इमरान ख़ान पर जानलेवा हमला करने वाला नवीद अहमद कौन है?
सुहादरा में मुस्लिमाबाद मोहल्ले की मस्जिद रज़ा वाली गली में एक छोटा-सा घर है, जिसमें अभी तक अंदर और बाहर से प्लास्टर नहीं हुआ है. इसकी केवल सीमेंट से चिनाई की गई है, यह घर अभी तक निर्माणाधीन है. इस निर्माणाधीन मकान में नवीद अहमद अपने दो छोटे-छोटे बेटों, बूढ़ी मां और पत्नी के साथ रहता है.
वज़ीराबाद का यह इलाक़ा इमरान ख़ान के लॉन्ग मार्च पर फ़ायरिंग के बाद से चर्चा में है. क्योंकि पुलिस हिरासत में मौजूद कथित हमलावर नवीद अहमद को इसी इलाक़े का बताया जा रहा है.
तहरीक-ए-इंसाफ़ के लॉन्ग मार्च का कंटेनर जब वज़ीराबाद के अल्लाहवाला चौक पर पहुंचा तो वहां अचानक फ़ायरिंग शुरू हो गई, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान समेत कुछ लोग घायल हो गए.
इसके तुरंत बाद, पीटीआई के कार्यकर्ता कथित हमलावर नवीद अहमद के पीछे भागे, जिसे उन्होंने फ़ायरिंग करते देखा था और एक कार्यकर्ता ने तो फ़ायरिंग के दौरान उसे रोकने की भी कोशिश की थी.
नवीद अहमद को कुछ ही देर में इलीट फ़ोर्स ने पकड़ लिया और स्थानीय पुलिस स्टेशन ले जाया गया.
इस घटना पर अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है और न ही पुलिस की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी किया गया है. लेकिन गुजरात के कुंजा थाने के अंदर से नवीद अहमद के कई वीडियो सामने आए हैं जिसमें वह इमरान ख़ान पर हमले की बात क़बूल कर रहा है.
इसके बाद, पंजाब के मुख्यमंत्री चौधरी परवेज़ इलाही ने गोली चलाने वाले आरोपी का वीडियो बयान लीक करने की घटना पर सख़्त संज्ञान लेते हुए संबंधित पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया है.
और उनके मोबाइल फ़ोन फॉरेंसिक जांच के लिए ज़ब्त कर लिए गए हैं. जबकि आरपीओ गुजरात के अनुसार, 'आरोपी को हिरासत में लिया गया है, और फिलहाल कोई अंतिम बयान नहीं दिया जा सकता है.'
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नवीद और उसका परिवार
सुहादरा चिनाब नदी के तट पर स्थित है. यह घनी आबादी वाला शहर है. ऐसा माना जाता है कि इस शहर के लगभग हर परिवार में से कम से कम एक सदस्य विदेश में काम कर रहा है.
नवीद अहमद के बड़े बेटे की उम्र क़रीब डेढ़ साल है जबकि छोटे बेटे का जन्म अभी दस दिन पहले हुआ है.
वे जिस घर में रहते हैं वह उनकी मां को विरासत में मिला हुआ है जो नावीद के हिस्से में आया है.
स्थानीय पत्रकार अक़ील अहमद लोधी के मुताबिक़, ''आरोपी ने अपने भाइयों को हिस्सा देकर यह मकान अपने पास रख लिया था.
नवीद अहमद के पिता मोहम्मद बशीर का करीब पंद्रह साल पहले निधन हो गया था. उनके पिता नल लगाने (बोरिंग) और कबाड़ का काम करते थे.
उनके दूसरे भाई अपने पिता के छोड़े हुए ही काम को कर रहे थे. चूंकि नल लगाने का काम अब थोड़ा आधुनिक हो गया है, इसलिए ये लोग अब बोरिंग के लिए मशीनों का इस्तेमाल करते हैं. नवीद अहमद ने चार साढ़े चार साल तक सऊदी अरब में काम किया और कुछ महीने पहले ही वापस लौटा है.
उनके एक पड़ोसी अब्दुल्लाह के मुताबिक़ वह चार-पांच साल सऊदी अरब में रहा और वहां मेहनत मज़दूरी करता था. वापस आने के बाद कोई ख़ास काम नहीं कर रहा था. हालांकि वह अपने भाई के साथ बोरिंग के काम में हाथ बटाता था. इसके अलावा कबाड़ का काम करता था.
अब्दुल्लाह ने बताया कि नवीद अहमद सुन्नी बरेलवी संप्रदाय से हैं. वह नमाज़ अदा करने के लिए मस्जिद में कभी-कभी ही जाते थे.
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कैसा है परिवार
सुहादरा के ही रहने वाले ख़ालिद मजीद ने बताया कि उनका परिवार बिल्कुल भी धार्मिक नहीं है. मैंने उसे कभी भी नियमित रूप से नमाज़ पढ़ते नहीं देखा है. यह एक सामान्य पारंपरिक धार्मिक घराना है.
ख़ालिद मजीद के मुताबिक़, 'जब मैंने सुना कि उसने फ़ायरिंग की है तो मैं हैरान रह गया. क्योंकि वह तो किसी को थप्पड़ तक मारने वाला बंदा नहीं दिख रहा था."
एक अन्य पड़ोसी, मोहम्मद अशरफ़ से जब यह पूछा गया कि क्या नवीद अहमद इलाक़े में लड़ाई झगड़ा करता था, तो उन्होंने कहा, "बिल्कुल नहीं." कभी उसे किसी से लड़ाई झगड़ा करते हुए नहीं देखा. मैंने उन्हें हमेशा काम करते या घर पर रहते हुए देखा है.
स्थानीय निवासी ख़ालिद मजीद के मुताबिक़, 'वह ज़्यादातर ख़ामोश रहने वाला आदमी था. वह लड़ाई झगड़े में नहीं पड़ता था.
हालांकि, एक पड़ोसी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उसका धार्मिक झुकाव एक ख़ास समूह के प्रति महसूस होता था. वह स्थानीय मस्जिद में होने वाले धार्मिक कार्यों में शामिल होता रहता था.
मोहल्ला मुस्लिमाबाद के रहने वाले बाबर हुसैन का कहना है, "मुझे नहीं पता कि वह किसी राजनीतिक या धार्मिक संगठन से जुड़ा हुआ हैं या नहीं." वह एक साधारण सा आदमी था. आते जाते उससे सलाम दुआ हो जाती थी. सलाम दुआ से ज़्यादा कोई बात नहीं करता था. वह एक आम सा बंदा था और आम से बंदो के साथ ही रहता था.
एक अन्य व्यक्ति ने स्थानीय पत्रकार अक़ील अहमद ख़ान लोधी को बताया, ''आरोपी नवीद अहमद के घर के पास एक घर में डैफोडिल्स स्कूल है, जहां कुछ दिन पहले एक समारोह हुआ था जिसमें संगीत का भी इस्तेमाल किया गया था. इसे लेकर नवीद अहमद की शेख़ पाहवा और स्कूल प्रशासन से बहस भी हुई थी.
इस स्कूल की प्रिंसिपल एक महिला हैं, जिनसे इस घटना की पुष्टि करने के लिए पत्रकार अक़ील अहमद लोधी ने संपर्क किया था, लेकिन संपर्क नहीं हो सका. पत्रकार अक़ील अहमद लोधी के मुताबिक़, ''स्कूल की प्रिंसिपल दूसरे मोहल्ले में रहती हैं, जबकि आरोपी के परिवार के ज़्यादातर लोग या तो पुलिस की गिरफ्त में हैं या फ़रार हो गए हैं.''
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हमले से पहले कैसा था व्यवहार
क्या स्थानीय लोगों ने गुरुवार या बुधवार को कोई संदिग्ध गतिविधि देखी?
आरोपी नवीद अहमद के कई पड़ोसियों से पूछा गया, कि ''आज या कल, क्या किसी ने आरोपी को इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ बोलते हुए सुना है या किसी ऐसी गतिविधि में देखा है जो सामान्य से हट कर हो या संदिग्ध हो?''
लेकिन सभी लोगों से एक ही जवाब मिला, 'किसी ने उन्हें इमरान ख़ान या तहरीक-ए-इंसाफ़ की रैली के बारे में बात करते नहीं सुना और न ही उन्हें किसी संदिग्ध गतिविधि में शामिल पाया.'
सुहादरा के स्थानीय निवासी ख़ालिद मजीद ने हमें बताया, "रात के दस बज चुके हैं. मेरे डेरे में पांच-सात लोग बैठे है, जिनकी बातचीत का विषय यही है कि आज या कल, क्या किसी ने आरोपी को इमरान ख़ान और लॉन्ग मार्च के बारे में गुस्सा या नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए देखा है? हर कोई इस बारे में अंजान और मेरी तरह हैरान है."
हमसे बात करते हुए कथित आरोपी नवीद अहमद को रोकने वाले पीटीआई कार्यकर्ता इब्तिसाम अहमद के भाई ज़रग़म अली ने कहा, 'जिस आरोपी का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, यह नवीद अहमद ही है और इसको मेरे भाई ने पकड़ा था. लेकिन उस समय नवीद अहमद ने जैकेट पहन रखी थी और बयान देते हुए जैकेट उतार दी गई."
एक स्थानीय चैनल को दिए इंटरव्यू में इब्तिसाम ने बताया कि वह कंटेनर से क़रीब 15 फ़ीट की दूरी पर था जबकि नावीद उससे क़रीब 10 फ़ीट दूर दायीं तरफ़ था. जैसे ही उसने अपनी सलवार में हाथ डाला और पिस्तौल निकाली, तो मेरी नज़र पड़ गई. एक पल के लिए उसका हाथ कंटेनर की तरफ़ हो गया, मैंने दौड़ कर उसका हाथ हटाया ताकि गोली कंटेनर की तरफ़ न जाए.
उन्होने बताया, कि उनका मानना है कि नावेद के पास ऑटोमैटिक हथियार था क्योंकि उसे इसे बीच में लोड नहीं करना था.
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