Santishree Dhulipudi Pandit: कौन हैं शांतिश्री धुलीपुडी पंडित, शिक्षा मंत्रालय ने किस बात को लेकर भेजा नोटिस
Who is Santishree Dhulipudi Pandit: जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित का नाम इन दिनों चर्चाओं में है। वजह है उनका एक सम्मेलन से गायब रहना। शिक्षा मंत्रालय ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित से हाल ही में गुजरात में हुए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के सम्मेलन में शामिल न होने पर जवाब मांगा है। मंत्रालय ने कहा है कि इस गैरहाजिरी को "गंभीरता से देखा जा रहा है"।
सूत्रों के मुताबिक, उच्च शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कुलपति को इस सप्ताह एक पत्र भेजा है। पत्र में बताया गया है कि उन्हें सम्मेलन में शामिल होने के लिए पहले ही आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने न तो पहले दिन और न ही दूसरे दिन कार्यक्रम में शिरकत की। मंत्रालय ने कहा कि उनकी उपस्थिति सम्मेलन के लिए "मूल्यवान" हो सकती थी और उनकी गैरमौजूदगी से कई अहम चर्चाएं अधूरी रह गईं।

कौन हैं शांतिश्री धुलीपुडी पंडित? (Who is Shantishree Dhulipudi Pandit)
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलीपुडी पंडित देश की जानी-मानी शिक्षाविद हैं। वह फरवरी 2022 में जेएनयू की पहली महिला कुलपति बनीं। उनका जन्म 15 जुलाई 1962 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुआ था। शांतिश्री ने चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज से इतिहास और समाजशास्त्र में स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एमफिल और PhD की डिग्रियां हासिल कीं।
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शांतिश्री को पढ़ाने और शोध का 35 से ज्यादा वर्षों का अनुभव है। उन्होंने 30 से अधिक PhD छात्रों को मार्गदर्शन दिया है और कई किताबें और शोध लेख भी लिखे हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1988 में गोवा यूनिवर्सिटी से की थी और फिर पुणे यूनिवर्सिटी में राजनीतिक शास्त्र की प्रोफेसर बनीं। वह यूजीसी, आईसीएसएसआर और कई अन्य राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं से भी जुड़ी रही हैं। शांतिश्री तमिल, तेलुगू, हिंदी, संस्कृत, मराठी और अंग्रेज़ी भाषा में निपुण हैं, और कन्नड़, कोकण और मलयालम भाषाओं को भी समझती हैं। कुलपति बनने के बाद से ही वह जेएनयू में शैक्षणिक विकास और भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए कई नई पहल कर रही हैं।
क्या है विवाद?
केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का सम्मेलन 10 और 11 जुलाई को गुजरात के केवड़िया में आयोजित हुआ था, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, यूजीसी के अधिकारी, शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सदस्य और सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति शामिल हुए थे। यह कार्यक्रम 'शिक्षा में बदलाव के केंद्र बिंदु के रूप में केंद्रीय विश्वविद्यालय' विषय पर केंद्रित था। इस सम्मेलन में शांतिश्री धुलीपुडी पंडित को भी उपस्थित रहना था लेकिन वो नहीं आईं। सम्मेलन से अनुपस्थित रहने को लेकर उनसे जवाब मांगा गया है।
जेएनयू में चल रहा था अलग सम्मेलन
उसी समय जेएनयू में 'भारतीय ज्ञान प्रणाली' (Indian Knowledge Systems) पर तीन दिन का अलग सम्मेलन चल रहा था, जिसकी शुरुआत 10 जुलाई को पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने की थी। शिक्षा मंत्रालय ने अपने पत्र में इस बात को स्वीकार किया है कि दोनों कार्यक्रमों की तारीखें एक जैसी थीं, लेकिन इसके बावजूद उम्मीद की गई थी कि कुलपति जेएनयू के उद्घाटन समारोह के बाद 11 जुलाई को गुजरात के सम्मेलन में शामिल हो सकती थीं।
एकमात्र कुलपति जिन्हें भेजा गया नोटिस
मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि सम्मेलन में केवल जेएनयू की कुलपति ही अनुपस्थित रहीं और सिर्फ उन्हें ही इस तरह का पत्र भेजा गया है। अधिकारी ने कहा, "दोनों कार्यक्रम जरूरी थे। उन्हें दोनों में शामिल होना चाहिए था। ऐसा संवाद सिर्फ यह याद दिलाने के लिए होता है कि जब आप किसी अहम पद पर होते हैं, तो सभी जिम्मेदारियों को संतुलन के साथ निभाना जरूरी होता है।"
सम्मेलन का मकसद था शैक्षणिक नीतियों पर संवाद
इस दो दिवसीय सम्मेलन का उद्देश्य था यह देखना कि केंद्रीय विश्वविद्यालय नई शिक्षा नीति और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के साथ किस हद तक जुड़े हुए हैं। साथ ही इसमें संस्थागत नवाचार, अनुसंधान, शैक्षणिक नेतृत्व और वैश्विक चुनौतियों पर भी चर्चा की गई।
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