जानिए, गुजरात की किन सीटों को लेकर मोदी-शाह को है ज्यादा टेंशन?
नई दिल्ली- 2014 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। मोदी लहर में सवार होकर पार्टी गुजरात की सारी सीटें जीत गई थी। लेकिन, 5 साल में राज्य के राजनीतिक हालात बहुत बदल चुके हैं। 2017 दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव से ही साफ हो गया था कि 2019 का चुनाव मोदी और पार्टी के लिए केकवॉक नहीं रहने वाला है। उन परिणामों का गहराई से विश्लेषण करने से पता चलता है कि राज्य की 8 से 9 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां 2014 के प्रदर्शन को दोहराना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के लिए निश्चित तौर पर टेंशन का कारण हो सकता है, क्योंकि दोनों गुजराती हैं।

इन 8 से 9 सीटों को लेकर है डर
2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पिछले तीन दशकों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देकर राजनीतिक कमल की चमक को फीका कर दिया था। पार्टी ने राज्य की 77 सीटें झटक कर बीजेपी को 99 के चक्कर में फंसा दिया। अगर मौजूदा लोकसभा चुनाव के हिसाब से उस परिणाम का विश्लेषण करें तो 26 में से 8 लोकसभा सीटों पर बीजेपी के लिए खतरे के संकेत हैं। दरअसल, इन सीटों पर कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले 14,000 से 1.68 लाख तक ज्यादा वोट मिले थे। लोकसभा की ये सीटें हैं- बनासकांठा, पाटन, मेहसाणा, साबरकांठा, सुरेंद्रनगर, जूनागढ़,अमरेली और आणंद। यानि बीजेपी को जिन 8 सीटों पर अपना बिगड़ा हुआ घर संभालना है, उनमें से 7 सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात में ही आते हैं।
हालांकि, महाराष्ट्र की तरह अगर गुजरात में भी कांग्रेस ने एनसीपी के साथ तालमेल कर लिया तो पोरबंदर सीट भी बीजेपी के लिए भारी पड़ सकती है। यहां की कुटियाना विधानसभा सीट पर 2017 में एनसीपी के कांधल जडेजा जीते थे। कांग्रेस को भी वहां 11,000 वोट मिले थे। अगर एनसीपी और कांग्रेस के वोट जोड़ दिए जाएं, तो बीजेपी के सभी उम्मीदवारों को मिले वोट से कांग्रेस को मिला कुल वोट यहां भी ज्यादा हो सकता है।

अंकगणित ठीक करने की कोशिश
शायद यही कारण कि बीजेपी ने इन 9 में से अब तक तीन सीटों पर प्रत्याशी बदल दिए हैं। मसलन बनासकांठा से हरिभाई पारथीभाई चौधरी की जगह, परबतभाई पटेल, सुरेंद्रनगर से देवजी फतेहपारा की जगह महेंद्र मुंजपारा और पोरबंदर से विट्ठल रड़ाड़िया की जगह रमेश धडुक को टिकट दिया गया है। वैसे अमरेली और सांबरकाठा में मौजूदा सांसदों क्रमश: नारन कछाड़िया और दीपसिंह राठौड़ पर ही दोबारा दांव लगाया है। वैसे बीजेपी का मानना है कि लोकसभा चुनाव की तुलना विधानसभा चुनाव से नहीं होनी चाहिए। क्योंकि, उसके मुताबिक इसमें मोदी के नाम पर वोटिंग होनी है, जिसमें बीजेपी को कोई परेशानी नहीं होने वाली। वैसे इस महीने की 4 और 5 तारीख को मोदी ने पाटीदार समुदाय के दो कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था, जिसमें 5 लाख से ज्यादा पाटीदार मौजूद थे। बीजेपी को ये भी भरोसा है कि आर्थिक तौर पर पिछड़ों को 10% आरक्षण देने के ऐलान से भी 2015 के पाटीदार आंदोलन की धार कमजोर पड़ चुकी है।

2017 के बाद से डैमेज कंट्रोल मोड में है पार्टी
दरअसल, बीजेपी विधानसभा चुनाव के कुछ महीने बाद ही राज्य में डैमेज कंट्रोल के मोड में आ गई थी। सौराष्ट्र क्षेत्र में करारी हार के बाद कांग्रेस नेता और ओबीसी वोट बैंक पर दबदबे वाले कुंवरजी बावलिया को पार्टी में शामिल करके 4 घंटे के भीतर कैबिनेट में शामिल कर लिया गया था। इसका प्रभाव ये पड़ा कि बीजेपी 3 कांग्रेसी विधायकों को पार्टी में शामिल कराने में सफल हो गई। इकोनॉमिक टाइम के मुताबिक लगभग आधा दर्जन कांग्रेसी विधायक कभी भी बीजेपी ज्वाइन करने के लिए तैयार बैठे हैं। बीजेपी की रणनीति ये है कि जहां उसकी स्थिति पतली है, कांग्रेस नेताओं को अपने पाले में कर लिया जाए। इसी रणनीति के तहत मार्च की शुरुआत में वरिष्ठ कांग्रेस विधायक और ताकतवर अहिर नेता जवाहर चावड़ा ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर बीजेपी का कमल थाम लिया था। सौराष्ट्र की 4 लोकसभा सीटों पर अहिर समुदाय बहुतायत में हैं और चावड़ा गुजरात अहिर समाज के अध्यक्ष हैं। इसी कड़ी में बीजेपी की ओर से युवा ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर को भी पार्टी में शामिल कराने की चर्चा उठी थी, हालांकि उन्होंने इससे इनकार किया था।
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