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लता मंगेशकरः जब प्रधानमंत्री नेहरू की आँखें भर आईं

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar

भारतीय सिनेमा की स्वर कोकिला लता मंगेशकर का निधन हो गया है. उन्हें एक महीने पहले कोरोना संक्रमण के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया था जहाँ आज सुबह 8 बजकर 12 मिनट बजकर उन्होंने अंतिम साँस ली. उनके जीवन के कुछ अनमोल पलों की याद दिलाती श्रद्धांजलि.


जवाहरलाल नेहरू के बारे में मशहूर था कि वो न तो कभी सार्वजनिक तौर पर रोते थे और न ही किसी दूसरे का इस तरह रोना पसंद करते थे. लेकिन 27 जनवरी, 1963 को जब लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप का लिखा गाना 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाया तो वो अपने आँसू नहीं रोक पाए.

गाने के बाद लता स्टेज के पीछे कॉफ़ी पी रही थीं तभी निर्देशक महबूब ख़ाँ ने लता से आ कर कहा कि तुम्हें पंडितजी बुला रहे हैं.

महबूब ने लता को नेहरू के सामने ले जा कर कहा, "ये रही हमारी लता. आपको कैसा लगा इसका गाना?"

नेहरू ने कहा, "बहुत अच्छा. इस लड़की ने मेरी आँखों में पानी ला दिया." और उन्होंने लता को गले लगा लिया.

फ़ौरन ही इस गाने के मास्टर टेप को विविध भारती के स्टेशन पहुंचाया गया और रिकॉर्ड समय में एचएमवी उसका रिकार्ड बनवा बाज़ार में ले आई.

देखते देखते ये गाना एक तरह का 'नैशनल रेज'बन गया.

लता मंगेशकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू
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लता मंगेशकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू

1964 में जब नेहरू मुंबई आए तो लता ने उनके सामने ब्रेबोर्न स्टेडियम में आरज़ू फ़िल्म का गाना 'अजी रूठ कर कहाँ जाएंगे' गाया था.

तब नेहरू ने उनके पास एक चिट भिजवा कर एक बार फिर 'ऐ मेरे वतन के लोगों' सुनने की फ़रमाइश की थी और लता ने उसको पूरा किया था.

संगीतकार मदन मोहन के साथ लता मंगेशकर
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संगीतकार मदन मोहन के साथ लता मंगेशकर

'बरसात' फ़िल्म के बाद लगे करियर में 'पंख'

1949 में अंदाज़ रिलीज़ होने के बाद से संगीत चार्ट के पहले पाँच स्थान हमेशा लता मंगेशकर के ही नाम रहे. हाँलाकि लता जब 80 साल की हुईं तो उन्होंने खुद स्वीकार किया कि उनके करियर में पंख लगे राज कपूर - नरगिस की फ़िल्म बरसात आने के बाद.

लता के बारे में मदन मोहन ने सोलह आने सच बात कही जब उन्होंने लिखा, "1956 में मेट्रो - मर्फ़ी की तरफ़ से हम संगीतकारों को टेलेंट पहचान के लिए पूरे भारत में भेजा गया. हम लोग कोई एक भी ऐसा न ढूंढ पाए जो प्रतिभा के मामले में लता मंगेशकर के आस-पास फटक सके. ये हमारा सौभाग्य था कि लता हमारे ज़माने में अवतरित हुईं."

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar, बड़े गुलाम अली ख़ाँ
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar, बड़े गुलाम अली ख़ाँ

बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की टिप्पणी

असल में जब 1948 में 'महल' रिलीज़ हुई तो गीता रॉय को छोड़ कर एक एक कर लता मंगेशकर के सभी प्रतिद्वंदी शमशाद बेगम, ज़ोहराबाई अंबालावाली, पारुल घोष और अमीरबाई कर्नाटकी उनके रास्ते से हटती चली गईं.

जब 1950 में जब उन्होंने 'आएगा आने वाला' गाया तो ऑल इंडिया रेडियो पर फ़िल्म संगीत बजाने पर मनाही थी. उस समय रेडियो सीलोन भी नहीं था. भारतवासियों ने पहली बार रेडियो गोआ पर लता की आवाज़ सुनी.

https://www.youtube.com/watch?v=z0Y6mCAmqEQ

गोवा उस समय पुर्तगाल के कब्ज़े में था. भारतीय सेनाओं ने उसे 1961 में जा कर आज़ाद करवाया.

जानेमाने शास्त्रीय गायक पंडित जसराज एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, एक बार मैं बड़े गुलाम अली ख़ाँ से मिलने अमृतसर गया, हम लोग बाते ही कर रहे थे कि ट्राँजिस्टर पर लता का गाना 'ये ज़िंदगी उसी की है जो किसी का हो गया'सुनाई पड़ा. ख़ाँ साहब बात करते करते एकदम से चुप हो गए और जब गाना ख़त्म हुआ तो बोले, 'कमबख़्त कभी बेसुरी होती ही नहीं. इस टिप्पणी में पिता का प्यार भी था और एक कलाकार का रश्क भी."

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar

पाँच साल की उम्र में पिता ने पहचानी प्रतिभा

लता के गाने की शुरुआत पाँच साल की उम्र में हुई थी. नसरीन मुन्नी कबीर की किताब 'लता इन हर ओन वॉएस' में खुद लता बताती हैं, "मैं अपने पिता दीनानाथ मंगेशकर को गाते देखती थी, लेकिन उनके सामने मेरी गाने की हिम्मत नहीं पड़ती थी. एक बार वो अपने एक शागिर्द को राग पूरिया धनाश्री सिखा रहे थे. किसी वजह से वो थोड़ी देर के लिए कमरे से बाहर चले गए. मैं बाहर खेल रही थी. मैंने बाबा के शिष्य को गाते हुए सुना. मुझे लगा कि लड़का ढ़ंग से नहीं गा रहा है. मैं उसके पास गई और उसके सामने गा कर बताया कि इसे इस तरह गाया जाता है."

वे बताती हैं, "जब मेरे पिता वापस आय़े तो उन्होंने दरवाज़े की ओट से मुझे गाते हुए सुना. उन्होंने मेरी माँ को बुला कर कहा, 'हमें ये पता ही नहीं था कि हमारे घर में भी एक अच्छी गायिका है.' अगले दिन सुबह छह बजे बाबा ने मुझे जगा कर कहा था तानपुरा उठाओ. आज से तुम गाना सीखोगी. उन्होंने पूरिया धनाश्ररी राग से ही शुरुआत की. उस समय मेरी उम्र सिर्फ़ पाँच साल थी."

संगीतकार अनिल विश्वास के साथ लता मंगेशकर
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संगीतकार अनिल विश्वास के साथ लता मंगेशकर

ग़ुलाम हैदर और अनिल बिस्वास से सीखा

यूँ तो लता मंगेशकर ने कई संगीतकारों के साथ काम किया है लेकिन ग़ुलाम हैदर के लिए उनके मन में ख़ास जगह थी. उन्होंने उन्हें एक सीख दी थी कि 'बीट' पर आने वाले बोलों पर थोड़ा सा ज़्यादा वज़न देना चाहिए. इससे गाना उठता है.

अनिल बिस्वास से लता ने साँस पर नियंत्रण का गुर सीखा.

https://www.youtube.com/watch?v=VzIYiFfjN9k

हरीश भिमानी अपनी किताब 'लता दीदी अजीब दास्ताँ है' ये में लिखते हैं, "अनिल दा इस बात पर बहुत ज़ोर देते थे कि गीत गाते समय साँस कहाँ पर तोड़नी चाहिए कि सुनने वाले को वो खटके नहीं. अनिल बिस्वास ने लता को सिखाया कि दो शब्दों के बीच साँस लेते समय हौले से चेहरा माइक्रोफ़ोन से दूर ले जाओ, साँस लो और तुरंत यथास्थान लौट कर गाना जारी रखो. माइक से आँख-मिचौली की इस प्रक्रिया में, आख़िरी शब्द का अंतिम अक्षर और नए शब्द का पहला अक्षर दोनों ज़...रा ज़ोर से गाने चाहिए."

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar, दिलीप कुमार
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar, दिलीप कुमार

तलफ़्फ़ुज सुधारने में दिलीप कुमार का हाथ

लता के सुरीलेपन के अलावा उर्दू भाषा के उनके बेहतरीन तलफ़्फुज़ ने भी सब का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा. इसका श्रेय कायदे से दिलीप कुमार को दिया जाना चाहिए.

हरीश भिमानी अपनी किताब 'लता दीदी अजीब दास्ताँ है' ये में लिखते हैं, 'एक दिन अनिल बिस्वास और लता मुंबई की लोकल ट्रेन से गोरेगाँव जा रहे थे. इत्तेफ़ाक से उसी ट्रेन में बाँद्रा स्टेशन से दिलीप कुमार चढ़े."

"जब अनिल बिस्वास ने नई गायिका का दिलीप कुमार से परिचय कराया तो वो बोले 'मराठी लोगों के मुंह से दाल भात की महक आती है. वो उर्दू का बघार क्या जाने?"

"इस बात को लता ने एक चुनौती की तरह लिया. इसके बाद शफ़ी साहब ने उनके लिए एक मौलवी उस्ताद की व्यवस्था की, जिनका नाम महबूब था. लता ने उनसे उर्दू की बारीकियाँ सीखीं."

इसके कुछ समय बाद फ़िल्म लाहौर की शूटिंग चल रही थी जहाँ जद्दनबाई और उनकी बेटी नरगिस भी मौजूद थीं. लता ने स्टूडियो में 'दीपक बग़ैर कैसे परवाने जल रहे हैं,' गीत की रिकार्डिंग शुरू की.

रिकार्डिंग के बाद जद्दनबाई ने लता को बुला कर कहा, "माशाअल्लाह क्या 'बग़ैर कहा है. ऐसा तलफ़्फ़ुज़ हर किसी का नहीं होता बेटा."

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar

महबूब ख़ाँ को फ़ोन पर 'रसिक बलमा' गा कर सुनाया

लता की आवाज़ की एक और ख़ासियत थी, उसका लगातार युवा होते जाना. 1961 में आई जंगली फ़िल्म में जब सायरा बानो के लिए उन्होंने 'काश्मीर की कली हूँ' गाया था, जब उनका स्वर जितना मादक और कमसिन लगा था, वो उतना ही उसके बारह बरस बाद फ़िल्म अनामिका में भी लगा था जब उन्होंने जया भादुड़ी के लिए 'बाहों में चले आओ' गाया था.

उनके बारे में एक कहानी मशहूर है कि 1958 में महबूब ख़ाँ अमरीका में ऑस्कर समारोह में भाग लेने लॉस एन्जेलेस गए हुए थे. समारोह के दो दिन बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा.

राजू भारतन लता मंगेशकर की जीवनी में लिखते हैं, "लता ने उन्हें बंबई से फ़ोन किया. कुशल-क्षेम के बाद महबूब साहब ने कहा कि आपका एक गीत सुनने का बहुत मन कर रहा है, पर इस मुल्क में उसका रिकॉर्ड कहाँ से लाऊँ? लता ने उनसे पूछा कि वो कौन सा गीत सुनना चाहते हैं और फिर महबूब साहब की फ़रमाइश पर टेलिफ़ोन पर ही 'रसिक बलमा' गुनगुना दिया. एक हफ़्ते बाद लता ने फिर एक बार वो गाना महबूब को सुनाया. महबूब साहब के ठीक होने में इस गाने का कितना योगदान था ये तो ईश्वर ही बता सकता है, लेकिन तब से लता के लिए ये गीत स्पेशल हो गया."

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar, नूरजहाँ
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar, नूरजहाँ

नूरजहाँ और लता की वाघा सीमा पर मुलाक़ात

पहले भारत में रहीं और बाद में पाकिस्तान चली गईं नूरजहाँ और लता मंगेशकर के बीच क़रीबी दोस्ती थी.

एक बार जब लता 1952 में अमृतसर गईं तो उनकी इच्छा हुई कि वो नूरजहाँ से मिलें जो कि सिर्फ़ दो घंटे की दूरी पर लाहौर में रहती थीं. फ़ौरन उनको फ़ोन लगाया और दोनों ने घंटों फ़ोन पर बातें कीं और फिर तय हुआ कि दोनों भारत पाकिस्तान सीमा पर एक दूसरे से मिलेंगी.

मशहूर संगीतकार सी रामचंद्रन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "मैंने अपने संपर्कों से ये बैठक 'अरेंज' कराई. ये मुलाक़ात वाघा सीमा के पास उस जगह हुई जिसे सेना की भाषा में 'नो मैन्स लैंड' कहा जाता है."

"जैसे ही नूरजहाँ ने लता को देखा वो दौड़ती हुई आईं और किसी बिछड़े हुए दोस्त की तरह उन्हें ज़ोर से भींच लिया. दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे. हम लोग भी जो ये नज़ारा देख रहे थे अपने आँसू नहीं रोक पाए. यहाँ तक कि दोनों तरफ़ के सैनिक भी रोने लगे."

"नूरजहाँ लता के लिए लाहौर से बिरयानी और मिठाई लाई थीं. नूरजहाँ के पति भी उनके साथ थे. लता के साथ उनकी दोनों बहनें मीना और ऊषा और उनकी एक दोस्त मंगला थी. ये घटना बताती है कि संगीत के लिए कोई भी चीज़ बाधा नहीं होती."

रफी और मुकेश के साथ लता मंगेशकर
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रफी और मुकेश के साथ लता मंगेशकर

मोहम्मद रफ़ी से मनमुटाव

यूँ तो लता ने कई गायकों के साथ गाया लेकिन मोहम्मद रफ़ी के साथ गाए उनके गानों को लोगों ने बहुत पसंद किया.

रफ़ी के बार में बाते करते हुए लता ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया था, "एक बार मैं और रफ़ी साहब स्टेज पर गा रहे थे. गाने की लाइन थी 'ऐसे हँस हँस के ना देखा करो तुम सब की तरफ़ लोग ऐसी ही अदाओं पर फ़िदा होते हैं' रफ़ी साहब ने इस लाइन को पढ़ा 'लोग ऐसे ही फ़िदाओं पे अदा हैं.' ये सुनना था कि लोग ठहाका लगा कर हँस पड़े. रफ़ी साहब भी हँसने लगे और फिर मेरी भी हँसी छूट गई. नतीजा ये रहा कि हम लोग गाने को पूरा ही नहीं कर पाए और आयोजकों को पर्दा खींच कर उसे ख़त्म करवाना पड़ा."

साठ के दशक में उनके गानों की रॉयलटी को ले कर रफ़ी साहब से मतभेद हो गए. उस लड़ाई में मुकेश, तलत महमूद. किशोर कुमार और मन्ना डे लता के साथ थे जबकि आशा भोंसले मोहम्मद रफ़ी का साथ दे रही थीं.

चार सालों तक दोनों ने एक दूसरे का 'बॉयकॉट' किया और फिर सचिनदेव बर्मन ने दोनों की सुलह कराई.

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
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लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar

सचिनदेव बर्मन का लता को पान देना

सचिनदेव बर्मन भी लता को बहुत पसंद करते थे. जब वो उनके गाने से खुश होते तो उनकी पीठ थपथपाते और उन्हें पान पेश करते. सचिनदा पान के बहुत शौकीन थे और उनके साथ एक पानदान चला करता था. लेकिन वो किसी को भी अपना पान नहीं देते थे. अगर वो किसी को पान दे दें तो समझिए कि वो आप से बहुत खुश हैं. लेकिन एक बार सचिन देवबर्मन और लता मंगेशकर के बीच लड़ाई हो गई.

हुआ ये कि 'मिस इंडिया' फ़िल्म में लता ने एक गाना गाया. बर्मन ने कहा कि वो चाहते हैं कि लता इसे 'सॉफ़्ट मूड' में गाएं. लता ने कहा मैं गा दूँगी. लेकिन अभी मैं थोड़ा व्यस्त हूँ. कुछ दिनों बाद बर्मन ने किसी को लता के पास रिकार्डिंग की तारीख़ तय करने के लिए भेजा.

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
FB @Lata Mangeshkar
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उस व्यक्ति ने सचिनदेव बर्मन से ये कहने की बजाए कि लता व्यस्त हैं, यह कह दिया कि लता ने ये गाना गाने से इनकार कर दिया. दादा नाराज़ हो गए और बोले कि वो लता के साथ फिर कभी काम नहीं करेंगे.

लता ने भी उन्हें फ़ोन कर कहा, "आपको ये एलान करने की ज़रूरत नहीं हैं. मैं खुद आपके साथ काम नहीं करूंगी."

कई सालों बाद दोनों के बीच ग़लतफ़हमी दूर हुई और फिर लता ने बंदिनी फ़िल्म में उनके लिए 'मोरा गोरा अंग लै ले' गाया.

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
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क्रिकेट का शौक

लता मंगेशकर क्रिकेट की बहुत शौकीन थीं. उन्होंने पहली बार 1946 में मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट मैच देखा था. उन्होंने एक बार इंग्लैंड में ओवल मैदान पर इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच भी एक टेस्ट मैच देखा था.

क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी डॉन ब्रेडमैन ने उन्हें अपना हस्ताक्षर किया हुआ चित्र भेंट किया था.

लता मंगेशकर के पास कारों का अच्छा कलेक्शन था. उन्होंने अपनी पहली कार सिलेटी रंग की हिलमेन ख़रीदी थी जिसके लिए उन्होंने उस ज़माने में 8000 रुपये ख़र्च किए थे.

उस ज़माने में उनको हर गाने के लिए 200 से 500 रुपये मिलते थे. 1964 में 'संगम' फ़िल्म से उनको हर गाने के लिए 2000 रुपये मिलने लगे थे. फिर उन्होंने हिलमेन बेच कर नीले रंग की 'शेवेरले' कार ख़रीदी थी.

जब लता ने यश चोपड़ा की फ़िल्म 'वीर ज़ारा' के लिए गाने गाए तो उन्होंने चोपड़ा द्वारा दिए गए पारिश्रमिक को ये कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि वो उनके भाई की तरह हैं. जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई तो यश चोपड़ा ने उन्हें उपहार के तौर पर एक मर्सिडीज़ कार भिजवा दी. अपने जीवन के अंतिम दिनों तक लता उसी कार पर चढ़ती रहीं.

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
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हीरे और जासूसी उपन्यास पसंद

लता मंगेशकर को हीरे और पन्नों का बहुत शौक था. अपनी कमाई से उन्होंने 1948 में 700 रुपयों में अपने लिए हीरे की अंगूठी बनवाई थी. वो उसे अपने बांए हाथ की तीसरी उंगली में पहना करती थीं.

उन्हें सोने से कभी प्यार नहीं रहा. हाँ वो सोने की पायल ज़रूर पहना करती थी. इसकी सलाह उन्हें मशहूर गीतकार नरेंद्र शर्मा ने दी थी. लता को जासूसी उपन्यास पढ़ने का भी बहुत शौक था और उनके पास शरलॉक होम्स की सभी किताबों का संग्रह था.

लता मंगेशकर को मिठाइयों में सबसे ज़्यादा जलेबी पसंद थी. एक ज़माने में उन्हें इंदौर का गुलाब जामुन और दही बड़ा भी बहुत भाते थे.

गोवन फ़िश करी और समुद्री झींगे की भी वो बहुत शौकीन थीं. वो सूजी का हलवा भी बहुत उम्दा बनाती थीं.

उनके हाथ का मटन पसंदा जिसने भी खाया था, वो उसे कभी नहीं भूल पाया. वो समोसे की भी शौकीन थीं, लेकिन आलू के नहीं, बल्कि कीमे के. कम लोग सोच सकते हैं कि लता मंगेशकर को गोलगप्पे बहुत पसंद थे. उन्हें नींबू का अचार और ज्वार की रोटी भी बहुत पसंद थी.

लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar
PTI
लता मंगेशकर, Lata Mangeshkar

2001 में भारत रत्न

आज भारत में लता मंगेशकर को पूजने की हद तक प्यार किया जाता है. बहुत से लोग उनकी आवाज़ को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार मानते हैं.

लता को फ़िल्मों के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से 1989 और भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से 2001 में सम्मानित किया जा चुका है.

लता मंगेशकर को सबसे बड़ा ट्रिब्यूट दिया था मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने. 'लता मंगेशकर' शीर्षक से लिखी नज़्म में उन्होंने लिखा था-

जहाँ रंग न ख़ुशबू है कोई

तेरे होठों से महक जाते हैं अफ़कार मेरे

मेरे लव्ज़ों को जो छू लेती है आवाज़ तेरी

सरहदें तोड़ कर उड़ जाते हैं अशआर मेरे.

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