नेता जनवरी 2017 में एक झुग्गी-झोपड़ी इलाक़े में अपने पेटीएम डिजिटल वॉलेट दिखा रहे थे.

बीजेपी पर चीनी निवेश वाली कंपनी की 'सेल्स टीम' होने का आरोप लगाया गया था. बीजेपी ने इन सभी आरोपों को ख़ारिज किया था.

पेटीएम की पैतृक कंपनी वन97 में चीनी निवेश को लेकर भी चिंता बढ़ी है.

बीजेपी के थिंक टैंक आरएसएस की आर्थिक इकाई लगातार विदेश कंपनियों द्वारा भारतीयों का डेटा साझा करने को लेकर चिंतित रही है लेकिन कंपनी अपनी भारतीय स्थिति पर ज़ोर देती रही है.

दावोस में इस साल जनवरी में हुए विश्व आर्थिक मंच में पेटीएम के विजय शेखर शर्मा ने प्रधानमंत्री की तारीफ़ करते हुए कहा था कि उनकी पहल लाल फ़ीताशाही कम कर रही है और उनकी नीतियां व्यापार के लिए लाभदायक हैं.

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प्रधानमंत्री की तारीफ़

हालांकि, दुनिया में भारत सबसे भ्रष्ट देशों में से अभी भी एक है और 2017 में भारत ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की वैश्विक भ्रष्टाचार की सूची में फिसलकर 79 से 81 पर आ गया.

अलीगढ़ में एक स्कूल टीचर के बेटे विजय शेखर शर्मा ने तेज़ भागती दिल्ली में काफ़ी लंबा रास्ता तय किया है.

साल 2017 में विजय शेखर ने फोर्ब्स की युवा भारतीय अरबपतियों की सूची में 1.72 अरब डॉलर के साथ जगह बनाई थी.

डाटा गोपनीयता विवाद के अलावा मुख्यधारा के भारतीय मीडिया ने इस स्टिंग ऑपरेशन को नहीं उठाया था.

पेटीएम के निवेशकों में से एक अलीबाबा ने बीबीसी की तरफ़ से पूछे गए सवालों का जवाब अभी तक नहीं दिया है.

इस पर कोई टिप्पणी नहीं की. वहीं, सॉफ्टबैंक के प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा, "सॉफ्टबैंक उन कंपनियों पर टिप्पणी नहीं करता है जिसमें निवेश किया गया हो."

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