Madhav Gadgil Passed Away: कौन थे माधव गाडगिल, जिनकी चेतावनी को सिस्टम ने समझा कचरा! भुगतना पड़ा भारी खामियाजा
Madhav Gadgil Passed Away: भारत के पर्यावरण संरक्षण की बुलंद आवाज और पश्चिमी घाट के रक्षक माने जाने वाले दिग्गज पारिस्थितिकी विज्ञानी (Ecologist) माधव गाडगिल का निधन हो गया। 83 वर्षीय गाडगिल ने बुधवार रात पुणे के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके बेटे सिद्धार्थ गाडगिल ने इस खबर की पुष्टि की।
माधव गाडगिल सिर्फ एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी दूरदर्शी शख्सियत थे जिन्होंने दशकों पहले ही विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश से होने वाली तबाही की भविष्यवाणी कर दी थी।

पश्चिमी घाट के 'मसीहा' जिनकी चेतावनी सच साबित हुई
माधव गाडगिल को मुख्य रूप से उनकी ऐतिहासिक 'गाडगिल रिपोर्ट' (2011) के लिए जाना जाता है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि पश्चिमी घाट के संवेदनशील इलाकों में अनियंत्रित निर्माण और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं विनाशकारी साबित होंगी। उनकी भविष्यवाणियों की भयावह सच्चाई तब दिखी जब 2024 में केरल के वायनाड में भीषण भूस्खलन हुआ और सैकड़ों जानें चली गईं। गाडगिल ने सालों पहले इस इलाके को 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील' घोषित करने की सिफारिश की थी, जिसे सरकारों ने 'विकास विरोधी' बताकर ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
हार्वर्ड से लेकर हिमालय तक
पुणे में जन्मे और पले-बढ़े गाडगिल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि ली, लेकिन उनका दिल हमेशा भारत की मिट्टी और जंगलों में बसा रहा। उन्हें 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' चुना गया था। UNEP ने उन्हें एक ऐसा 'पीपल्स साइंटिस्ट' कहा, जिसने विज्ञान को प्रयोगशालाओं से निकालकर आदिवासियों, किसानों और मछुआरों के बीच पहुंचाया। उन्होंने हमेशा 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण (नीचे से ऊपर की ओर) का समर्थन किया, जहां संरक्षण का अधिकार स्थानीय लोगों के पास होना चाहिए।
चिपको आंदोलन और हिमालयी संकट पर बेबाक राय
गाडगिल का मानना था कि हिमालय और पश्चिमी घाट की चुनौतियां अलग हैं लेकिन खतरे समान हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि कैसे 1972 का चिपको आंदोलन अलकनंदा में आई बाढ़ के कारण शुरू हुआ था, जो पेड़ों की कटाई का नतीजा था। उन्होंने समझाया कि हिमालय, जो समुद्री तलछट से बना है, पश्चिमी घाट की तुलना में कहीं अधिक नाजुक है। उनका तर्क था कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने की कीमत हमेशा आम आदमी को चुकानी पड़ती है।
वो रिपोर्ट जिस पर मचा था राजनीतिक घमासान
2011 में गाडगिल पैनल ने सिफारिश की थी कि पश्चिमी घाट के 75% हिस्से को 'पर्यावरण संवेदनशील' घोषित किया जाए। इस रिपोर्ट ने राजनीतिक गलियारों में भूकंप ला दिया। कई राज्यों ने इसे बहुत सख्त बताया। नतीजतन, सरकार ने कस्तूरीरंगन पैनल बनाया जिसने इस दायरे को घटाकर 50% कर दिया। आज भी गाडगिल रिपोर्ट की सिफारिशें पूरी तरह लागू होने का इंतजार कर रही हैं, जबकि प्रकृति बार-बार आपदाओं के जरिए हमें चेतावनी दे रही है।
माधव गाडगिल एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु में 'सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज' की स्थापना की। वे भारत के जैव विविधता अधिनियम (Biological Diversity Act) का मसौदा तैयार करने में भी शामिल थे। अपनी आत्मकथा A Walk Up The Hill: Living With People And Nature में उन्होंने पक्षी विज्ञानी पिता के प्रभाव और प्रकृति के प्रति अपने लगाव को विस्तार से लिखा है।
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