अकाली नेता मनजिंदर सिंह सिरसा बीजेपी में क्यों हुए शामिल? जानिए
नई दिल्ली, 1 दिसंबर: दिल्ली में शिरोमणि अकाली दल के सबसे बड़े चेहरे मनजिंदर सिंह सिरसा ने अचानक बीजेपी का कमल थामकर पंजाब से लेकर दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड तक की राजनीति में सुगबुगाहट ला दी है। भाजपा में शामिल होने से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमिटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। कृषि कानूनों की वापसी के बाद एक जाट सिख नेता का बीजेपी में आना सीधे पंजाब चुनावों से जोड़ा जाना स्वाभाविक है। लेकिन, इसका प्रभाव दूर तक पड़ सकता है। 48 साल के सिरसा हरियाणा के रहने वाले हैं और अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के करीबी माने जाते रहे हैं। उनके भाजपा में आने से अकाली दल को पंजाब चुनाव से पहले बहुत बड़ा झटका लगा है तो यह मौजूदा माहौल में बीजेपी-विरोधी बाकी पार्टियों के लिए भी असहज करने वाली स्थिति है।

'सिख समुदाय से जुड़े मसलों का हल सरकार ही कर सकती है'
मनजिंदर सिंह सिरसा ने बीजेपी में आने के जो कारण बताए हैं, उससे लगता है कि पार्टी उनके जरिए सिर्फ पंजाब का मौजूदा चुनाव ही नहीं साध रही है, वह हरियाणा और दिल्ली के अलावा बाकी चुनावी राज्यों में भी उन्हें एक प्रमुख सिख चेहरे के रूप में पेश कर सकती है। खुद सिरसा के मुताबिक, 'पूरे देश में सिख समुदाय से संबंधित कई मुद्दे हैं और सिर्फ सरकार ही इसका समाधान कर सकती है। मैंने हमेशा ये मामले उठाए हैं। आज मैंने सिख समुदाय की ओर से सामना किए जाने वाले मुद्दों पर गृहमंत्री अमित शाहजी से भी चर्चा की है। मुझे आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि मंत्री ने कहा है कि वह सभी मसलों का समाधान चाहते हैं।'

मनजिंदर सिंह सिरसा बीजेपी में क्यों हुए शामिल?
दिल्ली के राजौरी गार्डन से दो बार विधायक रह चुके सिरसा ने संवाददातओं से कहा है कि वह अपने समुदाय के लिए काम करने और इसके कल्याण के लिए और मानवीय कार्यों को जारी रखने के लिए बीजेपी में आए हैं। उनके मुताबिक 'सिख समुदाय से जुड़े कई मुद्दे हैं, जिनका पिछले 70 वर्षों में समाधान नहीं हुआ है। राष्ट्रीय राजधानी में बाबा बंदा सिंह बहादुरजी शहीद हो गए....लेकिन हम अपने कमजोर नेतृत्व के कारण पिछले 70 वर्षों में सिख समुदाय के लिए एक यूनिवर्सिटी भी नहीं दिला सके......सरहदों पर लड़ने वाले समुदाय की चिंताओं का वर्षों तक समाधान नहीं किया गया तो फिर क्या रह जाता है?'
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सिरसा के आने से भाजपा को क्या फायदा मिलेगा ?
मनजिंदर सिंह सिरसा का बीजेपी में आना इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि वह कृषि कानूनों का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों के लिए लगातार लंगर का प्रबंध करके बीजेपी सरकार-विरोधी उस आंदोलन का भी प्रमुख चेहरा बन चुके हैं। इस आंदोलन के लिए वह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी जा चुके हैं, जब वहां से दिल्ली की ओर कूच कर रहे किसान आंदोलनकारियों को संबंधित सरकारों की ओर से रोकने की कोशिशें की जा रही थीं। गौरतलब है कि पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह भी सिरसा की तरह जाट सिख हैं और वह भी चुनावों में भाजपा के साथ तालमेल की वकालत कर रहे हैं। भाजपा उनके के जरिए पंजाब के अलावा यूपी और उत्तराखंड में भी अपने खिलाफ सिख किसानों में बने माहौल को सुधारने की कोशिश कर सकती है।

कोरोना के समय लोगों की दिल खोलकर सेवा की
अकाली दल (एसएडी) भाजपा के साथ एनडीए गठबंधन से तब अलग हुआ था, जब पिछले साल संसद से तीनों कृषि कानून पारित हुए थे। इसपर पहले आए अध्यादेश के बाद भी उसने सरकार का साथ नहीं छोड़ा था। जहां तक सिरसा की बात है तो वह 2013 और 2017 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में अकाली दल के टिकट पर जीत चुके हैं और तब यह पार्टी एनडीए का ही हिस्सा थी। पिछले कुछ वर्षों से सिरसा दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के अध्यक्ष रहे हैं। कोरोना के कोहराम के दौरान उनके नेतृत्व में डीएसजीएमसी ने लोगों को मेडिकल सेवाएं और तमाम जरूरी सामानों से लेकर विशेष रूप से दूसरी लहर के समय ऑक्सीजन संकट से उबारने के लिए बहुत ही बड़ा और सराहनीय योगदान दिया था। इससे पहले उन्होंने इस संस्था से इस्तीफे की घोषणा करते हुए कहा कि वह आने वाले डीएसजीएमसी का अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन अपने समुदाय, मानवता और राष्ट्र के लिए उनकी सेवा जारी रहेगी।
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