एम्स के डॉक्टर क्यों सीख रहे हैं कराटे?
एम्स अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट थी. एक घायल मरीज़ को अंदर लाने वालों की कमर में पिस्तौल लटक रही थी.
सुबह आठ बजे से ओपीडी में मरीज़ देखना, दोपहर को वार्ड्स के राउंड्स लगाना और शाम को कराटे-मार्शल आर्ट्स क्लास के लिए रवानगी.
वो दिन दूर नहीं जब भारत के सबसे प्रतिष्ठित कहे जाने वाले अस्पताल, एम्स, के रेज़िडेंट डॉक्टर रोज़ाना इस रूटीन को फ़ॉलो कर रहे होंगे.
इंटरनेट की लत का इलाज एम्स में
15 मई से कैम्पस में ही शाम को दो क्लास चलेंगी जिनमें ताइक्वांडो और कराटे के ब्लैक बेल्ट चैम्पियन डाक्टरों को ये हुनर सिखाएंगे जिसमें नर्सें भी भाग लेंगी.
इन डाक्टरों के मुताबिक़ अस्पताल में 'उनके साथ जबरन हाथापाई और गालीगलौच अब आम होता जा रहा है'.
पुलिस भी दे रही है प्रशिक्षण
एम्स रेज़िडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के महासचिव डॉक्टर हरजीत सिंह का कहना है कि ये कदम उठाने के लिए अब इन लोगों को मजबूर सा होना पड़ा है.
उन्होंने कहा, "दूसरे अस्पतालों को छोड़िए, देश के इस सबसे बड़े अस्पताल में डॉक्टरों-मरीज़ों का अनुपात बहुत ख़राब है और हम इस बात को बखूबी समझते हैं कि मरीज़ या उनके परिवार वालों को किन तकलीफों से यहाँ तक पहुंचना पड़ता है. लेकिन आत्मरक्षा के लिए कुछ तो सीख ही लेना चाहिए क्योंकि हम अक्सर हमलों का शिकार होते रहते हैं. हमने अपनी नई मुहिम के लिए प्रशासन से भी इजाज़त ले ली है".
एम्स के पहले दिल्ली के दो बड़े अस्पतालों, लोक नायक और लेडी हार्डिंग, में आत्मरक्षा का प्रक्षिशण दिल्ली पुलिस के एक्सपर्ट कुछ दिन पहले दे चुके हैं.
डॉक्टर अरुणा सिंह इस बात से सहमत हैं कि मरीज़ों का या उनके रिश्तेदारों का गुस्सा जायज़ है लेकिन उनके मुताबिक़ डॉक्टरों की मानसिक प्रताड़ना पर भी ध्यान देने की ज़रुरत है.
उन्होंने बताया, "हमें सरे आम गाली सुननी पड़ती है. कुछ लोग हमले की मुद्रा में ही बात करते हैं तो मरीज़ का इलाज करने में भी मुझे डर लगता है. इलाज के दौरान हमें अपनी सुरक्षा की उतनी ही चिंता रहती है जितना मरीज़ की. ये हालात बदलने चाहिए".
डॉक्टर तो अच्छे हैं पर...
अरुणा ने बताया कि वे अपनी साथी महिला डॉक्टरों से अक्सर चर्चा करती रहीं हैं कि बढ़ते हमलों या धमकियों के बीच महिला डॉक्टरों को तो आत्मरक्षा के तरीके आने ही चाहिए.
गुरूवार को एम्स अस्पताल के हर डिपार्टमेंट के बाहर ज़बरदस्त भीड़ देख कर मरीज़ों से बात की तो ज़्यादातर ने कहा, "डॉक्टर तो बहुत अच्छे हैं यहाँ लेकिन उनके पास सबको देखने का समय ही नहीं है".
बिहार से आए राम शंकर ने कहा, "पिछले डेढ़ महीने में हमने किसी मरीज़ को डॉक्टर से हाथापाई करते तो नहीं देखा लेकिन ये ज़रूर देखा है कि मरीज़ के रिश्तेदार गुस्से में चिल्लाने लगे. कुछ गलती डॉक्टर के कमरे के बाहर प्रशासनिक स्टॉफ की थी और कुछ उन रिश्तेदारों की जो डॉक्टर को ही गाली दे रहे थे".
अस्पताल के ह्रदय रोग विभाग के बाहर राजस्थान के सीकर से एक परिवार इलाज के आया हुआ है और उनको लगा कि, "न इलाज के लिए पर्याप्त डॉक्टर हैं, न अस्पताल और न सुविधाएं".
मारपीट और हड़ताल
गौरतलब ये भी है कि पिछले कुछ समय में भारत के कई राज्यों में डॉक्टरों ने बढ़ते हमलों के चलते विरोध-प्रदर्शन तेज़ किए हैं.
महाराष्ट्र में डॉक्टरों ने हड़ताल की थी और राजस्थान में सरकारी डॉक्टरों ने बेहतर सुरक्षा की मांग की थी.
डॉक्टर हरजीत सिंह ने बात ख़त्म होने से पहले एक कड़वा अनुभव सुनाया.
उन्होंने बताया, "एम्स अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट थी. एक घायल मरीज़ को अंदर लाने वालों की कमर में पिस्तौल लटक रही थी.
कल्पना कीजिए उस मरीज़ को देखने वाले डॉक्टर की क्या हालत रही होगी. मैं ही वो डॉक्टर था."
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