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परिवार वालों की बात काटकर भी महाराष्ट्र क्यों लौट रहे हैं प्रवासी मजदूर

नई दिल्ली- बीते महीनों में हमने देखा है कि महानगरों से प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों या गावों की ओर लौटने के लिए कितने बेचैन हो गए थे। इसका मूल कारण ये था कि लॉकडाउन की वजह से काम बंद हो गए थे और उन्हें रोजगार देने वाली ज्यादातर कंपनियों-फैक्ट्रियों के मालिकों ने बुरे वक्त में उनकी बेबसी से मुंह मोड़ लिया था। लेकिन, अब अनलॉक शुरू है, कंपनियां खुल चुकी हैं, मजदूरों की मांग बढ़ गई है। इसलिए मजदूर वापस कमाने के लिए बड़े शहरों की ओर लौटने लगे हैं। जबकि, उन्हें ये पता है कि काम शुरू हो रहा है तो कोरोना भी बढ़ रहा है, लेकिन पेट के लिए वह कोरोना का जोखिम लेने के लिए भी तैयार हैं।

जब कमाएंगे तभी खा पाएंगे- प्रवासी मजदूर

जब कमाएंगे तभी खा पाएंगे- प्रवासी मजदूर

एक महीने पहले जो प्रवासी मजदूर महानगरो से अपने गांव भागने के लिए उतावले हो रहे थे, वही अब अपने परिवार वालों की बात काटकर फिर से उन्हीं ठिकाने पर वापस लौटने लगे हैं, जहां से वो काफी शिकायतें लेकर गए थे। कई रिपोर्ट्स आ चुकी हैं, जिसमें बताया गया है कि बिहार-यूपी से मुंबई दिल्ली की ओर आने वाली ट्रेनें अगले कई दिनों तक फुल हो चुकी हैं। इसी कड़ी में मजदूरों का एक जत्था वाराणसी से मायानगरी भी पहुंचा है। 20-25 आयु वर्ग के ये प्रवासी अब किसी तरह से मुंबई से बस के जरिए सतारा जाने को बेताब हैं, जहां उन्हें अपने शिरवल में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुंचना है। इनमें से कुछ लोग लॉकडाउन के बाद गए थे और कुछ होली की छुट्टियां मनाने गए थे, लेकिन लौट नहीं सके। यह जानते हुए भी कि अब मुंबई और महाराष्ट्र में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, फिर भी वह अब हर जोखिम लेने के लिए तैयार हैं। क्योंकि, इन्हें अपने लायक कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझ रहा। मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर पिछले हफ्ते वापस लौटे एक मजदूर ने कहा, 'हमारे परिवार के लोग हमें वापस नहीं आने देना चाहते थे। लेकिन, हमारे पास अपना कोई कारोबार नहीं है, हम तो जब कमाएंगे तभी खा पाएंगे।'

परिवार आने देने के लिए तैयार नहीं था- प्रवासी मजदूर

परिवार आने देने के लिए तैयार नहीं था- प्रवासी मजदूर

वाराणसी से जो प्रवासी कामकारों का जत्था सतारा जाने आया है, उसके एक सदस्य मंटू ने बताया कि, 'हम में से कई लोग घर पर खेतों में काम कर रहे थे, क्योंकि इस समय खेती चल रही है। लेकिन, हम लोग कंस्ट्रक्शन का काम ज्यादा अच्छे से कर लते हैं और यहां हमारी स्थाई नौकरी है। जब हमारे कॉन्ट्रैक्टर ने बताया कि काम शुरू हो गया है तो हमने लौटने का फैसला कर लिया।' ग्रुप के ज्यादातर सदस्य कंस्ट्रक्शन साइट पर मैसन्स या प्लबंर का काम करते हैं। इन्हें कोरोना से संक्रमित होने का डर बहुत सता रहा है और इसलिए परिवार वाले इन्हें रोक भी रहे थे,लेकिन ये सबकी बात काटकर चले आए हैं। शिरवल जाने वाले 24 लोगों के जत्थे के एक चंद्रेश सिंह ने कहा, 'हमारा परिवार हमें काम पर आने देने को लेकर आशंकित था। वे हमें काम पर वापस नहीं आने दे रहे थे, क्योंकि हमारा काम मुंबई या पुणे जैसे शहरों में था, जहां की संख्या (कोरोना संक्रमितों की) बढ़ रही है। '

15,500 प्रवासी रोजाना लौट रहे हैं- राज्य सरकार

15,500 प्रवासी रोजाना लौट रहे हैं- राज्य सरकार

पिछले हफ्ते महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कहा था कि जो प्रवासी चले गए थे, उनमें से रोजाना 15,500 से राज्य में वापस लौट रहे हैं। रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक करीब 11,500 कामगार रोजाना अकेले मुंबई वापस लौट रहे हैं। बाकी लोग गोंदिया, नंदुरबार, कोल्हापुर, नागपुर और पुणे की ओर जा रहे हैं। श्रम मामले के जानकारों का कहना है कि गृह राज्यों में काम की कमी के चलते वह मजबूरी में वापस लौट रहे हैं। अब दोनों राज्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका नाम रजिस्टर्ड हो। इससे किसी भी विपरीत परिस्थिति में उनतक केंद्रीय या राज्य से सहायता पहुंचाने में मदद मिलेगी। (तस्वीरें-फाइल)

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