क्यों अहम है भाजपा के लिए कश्मीर की 41 सीटें
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। यूं तो भाजपा जम्मू-कश्मीर की सभी सीटों पर फोकस रख रही है आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए, पर उसकी नजरें हिंदू बहुल जम्मू और लद्दाख़ क्षेत्र की 41 सीटों पर खासतौर पर टिकी हैं। उसे लगता है कि उसका सत्ता में पहुंचाने में इन सीटों की खास भूमिका रहने वाली है। इसके साथ ही भाजपा के रणनीतिकारों को मालूम है कि मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी की 46 सीटें भी उसके फायदा दे सकती हैं।

होगा लाभ भाजपा को
वरिष्ठ पत्रकार आसिफ सोहाफ कहते हैं कि यहां भाजपा को कई निर्वाचन क्षेत्रों में बेघर होने वाले पंडितों के वोट और अलगाववादियों की चुनाव के बहिष्कार की अपील से फ़ायदा हो सकता है।हब्बा कदल, अमीरा कदल, सोपोर, विजयेत और अनंतनाग जैसी सीटों पर वह उम्मीद कर रही है।
अहम पंडितों के वोट
जानकार मानते हैं कि वर्ष 1996 के बाद पहली बार कश्मीर में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के वोट पर अहम हो गए हैं। इसलिए उन्हें सभी राजनीतिक दल पटा रहे हैं किशमिशी वादे करके। कश्मीरी पंडितोंकी संख्या श्रीनगर की हब्बाकदल, अमीराकदल, खानयार सीट के अलावा उत्तरी कश्मीर के रफियाबाद व सोपोर और दक्षिण कश्मीर में देवसर, शांगस, पहलगाम और वाची में बहुतहै। लेकिन हब्बाकदल, अमीराकदल, पहलगाम, देवसर और शांगस से ही कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित उम्मीदवार विभिन्न चुनावों में विजयी रहे हैं।
ध्यान रहे कि राज्य में विधानसभा चुनाव के इतिहास में अब तक गठित 11 विधानसभाओं में सिर्फ निवर्तमान 11वीं विधानसभा ही ऐसी रही है, जिसमें कोई कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित विधायक नहीं था। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में घाटी की 46 सीटों में से 15 पर 34 कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन कोई भी चुनाव जीत नहीं पाया।
गुजरे दौर में डीपी धर और प्यारे लाल हांडु से लेकर रमन मटटु तक कश्मीरी पंडित समुदाय से संबंधित छह विधायक विधानसभा में अपने-अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इनके अलावा खेमलता वखलू भी विधायक रही हैं, लेकिन वह मनोनीत थीं। बहरहाल भाजपा के लिए बेहद खास है प्रदेश की 41 सीटें। देखिए इनमें उसे कैसी सफलता मिलती है।












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