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अनिल कुमार अमरोही की कलम सेः आंकड़ों से परे है असल महंगाई की सच्चाई

बेंगलूरू। महंगाई का आंकड़ा निचले स्तर पर आ गया है। यह आंकड़ा आया है कि महंगाई दर 7.8 फीसदी पर आ गई है। लेकिन क्या वाकई महंगाई कम हो गई है। यह सवाल बरकरार है। थोड़ा सा धरातल पर जाकर देखें तो सच्चाई यही है कि महंगाई कम नहीं हुई है। इस आंकड़े को नीचे आने को कई लोग मान रहे हैं कि महंगाई कम हो गई है।

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दरअसल महंगाई कम नहीं बल्कि आंकड़ा थोड़ा नीचे आया है। मान लीजिए अगर महंगाई सालों से बढ़ी हुई हो और अचानक एक सप्ताह में एक परिवर्तन देखने को मिलता है। वो यह कि महंगाई का आंकड़ा पहले के मुताबिक औऱ भी तेजी से उछाल मारकर अपने ऊच्च स्तर को छू लेता है।

औऱ फिर कुछ समय बाद वह उच्च स्तर थोड़ा वापस उसी स्तर पर आ जाता है जिस स्तर से उसने महंगाई के उच्च स्तर को छुआ था। तो क्या यह महंगाई कम होना कहा जाएगा। आपको बता दें कि सच्चाई यह है कि 2008 तक आर्थिक विकास दर अच्छी थी। सात से ऊपर तक गई थी। लेकिन यूरोपीय देशों में आर्थिक संकट से भारतीय अचानक शेयर बाजार गिरा, विकास दर धड़ाम से गिरी जो अभी तक नहीं उठी है। बस तभी से महंगाई तीव्रता के साथ अपने चरम पर है।

यह इसलिए भी है क्योंकि घाटे के दौर में नौकरियां कम, गीरीबी कम नहीं हो रही है, लेकिन कीमते बढ़ रही हैं। इसमें काफी हद तक भूमिका भ्रष्टाचार की भी है।

वैसे बताया जा रहा है कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर लगातार तीसरे माह गिरते हुए अगस्त में पांच साल के न्यूनतम स्तर 3.74 प्रतिशत तक लुढ़क गई है। देखते है कितनी सस्ती होती हैं खाद्य वस्तुएं।

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