लॉकडाउन में एम्स के सामने बिना इलाज युवक ने तड़प कर दम तोड़ा, बाप बोला अब राख लेकर क्या करेंगे
नई दिल्ली। कोरोनावायरस के प्रकोप के चलते 25 मार्च को हुए लॉकडाउन के कारण देश की राजधानी दिल्ली के एम्स अस्पताल के बाहर देश के कोने-कोने से आए ऐसे सैकड़ों लोग असहाय स्थिति में फंसे हुए हैं वे यहां अपने परिजनों के साथ कैंसर, किडनी तथा हृदय संबंधी रोगों एवं ऐसी अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आए थे लेकिन उनको इलाज नहीं मिल पा रहा। ऐसे में न तो वो अपने घर वापस जा रहे हैं और न ही उनका इलाज हो रहा हैं।


कर्जा लेकर बिहार से दिल्ली बेटे के इलाज के लिए आए थे
दरअसल, राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा के कुछ दिन पहले उसके बूढ़े माता-पिता बिहार के बांका जिले से कर्जा लेकर अपने 30 वर्षीय संजीव दास को दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में दिखाने के लिए आए थे यहां उसे टर्मिनल स्टेज कैंसर का पता चला था। एम्स में आने से पहले से संजीव का इलाज नौ महीने तक चला था लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसकी हालत खराब हो रही थी। उसने खाना पूरी तरह से बंद कर दिया था। पिता ने बताया कि हमने डॉक्टरों से कहा कि वह उसका ऑपरेशन करे। लेकिन करीब 20 दिन पहले उन्होंने हमें बताया कि वह अपनी आखिरी सांस ले रहा था। ऑपरेशन का कोई मतलब नहीं था। उन्होंने हमसे कहा कि हम उन्हें घर वापस ले जाएं।इस लॉकडाउन से पहले हम ऐसा करने की कोशिश कर रहे थे।

लॉकडान के कारण बेटे ने फुटपाथ पर दम तोड़ा
इस लॉकडाउन से पहले हम ऐसा करने की कोशिश कर रहे थे। इसी बीच लॉकडाउन हो गया वो अपने बेटे के साथ मेट्रो के एक कोने में एक छोटे से स्थान पर रहने लगे। वे चाहते थे कि कि बेटे के अपने घर वापस ले जाए और बेटे के पास जितना आखिरी समय बचा हैं वो वहीं घर में साथ बिताए लेकिन लॉकडाउन के कारण बेटे ने फुटपाथ पर ही तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।

असहनीय दर्द से रात दिन चीखता रहता था संजीव
संजीव अपनी बीमारी के कारण पिछले कई दिनों से असहनीय दर्द के कारण दिन-रात चीखता रहता था और उसके असहाय मां-बाप उसे शरीर को सहलाते रहते थे। लेकिन कल रात अचानक से संजीव ने अचानक चीखना बंद कर दिया। पिता को लगा कि दर्द के कारण लगातार चीखने के कारण उकका बेटा थक चुका हैं शायद उसे नींद आ गई हैं। लेकिन पिता ने जब बेटे को हिलाडुला कर देखा तो उसकी मृत्यु हो चुकी थी।

घंटों बेटे केे लाश के साथ बैठी मां बिलखती रही
मुराद खुशवाहा नामक व्यक्ति जो अपनी पांच साल की कैंसर से पीडि़त बेटी के इलाज के लिए आए थे और राजस्थान के अलवर का बलराम दास है, जो अपनी आंखों का इलाज कराने के लिए अस्पताल आया था। उसने जाकर संजीव की मौत के बारे में सूचित करने के लिए पुलिस के पास चलने का फैसला किया। घंटों बेटे केे लाश के साथ बैठी उसकी मां बिलखती रही कोई नहीं जानता था कि उसे क्या करना है। इलाज के लिए आए बच्चें उस बिलखती मां को और संजीव की मौत को देख कर भयभीत हो रहे थे। आखिरकार अंत में शव को 11 बजे उठा लिया गया और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। डॉक्टरों ने उसके माता-पिता को बताया कि संजीव की आज सुबह लगभग 4 बजे मौत हो गई थी।

अब हम राख का लेकर क्या करेंगे
शुक्रवार को शाम लगभग 6 बजे, संजीव के माता-पिता 70 वर्षीय सरजू दास और 65 वर्षीय मीना देवी अपने बेटे का अंतिम संस्कार करने के बाद मेट्रो में लौट आए। उनके बगल में बैठे व्यक्ति ने सरजू जब उनसे पूछा कि उन्होंने अंतिम संस्कार कैसे किया। तो लाचार पिता जवाब दिया कि हमका कहीं दूर लै गइन और बिजली वाले शवदाह गृह में संजीव का जलाय दिहिन। उस व्यक्ति ने सरजू से पूछा कि क्या वह अपने बेटे की राख में मिली है जिस पर 70 वर्षीय सरजू दास बोले राख लेकर क्या करेंगे बाबू, हमारा ही कुछ पता नहीं हैं अब हमारा क्या होगा इसका कोई ठिकाना नहीं हैं। सरजू ने रोते हुए कहा भगवान ही अब हमारे भोजन, पानी, सबका इंतजाम करेंगे और वह अब हमारे लिए फैसला करेगा। अब हमें घर जाने की कोई भी जल्दी में नहीं हैं। लॉकडाउन को अब जब तक जी चाहे रखे, सरजू ने हाथ जोड़कर विनती की अब हमारी उन बड़े बाबुओं से प मेरे बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र देने के लिए कहें।

बेटे की मौत के बाद बेसहारा हो गए मां-बाप
सरजू एक चरवाहा है उसी से जीविकोपार्जन करता था उसका बेटा संजीव तम्बाकू बहुत खाता था जिसके कारण उसके बाएं गाल में एक ट्यूमर विकसित हो गया। सरजू और मीना उसे पटना में अस्पतालों में ले गए, फिर बेंगलुरु में एक में, और अंत में वे उसे दिल्ली के एम्स में ले आए। इस यात्रा के दौरान, संजीव की पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया और परिवार काफी वित्तीय तनाव में आ गया। लेकिन बुजुर्ग दंपति के दूसरा 20 वर्षीय बेटे पर जिस पर वो निर्भर थे वो भी मां-बाप को असहाय छोड़ कर चले गए।












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