उत्तर प्रदेश चुनाव: किसी के लिए 'डर' का तो किसी के लिए 'तगड़ा' है माहौल

"राष्ट्रवाद और विकासवाद के नाम पर एक खास समुदाय को टारगेट किया जा रहा है, ऐसा माहौल है कि विश्वविद्यालय की कैन्टीन में हिंदू और मुसलमान स्टूडेन्ट्स साथ बैठकर खाना खाने में संकोच कर रहे हैं."

ये राय थी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे वैभव कुमार सिंह की. पर ये उनकी अकेली राय नहीं थी.

सरकार के विकास कार्यक्रमों की, गांवों में बढ़ी बिजली सप्लाई की तारीफ़ करनेवाले कई थे, पर आलोचना भी काफ़ी हुई.

बढ़ते एनकाउन्टर, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और महिला असुरक्षा के अलावा 'मज़हब के नाम पर नफ़रत' के माहौल पर लंबी बात हुई.

छात्रों की इसी बेबाकी की वजह से उन्हें मिलना आसान नहीं था. संस्थागत स्तर पर बहुत ज़्यादा झिझक मिली. ना बोलने या नापतौल कर बोलने का कोई सरकारी फ़रमान नहीं था, पर एक समझ कई जगह दिखी.

लखनऊ के दो सरकारी विश्वविद्यालयों ने ये कह कर छात्रों के साथ बातचीत के आयोजन के लिए स्वीकृति नहीं दी कि वो नहीं चाहते कैम्पस में कोई सरकार विरोधी बातें हो.

एक निजी विश्वविद्यालय ने वैसे ही अनौपचारिक तरीक़े से हमें कहा कि उन्हें डर है कि सत्ता पर आसीन नेताओं के ख़िलाफ़ कोई बात कही गई तो उनका रेजिस्ट्रेशन ही रद्द ना कर दिया जाए.

चुनाव से पहले के माहौल को समझने के लिए मैं उत्तर प्रदेश के बड़े विश्वविद्यालयों वाले शहर, अलीगढ़, लखनऊ, प्रयागराज और बनारस में वहां पढ़नेवाले, पहली या दूसरी बार किसी चुनाव में वोट देनेवाले लड़के-लड़कियों से मिल रही थी.

माहौल. जो स्कूल, अस्पताल, सड़क जैसे विकास के मानक या महंगाई और बेरोज़गारी जैसी परेशानियों से प्रभावित होता है, पर इससे भी आगे एक राजनीतिक, सामाजिक परिवेश में महसूस होता है.

अलीगढ़

खन्सा सिद्दीका
BBC
खन्सा सिद्दीका

"हमारा हिजाब और बुर्क़ा इतनी बड़ी चीज़ हो गई है कि वो हमें देखते हैं तो मानो हमें टेररिस्ट समझते हों और ऐसी सोच बन गई है जैसे कि हिजाब करने वाले सिर्फ उर्दू की समझ रखते हैं. जबकि ऐसा तो नहीं है, हम अपने पहनावे के साथ इंजीनियरिंग भी कर सकते हैं, फ़ील्डवर्क भी, सोशल भी हो सकते हैं."

खन्सा सिद्दीक़ा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मास्टर्स की पढ़ाई कर रही हैं पर अब नौकरी की जगह शादी होनेवाली है.

वो बाहर निकलती हैं तो बुर्क़ा पहनती हैं. उन्होंने बताया कि इस माहौल में अपने हिजाब के साथ काम करने की शर्त का मतलब है कि अवसर बहुत कम हो जाते हैं.

मुस्लिम और महिला. यानी अल्पसंख्यक में भी अल्पसंख्यक. खन्सा ने कहा कि उनके लिए कब, क्या और कितने शब्दों में बोलना है, ये तौलना और ज़रूरी हो गया था.

आइशा रज़ी
BBC
आइशा रज़ी

"स्टूडेंट्स बहुत सतर्क हो गए हैं, चार लोगों के बीच में बातचीत हो या सोशल मीडिया पर कोई छोटा-मोटा पोस्ट, डर रहता है कि कहीं जेल हो जाएगी, यूएपीए लगा दिया जाएगा."

डॉक्टरी की पढ़ाई के बाद इंटर्नशिप कर रही आइशा रज़ी बुर्का नहीं पहनतीं, दुपट्टे से सर ढक कर हिजाब करती हैं. वो बोलीं काम करने के लिए उन्हें यही व्यावहारिक लगता है.

उनसे माहौल के बारे में पूछा तो उन्होंने भी डर का ज़िक़्र किया, बोलने की आज़ादी ना होने का - मुसलमान होने की वजह से नहीं, सरकार की आलोचना करने पर प्रतिक्रिया का डर.

इसी महीने राज्य सभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक लिखित जवाब में बताया कि देश में यूएपीए क़ानून के तहत साल 2020 में 1,321 गिरफ़्तारियां हुईं जिनमें से सबसे ज़्यादा, 361, उत्तर प्रदेश में हुई हैं.

उन्होंने ये भी कहा कि, "कानून में उपयुक्त संवैधानिक, संस्थागत और स्टैट्यूटरी प्रावधान हैं जो सुनिश्चित करते हैं कि इसका ग़लत इस्तेमाल ना हो."

हालांकि मानवाधिकारों पर काम कर रहे ऐक्टिविस्ट्स आरोप लगाते रहे हैं कि ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) क़ानून यानी 'यूएपीए' का इस्तेमाल सरकार के ख़िलाफ़ विरोध की आवाज़ें शांत करने के लिए होता रहा है.

प्रयागराज

"वर्तमान की सरकार नहीं चाहती कि छात्र संघ बने और उनकी नीतियों का विरोध करे. इतिहास में हमेशा संघ ने विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकारों से सवाल किए हैं, जवाबदेही मांगी है, मुद्दे उठाए हैं."

समाजवादी छात्र सभा के अजय यादव सम्राट इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के बहाल किए जाने के आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं. आख़िरी बार यहां छात्र संघ के चुनाव साल 2018 में हुए थे.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ में बीजेपी का नहीं सपा समर्थित सदस्यों का वर्चस्व रहा है.

अजय और प्रदर्शन पर बैठे छात्रों का दावा है कि छात्र संघ की गैर-मौजूदगी के माहौल में उनके द्वारा कोई भी मुद्दा उठाने पर और विरोध करने पर प्रशासन उनके निलंबन और गिरफ्तारी जैसे कदम उठाता रहा है.

मौजूदा मुद्दों में लाइब्रेरी में उप्लब्ध किताबें, साफ पेयजल, हॉस्टल फीस कम करना, मेस में खाने का स्तर बेहतर करना शामिल है.

ये विरोध प्रदर्शन करीब डेढ़ साल से विश्वविद्यालय में छात्र संघ के बंद दफ्तर के सामने ठीकठाक पुलिस बंदोबस्त के बगल में चल रहा है.

ऐतिहासिक तौर पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ की अहम भूमिका रही है. तीन प्रधानमंत्री, गुलज़ारीलाल नंदा, वी पी सिंह, चन्द्रशेखर और एक राष्ट्रपति, शंकर दयाल शर्मा, के राजनीतिक सफर की शुरुआत इसी संघ से हुई थी.

लेकिन देश भर में छात्र राजनीति में पैसे और बल प्रयोग के बढ़ने के हवाले से लिंगडोह कमेटी ने साल 2005 में सिफारिशें दीं जिसके बाद 2005-2012 तक यहां चुनाव नहीं हुए.

2012 से 2018 तक लगातार चुनाव हुए पर साल 2019 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने 96 साल पुराने छात्र संघ को खत्म कर कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप छात्र परिषद बनाने का आदेश दिया. लेकिन छात्रों के विरोध के चलते परिषद का गठन नहीं हो सका है.

लखनऊ

कीर्ति सिंह
BBC
कीर्ति सिंह

"पहले की सरकारों में, अखिलेश या मायावती के वक्त में, कभी एससी-एसटी पर, कभी ओबीसी पर फोकस कर रहे थे. पर योगी जी ने सबको ध्यान में रखकर किया है, जो भी किया है. जेनरल कैटेगरी के लिए अब बहुत अच्छा हो रहा है."

कीर्ति सिंह की बी.ए. की पढ़ाई पूरी होने वाली है. वो बोलीं की अब तक सब बहुत अच्छा रहा है, आज़ाद तरीके से ज़िंदगी अच्छी चल रही है.

कीर्ति के मुताबिक पहले से अलग, मौजूदा सरकार में अल्पसंख्यकों का ध्यान रखने में हिंदू हित को पीछे नहीं किया जा रहा और इसलिए हिंदू खुश हैं.

ये काशी कॉरिडोर के उद्घाटन से ठीक पहले के दिन थे, प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में हर तरफ सौंदर्यीकरण के लिए पुताई का काम चल रहा था.

'स्मार्ट सिटी' बनाने के लिए चुने गए बनारस की चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर और साफ-सफाई देखते बनती थी.

एक छात्र ने कहा कि, "माहौल बनारसी तरीके से सोचो तो तगड़े से बनाकर रखे हैं." लेकिन सबकी सोच एक सी नहीं थी.

श्रुति राय
BBC
श्रुति राय

"इस सरकार में विकास हुआ है पर हर चीज़ में धर्म को ले आते हैं, कम्युनल पॉलिटिक्स को रोकना चाहिए और सिर्फ काम पर फोकस करना चाहिए."

बीएचयू से ग्रैजुएशन के बाद जेएनयू में मास्टर्स के लिए एडमीशन ले चुकीं श्रुति राय ने कहा नेता धर्म का इस्तेमाल करने लगे हैं.

पूजा, आरती और कर्म-कांड समेत कई धार्मिक आयोजनों का केंद्र, बनारस के घाटों का भी विकास हो रहा है.

करोड़ों रुपए की लागत से संत रविदास घाट को दशश्वमेध घाट से जोड़ने का रास्ता बन रहा है.

रविदास घाट पर मल्लाहों और गोताखोरों के बच्चों के साथ काम करनेवाले एक युवा वॉलनटीयर ने बताया कि कुछ मूलभूत सुविधाएं अभी भी नहीं हैं, जैसे गंगा स्नान के बाद औरतों के कपड़े बदलने की जगह.

उन्होंने ये बात हाल ही में उठाई भी लेकिन बहुत नाराज़गी हुई. कई लोगों ने आकर खरी-खोटी सुनाई.

मुझसे बोले, "माहौल ठीक नहीं है, अब मैं चुप ही रहता हूं, मेरी आलोचना पता नहीं किसके कान में पड़ जाए और फिर कहीं मुझ पर कोई केस ना हो जाए."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+