जब लालू यादव की वजह से डॉ. कलाम देना चाहते थे राष्ट्रपति पद से इस्तीफा
नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में लालू यादव का उदय एक ध्रुव तारा की तरह हुआ था। कर्पूरी ठाकुर के बाद वे पिछड़े समुदाय के सबसे बड़े नेता बन कर उभरे। लेकिन स्वार्थ और मौकापरस्ती ने उन्हें अर्श से फर्श पर पटक दिया। लालू यादव ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी आघात किया। महान वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम जब राष्ट्रपति के पद पर थे तो उन्होंने लालू यादव और मनमोहन सिंह की कारगुजारियों से आहत हो कर इस्तीफा देने का फैसला कर लिया था। लेकिन मनमोहन सिंह के बहुत आरजू-मिन्नत के बाद उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया था।

क्या किया था लालू ने ?
फरवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। लालू यादव उस समय केन्द्र सरकार में रेल मंत्री थे। मनमोहन सिंह की सरकार लालू के समर्थन से चल रही थी। बिहार में चुनाव के बाद सत्ता की चाबी रामविलास पासवान के हाथ में थी। लालू यादव की करारी हार हुई थी। राजद को केवल 75 सीटें मिलीं थीं। जदयू को 55 और भाजपा को 37 सीटें मिलीं थीं। पासवान की पार्टी लोजपा को 29 सीटें मिलीं थीं। बहुमत के लिए 122 का आंकड़ा चाहिए था। पासवान न नीतीश को समर्थन दे रहे थे और न ही लालू को। पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री की शर्त रख दी जिसे कोई मानने के लिए तैयार नहीं था। बिहार में 15 साल से शासन कर रहे लालू यादव के हाथ से सत्ता फिसल रही थी। लालू यादव इस बात से डर गये कि कहीं नीतीश सीएम न बन जाएं। स्वार्थ में डूबे लालू ने मनमोहन सिंह की सरकार पर दबाव बनाया। उस समय बिहार में बूटा सिंह राज्यपाल थे। बूटा सिंह ने लालू का काम आसान कर दिया। बूटा सिंह की सिफारिश पर केन्द्र सरकार ने बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया और बिहार विधानसभा भंग कर दी गयी। इस तरह लालू ने गैरकानूनी तरीके से नीतीश के सीएम बनने का रास्ता रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में केन्द्र के इस फैसले को असंवैधानिक करार दिया था। लेकिन लालू का तिकड़म किसी काम का न रहा। अक्टूबर 2005 में बिहार विधान सभा का फिर चुनाव हुआ। नीतीश और भाजपा ने मिल पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। 15 साल बाद लालू सत्ता के सिंहासन से बेदखल हो गये। उस समय हंसराज भारद्वाज केन्द्र सरकार में कानून मंत्री थे। बाद में उन्होंने खुलासा किया था कि लालू के दबाव पर ही बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था।

राष्ट्रपति शासन लगाने के तरीके से दुखी थे डॉ. कलाम
जब ये राजनीतिक घटनाक्रम हुआ था इस समय महान वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति थे। जिस समय केन्द्र सरकार ने बिहार में प्रेसिडेंट रूल लगाने की सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेजी उस समय रात के एक बज रहे थे। राष्ट्रपति कलाम तब रूस की राजकीय यात्रा पर थे। लालू यादव यादव हड़बड़ी में थे। उनको लगता था कि कहीं पासवान नीतीश को समर्थन न दें। वे जल्द से जल्द बिहार विधानसभा भंग कराना चाहते थे ताकि नीतीश का रास्त बंद हो सके। उनको बिहार में राष्ट्रपति शासन लगवाने की इस लिए जल्दबाजी थी ताकि परोक्ष रूप से राज्य प्रशासन पर पकड़ बनी रहे। लालू यादव ने मनमोहन सिंह पर इतना दबाव बनाया कि उन्हें सक्रिय होना पड़ा। ऐसी आपाधापी में केन्द्र सरकार ने राष्ट्रपति के भारत लौटने का इंतजार भी नहीं किया। डॉ. कलाम के पास रात एक बजे केन्द्र सरकार का फैक्स पहुंचा। राष्ट्रपति केन्द्र की सिफारिश मानने के लिए बाध्य हैं। डॉ. कलाम ने मन मार कर राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिये।
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डॉ. कलाम ने इस्तीफा देने का फैसला लिया
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का व्यक्तित्व बहुत विराट था। वे गैर-राजनीतिक व्यक्ति थे। जीवन भर नियम कायदे को मानते रहे थे। उन्होंने बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रस्ताव पर दस्तखत तो कर दिये थे लेकिन उनकी अंतर्आत्मा धिक्कार रही थी। ड़ॉ. कलाम भारत लौटे तो अपने को असहज महसूस करने लगे। दिल के बोझ को हटाने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस मामले में बात की। मनमोहन सिंह भागे-भागे राष्ट्रपति भवन पहुंचे। वे डॉ. कलाम के फैसले से सहम गये थे। वे राष्ट्रपति को मनाने में जुट गये। मनमोहन सिंह ने कहा कि अगर आप इस्तीफा देंगे तो सरकार की फजीहत हो जाएगी। सरकार गिर भी सकती है। मनमोहन सिंह ने डॉ. कलाम से कहा कि अगर आप इस्तीफा देंगे भी तो किसे देंगे। उपराष्ट्रपति भैरौं सिंह शेखावत तो अभी देश से बाहर हैं। डॉ. कलाम स्वभाव से उदार और कृपालु थे। उन्होंने इस्तीफा देने का विचार त्याग दिया। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब टर्निंग प्वाइंट में इस वाकये का जिक्र किया है।
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