संत तुकाराम को जानिए, जिनके मंदिर का उद्घाटन करेंगे पीएम मोदी

संत तुकाराम
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को महाराष्ट्र का दौरा कर रहे हैं. अपने दौरे के पहले हिस्से में प्रधानमंत्री पुणे के देहू में संत तुकाराम महाराज मंदिर का उद्घाटन करेंगे. प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी शेड्यूल के मुताबिक़ प्रधानमंत्री दिन के दोपहर 1:45 बजे के आसपास मंदिर का उद्घाटन करेंगे. संत तुकाराम वारकरी संप्रदाय के संत और कवि थे. उन्होंने अपने अभंग (जिन्हें भक्ति गीत कहा जाता है) और कीर्तन के ज़रिए बड़े पैमाने पर लोगों को जागृत करने का काम किया था. कहा जाता है कि संत तुकाराम ने ही महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन की नींव डाली थी. प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़ संत तुकाराम के जन्मस्थल देहू में उनके निधन के बाद एक शिला मंदिर बनाया गया था लेकिन इसे औपचारिक तौर पर मंदिर के रूप में विकसित नहीं किया गया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस मंदिर का उद्घाटन करेंगे, इसे 36 चोटियों के साथ पत्थर की चिनाई के साथ बनाया गया है, इसमें संत तुकाराम की मूर्ति स्थापित की गई है.

संत तुकाराम का जन्म महाराष्ट्र के पुणे के देहू गाँव में हुआ था, हालांकि उनके जन्म के साल को लेकर मतांतर है. कुछ जगहों पर उनका जन्म 1598 बताया गया है जबकि कुछ जगहों पर 1608 कहा गया है कि उनका जन्म खेतिहर माने जाने वाले कुन्बी समुदाय में हुआ था. हालांकि जब उनकी उम्र आठ साल की थी तभी इनके माता-पिता का निधन का हो गया था.

विष्णु के परम भक्त

संत तुकाराम विट्ठल यानी विष्णु के परम भक्त थे. यानी वैष्णव धर्म में उनकी आस्था थी. उनकी पहली पत्नी और बेटे का निधन देश में 1630 के आसपास पड़े अकाल में हो गया था और माना जाता है कि इस दुख का असर उनकी अभंग भक्ति पद पर दिखा. उन्होंने दूसरी शादी भी की लेकिन इस शादी में भी कटुता बनी रही.

इसके बाद ही उन्होंने अपना अधिकांश जीवन भक्तिपदों की रचना और कीर्तन गाने में लगा दिया. वे समाज की बुराइयों और सामाजिक व्यवस्था की खामियों पर अपने भक्ति पदों के माध्यम से चोट करते थे, लिहाजा उस वक़्त के प्रभावशाली जमात से उन्हें विरोध भी झेलना पड़ता था.

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वैसे संत तुकाराम के भक्तिपदों में चार हज़ार से ज़्यादा रचनाएं आज भी मौजूद हैं. इनके भक्ति पदों के अंग्रेजी अनुवाद पर दिलीप चित्रे को 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था.

बीबीसी मराठी के लिए संत तुकाराम के वंशज डॉ. सदानंद मोरे ने जुलाई, 2018 में एक आलेख लिखा था. इसमें उन्होंने विस्तार से उन बातों का ज़िक्र किया था, जिसकी शिक्षा संत तुकाराम के अभंगों में मिलती है.

मोरे के मुताबिक़ संत तुकाराम ने संत ज्ञानेश्वर, एकनाथ, नामदेव और कबीर जैसे संतों की शिक्षा को आत्मसात किया था, इसलिए वे कहा करते थे धर्म का पालन पाखंड का खंडन करने के लिए होता है.

मोरे ने लिखा है कि यही संत तुकाराम का सच्चा धर्म था, उनकी शिक्षाएं समानता और मानवता के प्रेम पर आधारित थीं.

संत तुकाराम को विद्रोही कवि के तौर पर भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने स्थापित व्यवस्थाओं को चुनौती दी. सदानंद मोरे के मुताबिक़ उनका विद्रोह सकारात्मक होता था क्योंकि उनका इरादा किसी चीज़ को नष्ट करने का नहीं होता था.

संदानंद मोरे ने लिखा है, "यीशू मसीह ने कहा था कि मैं समृद्ध करने आया हूं, विनाश करने नहीं. मुझे लगता है कि संत तुकोबा पर भी यही सिद्धांत लागू होता है. वे सीधे उन लोगों की आलोचना करते थे जो स्थापित व्यवस्था में समानता और प्रेम के ख़िलाफ़ थे."

समानता और मानवता से प्रेम का पाठ

मोरे के मुताबिक महाराष्ट्र में धर्म और जाति के नाम पर चल रहे भ्रष्टाचार का तुकोबा ने विरोध किया था और उनका विरोध ही 19वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुई जागृति का आधार बनी थी. उन्होंने कहा था जो कोई भी समानता और मानवता के धर्म को आगे बढ़ाता है, उसे भगवान माना जाना चाहिए.

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मोरे ने यह भी कहा है कि तुकाराम अपने भक्ति पदों और कीर्तन में ज़ोर देकर कहा करते थे कि धर्म मनुष्य और ईश्वर के साथ साथ मनुष्य और मनुष्य के बीच के संबंध के बारे में भी है.

संत तुकाराम को लोग तुकोबा के नाम से भी जानते हैं. उनकी एक ख़ासियत भी थी कि वे अध्यात्मिकता की बात करने के साथ-साथ सांसारिक विचारों की बात भी कहते थे, वे व्यवहारिक दुनिया में रहने के तौर तरीकों की बात करते थे.

उन्होंने दुनियादारी से लगाव छोड़ने की बात ज़रूर कही लेकिन यह कभी नहीं कहा कि दुनियादारी मत करो.

आज जब हर तरफ़ चीजों को एक ही चश्मे से देखने का ज़ोर बढ़ रहा है लेकिन 17वीं शताब्दी के शुरुआती सालों में संत तुकराम ने अपनी सीखों में बताया था कि किसी की पहचान को मिटाए बिना दुनिया के साथ कैसे रहना है.

संत तुकाराम हमेशा कहते थे कि दुनिया में कोई भी दिखावटी चीज़ नहीं टिकती, झूठ को लंबे समय तक संभाला नहीं जा सकता.

सदानंद मोरे के मुताबिक निम्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकल कर वे अपने समकालीनों से कहीं ज़्यादा प्रगतिशील थे और उन्होंने बिना अर्थ समझे वेदों का पठ करने वाले ब्राह्मणों को चुनौती दी थी कहा था कि वे भले ब्राह्मण नहीं हैं लेकिन वेदों का अर्थ बख़ूबी जानते थे.

संत तुकाराम का निधन के साल को लेकर भी मतांतर की स्थिति है. कुछ लोगों के मुताबिक उनका निधन 1639 में हुआ था तो कुछ लोगों के मुताबिक उनका निधन 1650 में हुआ था.

हालांकि उनकी मौत किस तरह से हुई थी, इसको लेकर भी विवाद है. उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने समाधि ली थी तो उनके आलोचकों का मनाना है कि उनकी हत्या हुई थी.

लेकिन महाराष्ट्र के समाज पर उनका व्यापक प्रभाव था, लिहाजा उन पर मराठी, तेलूगु, हिंदी और अन्य भाषाओं में कई फ़िल्मों का निर्माण हुआ है. 1936 में बनी मराठी फ़िल्म तो ओपन थिएटर में हाउस फुल हुआ करती थी.

इसके अलावा भारत सरकार ने 2002 में उनकी याद में 100 रुपये का चांदी का सिक्का जारी किया था.

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