मालदीव संकट: जब ऑपरेशन कैक्‍टस के लिए दाखिल हुईं भारतीय सेनाएं और रीगन ने भी थपथपाई पीठ

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नई दिल्‍ली, मालदीव इन दिनों संकट की स्थिति से गुजर रहा है और इन हालातों के बीच ही लोगों को 30 साल पहले हुई एक ऐसी घटना की याद आ गई है जिसने तत्‍तकालीन राष्‍ट्रपति रोनाल्‍ड रीगन को भारत के लिए तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया था। हम बात कर रहे हैं ऑपरेशन कैक्‍टस की जो नवंबर 1988 में उस समय लॉन्‍च हुआ जब मालदीव इसी तरह के हालातों का सामना करने को मजबूर था। उस समय मालदीव के राष्‍ट्रपति अब्‍दुल गयूम थे और उन्‍हें हटाने के लिए मालदीव के एक बिजनेसमैन अब्‍दुल्‍ला लथुफी ने श्रीलंकाई आतंकियों के साथ एक साजिश तैयार की। इस साजिश का आरोप श्रीलंका के पूर्व राष्‍ट्रपति मोहम्‍मद नसीर पर भी लगा। लथुफी मालदीव के बिजनेसमैन थे और श्रीलंका में रहकर अपने बिजनेस को अंजाम दे रहे थे। आइए आपको बताते हैं कि ऑपरेशन कैक्‍टस दरअसल क्‍या था और कैसे भारतीय सेनाओं ने इसे बहादुरी के साथ अंजाम दिया था। 

क्‍या था पूरा मसला

क्‍या था पूरा मसला

मालदीव में तीन नवंबर 1988 को श्रीलंकाई आतंकी संगठन पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (प्‍लोट) के आतंकी हथियारों के साथ मालदीव में दाखिल हुए। आतंकी टूरिस्‍ट्स बनकर मालदीव में दाखिल हुए और स्‍पीडबोट्स के जरिए यहां पहुंचे थे। लथुफी और नसीर की साजिश का ब्‍लूप्रिंट श्रीलंका में तैयार हुआ और इसे मालदीव में अंजाम दिया जाना था।

राजीव गांधी थे देश के पीएम

राजीव गांधी थे देश के पीएम

आतंकियों ने धीरे-धीरे राजधानी माले में स्थित सभी सरकारी बिल्डिंग्‍स को अपने कब्‍जे में ले लिया। यहां तक कि एयरपोर्ट, पोर्ट और टेलीविजन सेंटर तक आतंकियों के कब्‍जे में थे। आतंकियों का मकसद किसी तरह से राष्‍ट्रपति गयूम तक पहुंचना था। गयूम ने भारत समेत दुनिया के तमाम देशों के अलर्ट भेजा। उस समय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और उन्‍होंने कई घंटों तक चर्चा करने के बाद मालदीव की मदद करने का फैसला किया।

आगरा से रवाना पैराट्रूपर्स

आगरा से रवाना पैराट्रूपर्स

तीन नवंबर को ही आगरा स्थित इंडियन आर्मी की 17 पैराशूट रेजीमेंट के 300 जवानों को इंडियन एयरफोर्स के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट आईएल-76 की मदद से एयरलिफ्ट कर माले के लिए रवाना किया गया। गयूम की अपील के सिर्फ नौ घंटे के अंदर सेना माले के हुलहुले एयरपोर्ट में द‍ाखिल हो गईं। उस समय तक इस एयरपोर्ट पर आतंकियों का कब्‍जा नहीं हो पाया था। कुछ ही घंटों में पैराट्रूपर्स ने माले का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था।

आतंकियों का हौसला हुआ कमजोर

आतंकियों का हौसला हुआ कमजोर

आर्मी ने एयरपोर्ट को अपने कब्‍जे में ले लिया था तो वहीं एयरफोर्स के फाइटर जेट लगातार उड़ान भर रहे थे जिससे आतंकियों का हौसला टूट रहा था। दूसरी तरफ इंडियन नेवी की फ्रिगेट आईएनएस गोदावरी और बेतवा को भी इस ऑपरेशन में शामिल किया गया। उन्होंने माले और श्रीलंका के बीच उग्रवादियों की सप्लाई लाइन काट दी।

मरीन कमांडो ने संभाला मोर्चा

मरीन कमांडो ने संभाला मोर्चा

कुछ ही घंटों के अंदर इंडियन आर्मी ने माले से आतंकियों को खदेड़ना शुरू कर दिया। लेकिन जिस समय वह श्रीलंका की ओर भाग रहे थे उन्‍होंने एक शिप को हाइजैक कर लिया था जिसे यूएस नेवी ने इंटरसेप्ट किया और इंडियन नेवी को इस बारे में जानकारी दी। इसके बाद आईएनएस गोदावरी हरकत में आया और गोदावरी से एक हेलीकॉप्‍टर ने टेकऑफ किया और हाइजैक शिप पर मरीन कमांडो उतारे गए। कमांडो कार्रवाई में 19 लोग मारे गए जिनमें से ज्यादातर उग्रवादी थे। इस दौरान दो बंधकों की भी जान गई।

रीगन ने थपथपाई पीठ तो थैचर ने कहा थैंक गॉड

रीगन ने थपथपाई पीठ तो थैचर ने कहा थैंक गॉड

आजादी के बाद विदेशी धरती पर भारत का यह पहला सैन्य अभियान था जिसे पैराशूट रेजीमेंट के ब्रिगेडियर फारुख बुलसारा लीड कर रहे थे। दो दिन के भीतर पूरा अभियान खत्म हो गया। गय्यूम के तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो गई. संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों ने भारतीय कार्रवाई की तारीफ की। उस समय रोनाल्‍ड रीगन अमेरिका के राष्‍ट्रपति थे और उन्‍होंने इस ऑपरेशन के लिए भारत की पीठ थपथपाई। उन्‍होंने ऑपरेशन कैक्‍टस को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक अहम योगदान करार दिया। वहीं ब्रिटिश पीएम मारग्रेट थैचर ने इस पर टिप्‍पणी करते हुए कहा, 'थैंक गॉड फॉर इंडिया।' उन्‍होंने कहा कि भारत की वजह से गयूम की सरकार बच गई।

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English summary
30 years ago, in 1988, an intervention by the Indian armed forces which was codenamed 'Operation Cactus' trounced an attempted coup on the island nation.

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