जब इंदिरा गांधी को ढांढस बंधाने उनके घर पहुंचे अटल बिहारी वाजपेयी
नई दिल्ली, 16 सितंबर। राजनीति में अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष में तालमेल रहे तो जनता को अधिक से आधिक लाभ मिल सकता है। इससे संसद का संचालन सुचारू हो जाएगा और जनहित में आसानी से कानून भी बन सकेगा। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद का मानना है कि दो विरोधी दलों के नेता आपस में अच्छे दोस्त बन सकते हैं। इस दोस्ती से बेहतर नतीजे निकल सकते हैं।

राजनीति में विरोध केवल मुद्दों का होता है। व्यक्ति का नहीं। व्यक्तिगत रिश्ते दलीय सीमाओं से परे होते हैं। उन्होंने इस बात की तस्दीक के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपने रिश्ते की कहानी बयां की। उन्होंने भाजपा नेता और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत की दरियादिली का भी जिक्र किया। राजनीतिक विरोध के बावजूद एक दूसरे के प्रति संवेदनशील होना, यही तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

राजनीति में विरोध का मतलब दुश्मनी नहीं
1977 में इंदिरा गांधी लोकसभा का चुनाव हार गयीं थीं। इमरजेंसी में हुए अत्याचार को लेकर उनके खिलाफ जनता में बेहद गुस्सा था। मोरारजी सरकार के कई मंत्री आपाताकाल में जेल की यंत्रणा भोग चुके थे। उनमें भी बहुत आक्रोश था। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इमरजेंसी में इंदिरा गांधी की तानाशाही झेली थी। लेकिन उनकी सोच बिल्कुल अलग थी। चुनाव हारने के बाद इंदिरा गांधी बहुत डरी-सहमी रहती थीं। जनाक्रोश देख कर उनके मन में डर बना रहता था कि अगर जनता सरकार के किसी नेता ने लोगों की भावनाएं भड़का दीं तो उनके साथ अनहोनी हो सकती है। भीड़ उन पर हमला कर के कहीं खून खराबा न कर दे। मोरारजी सरकार के बने कुछ ही दिन हुए थे। विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इंदिरा गांधी की मनोदशा के बारे में जानकारी हुई तो चिंतिति हो गये। वे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, किसी नेता से हमारा राजनीतिक विरोध हो सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमारा दुश्मन है। हमें बदले की भावना से राजनीति नहीं करनी चाहिए। इंदिरा गांधी डरी हुई हैं। उन्हें सरकार की तरफ से भरोसा दिया जाना चाहिए कि वे बिल्कुल सुरक्षित हैं। मोरारजी देसाई तब से इंदिरा गांधी के विरोधी थे जब वे कांग्रेस में थे। उन्होंने बाजपेयी जी को टालने की कोशिश की। लेकिन वाजपेयी जी ने अपनी बातों से मोरारजी देसाई को आखिरकार मना लिया।

जब इंदिरा गांधी के घर पहुंचे अटल बिहारी वाजपेयी
अटल बिहारी वाजपेयी, इंदिरा गांधी के घर पहुंचे। उन्होंने इंदिरा गांधी को भरोसा दिलाया कि जनता पार्टी का कोई भी नेता उनके या उनके परिवार के खिलाफ हिंसा भड़काने की कोशिश नहीं करेगा। उनके साथ उचित व्यवहार किया जाएगा और वे पूरी तरह सुरक्षित हैं। अटल बिहारी वाजपेयी खुद इस बात के लिए सतर्क रहे। उनके प्रभाव से जनता पार्टी के नेता भी कुछ दिनों तक चुप रहे। लेकिन गृह मंत्री चरण सिंह को इंदिरा गांधी से खास खुन्नस थी। चरण सिंह के समर्थक इंदिरा गांधी को सबक सिखाने का मौका खोजने लगे। जनता पार्टी सरकार हकीकत में कई दलों की सरकार थी। चरण सिंह का धड़ा (भालोद) इंदिरा गांधी के मामले में आक्रामक हो गया। एक हद के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के भी हाथ बंधे हुए थे। जनता सरकार ने संजय गांधी और इंदिरा गांधी को जेल भेज कर ही दम लिया। वाजपेयी जी की बात नहीं मानी गयी। लेकिन बाद में कांग्रेस के नेताओं ने वाजपेयी जी की इस उदारता के लिए उनकी तारीफ की थी।

अरुण जेटली और आनंद शर्मा की दोस्ती
इसी तरह भाजपा नेता अरुण जेटली भी विपक्ष में बहुत लोकप्रिय थे। जनवरी 2018 में संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तीन तलाक विधेयक पर जोरदार भाषण दिया। उन्होंने विपक्ष की तर्कों की धज्जियां उड़ा दीं और तथ्यों के साथ विधेयक का समर्थन किया। भोजनावकाश में जेटली सदन से निकल कर अपने चैम्बर में पहुंचे। कुछ देर बाद कांग्रेस के नेता आनंद शर्मा भी जेटली के चैम्बर में आये। उनके हाथ में जन्मदिन का केक था। आनंद शर्मा को देख कर जेटली तपाक से उठे। आनंद शर्मा ने मुस्कुराते हुए उन्हें अपने जन्मदिन का केक खिलाया। किसी को अहसास भी नहीं हुआ कि सदन में कुछ देर पहले ही दोनों के बीच तीखी बहस हो चुकी है। आनंद शर्मा और अरुण जेटली के बीच तब से दोस्ती थी जब वे अपनी-अपनी पार्टी के युवा नेता थे। भारत के युवा नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल एक बार रूस गया था । तब दोनों एक ही कमरे में ठहरे थे। दोनों अलग अलग दल से थे। लेकिन दोस्ती इस तरह जमी कि हमेशा के लिए कायम रही। शशि थरूर और कपिल सिब्बल की भी अरुण जेटली से कालेज के जमाने से दोस्ती रही थी। राजनीतिक कटुता के दौर में ऐसे दोस्ताने पर भला किसे नाज न होगा।












Click it and Unblock the Notifications