कर्नाटक का किला जीतने के लिए क्या करेंगे अमित शाह?
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह दूसरी बार आठ दिनों के दौरे पर बेंगलुरु पहुंच गए हैं.
तीन महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में शाह पार्टी की चुनावी मशीनरी पर पैनी निगाह रख रहे हैं. जाहिर है, उनका मक़सद कर्नाटक से कांग्रेस की सत्ता को हटाना और सिद्धारमैया को हराना है.
शाह को पहले ही बेंगलुरु पहुंचना था लेकिन दिल्ली एयरपोर्ट पर छाए कोहरे और फ़्लाइट की देरी की वजह से उन्हें 31 दिसंबर की अपनी बैठक को टालना पड़ा. उन्होंने स्थानीय नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अब उनके केंद्रीय नेतृत्व की बात सुनने की बारी है न कि उन्हें नसीहतें देने की.
जैन यूनिवर्सिटी के प्रोवाइस चांसलर संदीप शास्त्री कहते हैं, "बहुत से लोग इसे अमित शाह स्कूल ऑफ़ इलेक्शन मैनेजमेंट कहते हैं जिसमें वो बड़ी ही बारीकी से चुनावी अभियान का नेतृत्व करते हैं. इतना ही नहीं वो चुनावी मुहिम पर पूरी नज़र रखते हैं और इसे आख़िरी पल तक इसे संचालित भी करते हैं."
स्थानीय नेतृत्व
प्रोफ़ेसर शास्त्री मानते हैं कि कर्नाटक नेतृत्व को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वो मतदाताओं या पार्टी के भीतर अपने लोगों में भरोसा कायम कर पाया है. उन्होंने कहा, "अमित शाह को इस बात का एहसास है कि कर्नाटक में सत्ता हासिल करने के लिए चुनाव की तैयारियों पर करीब से नज़र रखने की ज़रूरत है."
अमित शाह जब भी बेंगलुरु आते हैं, स्थानीय नेताओं में एक तरह की खलबली और बेचैनी देखने को मिलती है. वो इस तरह पेश आते हैं जैसे कोई ज़रूरी इम्तिहान देने जा रहे हों. अपने पिछले दौरे पर अमित शाह ने उन्हें सभी कांग्रेसी विधायकों के ख़िलाफ़ चार्जशीट तैयार करने को कहा था.
उन्होंने पार्टी सदस्यों से हर बूथ के लिए एक 'पन्ना प्रमुख' तय करने को भी कहा था. कर्नाटक बीजेपी के प्रवक्ता डॉक्टर वमन आचार्य कहते हैं, "पिछले साल जब अमित शाह अगस्त में यहां आए थे तो लोगों ने सोचा कि वो कोई जादू कर दिखाएंगे लेकिन उन्होंने कहा कि लोगों तक पहुंचने के लिए सिर्फ और सिर्फ कड़ी मेहनत की ज़रूरत है."
सांप्रदायिक तनाव की आग में झुलसने लगा है कर्नाटक?
येदियुरप्पा ने दलित के घर खाया होटल का खाना?
लिंगायत समुदाय
डॉक्टर वमन आचार्य का कहना है, "पिछली बार उन्होंने हमारी तैयारियों की समीक्षा ज़रूर की थी लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि हम उनके दौरे से घबराते हैं. हम उनके आने पर न पहले ही घबराते थे और न अभी घबराए हैं."
धारवाड़ यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर हरीश रामस्वामी का मानना है कि अमित शाह पार्टी कार्यकर्ताओं को ये बताने आते हैं कि सिद्धारमैया का सामना कैसे किया जाए. सिद्धारमैया राजनीति का भाषा में माहिर हैं और उनकी वजह से बीजेपी को डिफ़ेंसिव मोड में रहना पड़ता है.
प्रोफ़ेसर रामस्वामी कहते हैं कि बीजेपी कांग्रेस की विकास और गरीबों के हित में बनाई गई नीतियों का तोड़ नहीं ढूंढ पाई है. बीजेपी यहां न तो डीके शिव कुमार जैसे मंत्री के यहां आयकर विभाग के छापे जैसे गंभीर मसले को भुना पाई है और न ही लिंगायत समुदाय का वोटबैंक पाने के लिए कुछ कर पाई है. इसके पास दूसरा कोई मजबूत प्लान भी नहीं है.
हिन्दू धर्म से क्यों अलग होना चाहते हैं लिंगायत?
'सेक्युलर' शब्द को संविधान से हटा सकती है सरकार?
कर्नाटक में योगी
हालांकि बीजेपी नेतृत्व काफी पहले से दोतरफा रणनीति पर काम कर रहा है. एक तरफ बीएस येदियुरप्पा हैं जो 'परिवर्तन बस' में घूम-घूमकर सिर्फ विकास की बातें करते हैं तो दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ और अनंत कुमार हेगड़े जैसे नेता हैं जो हिंदुत्व का अजेंडा आगे ले जा रहे हैं.
कर्नाटक कांग्रेस के उपाध्यक्ष बीएल शंकर ने कहा, "हिंदुत्व का अजेंडा कर्नाटक के कुछ तटीय जिलों में ही चलता है. बाकी पूरे राज्य में जाति का मामला धर्म पर भारी पड़ता है. लोग विभाजनकारी ताकतों को पसंद नहीं करते."
शंकर मानते हैं कि कर्नाटक के लोग योगी आदित्यनाथ को 'हिंदू आइकन' के तौर पर तो बिल्कुल नहीं देखते. उन्होंने कहा, "अगर वो गोकशी की बात करेंगे तो लोग उनसे गोरखपुर के अस्पतालों में मरने वाले बच्चों पर सवाल ज़रूर पूछेंगे."
बीजेपी का रिकॉर्ड
डॉक्टर आचार्य कहते हैं, "कांग्रेस सरकार को ऐंटी-इनकम्बेंसी का सामना करना पड़ता है. ये समाज के सभी तबकों को साथ लेकर नहीं चल पाती. ये किसानों की मुश्किलें नहीं सुनती. राज्य में कानून-व्यवस्था बेहद खराब है. ख़ासकर तटीय इलाकों में जहां अब तक तकरीबन 28 हत्याएं हो चुकी हैं."
प्रोफ़ेसर शास्त्री के मुताबिक कांग्रेस स्थानीय अजेंडे से चिपकी हुई है और सारे मुद्दे सिद्धारमैया की तरफ़ धकेल रही है. यह शायद इसलिए है ताकि राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी जैसी स्थिति को टाला जा सके. वहीं, बीजेपी स्थानीय मुद्दों से घबराती है क्योंकि 2008-13 में बीजेपी का रिकॉर्ड राज्य में कुछ अच्छा नहीं था.
इस संदर्भ में सिद्धारमैया कर्नाटक के लिए अलग झंडे और बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी में अनाउंसमेंट न होने जैसे मुद्दों के साथ खेल रहे हैं. दूसरी तरफ़, बीजेपी केंद्र की तर्ज पर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर खेल रही है. संक्षेप में कहें तो हालात ऐसे हैं कि अमित शाह को कर्नाटक में जीत हासिल करने के लिए छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होगा.
मसलन, ये सुनिश्चित करना कि हर पार्टी कार्यकर्ता से संपर्क किया जाए और उन्हें लोगों से बात करने के लिए प्रेरित किया जाए. हालांकि एक तथ्य ये भी है कि कर्नाटक में 1985 में हर दूसरे टर्म में विपक्षी पार्टी सत्ता में आती रही है.
-
Gold Silver Rate Today: सोने चांदी में जबरदस्त गिरावट, गोल्ड 8000, सिल्वर 13,000 सस्ता, अब ये है लेटेस्ट रेट -
Silver Rate Today: चांदी में हाहाकार! 13,606 रुपये की भारी गिरावट, 100 ग्राम से 1 किलो की कीमत जान लीजिए -
Silver Rate Today: चांदी भरभरा कर धड़ाम! ₹10,500 हुई सस्ती, 100 ग्राम के भाव ने तोड़ा रिकॉर्ड, ये है रेट -
'Monalisa को दीदी बोलता था और फिर जो किया', शादी के 13 दिन बाद चाचा का शॉकिंग खुलासा, बताया मुस्लिम पति का सच -
Gold Rate Today: सोने के दामों में भारी गिरावट,₹10,000 गिरे दाम, दिल्ली से पटना तक ये है 22k से 18k के भाव -
Ravindra Kaushik Wife: भारत का वो जासूस, जिसने PAK सेना के अफसर की बेटी से लड़ाया इश्क, Viral फोटो का सच क्या? -
Gold Rate Today: ईरान जंग के बीच धराशायी हुआ सोना! 13,000 सस्ता, 18K और 22k गोल्ड की ये है कीमत -
Mumbai Gold Silver Rate Today: सोने-चांदी की कीमतों में जारी है गिरावट, कहां पहुंचा रेट? -
Bengaluru Metro Pink Line: मेट्रो पिंक लाइन का शुरू हो रहा ट्रायल, जानें रूट और कब यात्री कर सकेंगे सवारी? -
Iran Vs America: ईरान की 'सीक्रेट मिसाइल' या सत्ता जाने का डर, अचानक ट्रंप ने क्यों किया सरेंडर -
15289 करोड़ रुपये में बिक गई राजस्थान रॉयल्स, कौन हैं खरीदने वाले काल सोमानी, IPL से पहले मचा तहलका -
US Iran War: 5 दिन के सीजफायर की बात, 10 मिनट में Trump का पोस्ट गायब! ईरान ने कहा- 'हमारे डर से लिया फैसला’












Click it and Unblock the Notifications