नौकरीपेशा लोगों को वर्ल्ड बैंक की इस रिपोर्ट से क्या डरना चाहिए?

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क्या मंदी की आहटें तेज हो गई हैं? पिछले कुछ वक्त से मंदी को लेकर जो आशंकाएं जताई जा रही थीं, वो अब ठोस शक्ल लेती दिख रही हैं.

वर्ल्ड इकोनॉमी के मंदी से घिरने की भविष्यवाणी करने वाले दिग्गज अर्थशास्त्रियों की लिस्ट लंबी होती जा रही है और अब वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट सिहरन पैदा कर रही है.

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के केंद्रीय बैंक जिस तेजी से ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं उससे 2023 में ग्लोबल अर्थव्यवस्था मंदी की शिकार हो सकती है.

मंदी के डर ने नौकरीपेशा लोगों में और ज्यादा खौफ़ भर दिया है क्योंकि उनके दिलोदिमाग से अभी तक कोविड के दौर की छंटनी की यादें मिटी नहीं हैं.

आर्थिक पैकेज के नाम पर बेतहाशा खर्च, चीन में कोविड प्रतिबंधों से सप्लाई चेन को पहुंचे नुकसान और यूक्रेन पर रूस के हमलों ने पेट्रोल-डीजल और खाद्यान्न की बढ़ी कीमतों को दशकों के शिखर पर पहुंच दिया है.

लिहाजा अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व से लेकर, बैंक ऑफ इंग्लैंड, जापानी केंद्रीय बैंक ने महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाने की तैयारी कर ली है. चीन के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरें बढ़ाने की तैयारी तो नहीं की है लेकिन उसने ब्याज दरों में कटौती रोक दी है.

ब्याज दरों को बढ़ाने से कंपनियों और आम उपभोक्ता दोनों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है. लिहाजा कंपनियां अपना विस्तार रोक देती हैं और आम उपभोक्ता खर्च कम करने लगता है. इससे डिमांड घटने लगती है और आर्थिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं.

इससे अर्थव्यवस्था के मंदी में फंसने खतरा बढ़ जाता है. आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती की सबसे बड़ी और फौरी मार पड़ती है नौकरियों पर.

नौकरीपेशा लोगों का डर क्या है?

ग्लोबल अर्थव्यवस्था फिलहाल ऐसे ही हालात की ओर बढ़ रही है. लिहाजा मंदी की मार से नौकरियां जाने की आशंकाओं ने नौकरीपेशा लोगों को डरा दिया है.

पिछले सप्ताह वर्ल्ड बैंक ने एक रिपोर्ट जारी की है उसके मुताबिक ग्लोबल इकोनॉमी में रिकवरी के बाद की सबसे बड़ी गिरावट देखी जा रही है. यह 1970 के बाद इस तरह की सबसे गिरावट है.

रिपोर्ट में एक अध्ययन के हवाले से बताया है कि दुनिया की तीन बड़ी इकोनॉमी-अमेरिका, चीन और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से गिरावट देखी जा रही है.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है इन हालातों में ग्लोबल इकोनॉमी पर पड़ी हल्की सी चोट भी इसे मंदी की गिरफ्त में धकेल सकती है.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की दिग्गज डिलीवरी कंपनी फेडएक्स ने निवेशकों से कहा है कि उसकी पैकेज डिलीवरी में भारी कमी आ सकती है. एशिया और यूरोप में हालात ज्यादा ख़राब होने का अंदेशा है. इससे उसके बिज़नेस ऑपरेशन पर काफी असर होगा.

कंपनी को करोड़ों डॉलर के घाटे की आशंका ने बृहस्पतिवार को इसके शेयरों को 20 फीसदी तक गिरा दिया. सिर्फ फेडएक्स ही नहीं बल्कि अमेजन, डोएचे पोस्ट और रॉयल मेल जैसी डिलीवरी कंपनियों के शेयर भी गिर गए.

फेडएक्स ने कहा है कि डिमांड में कमी की वजह से कंपनी अपनी सर्विस में कटौती कर सकती है. वो अपने दर्जनों दफ्तर बंद करने की योजना बना रही है. इससे इसके सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरियों पर तलवार लटक गई है.

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नौकरियों पर लटकी तलवार

यही वो डर है,जो इस वक्त दुनिया भर के नौकरीपेशा लोगों को सता रहा है. आईएलओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड के पहले साल दुनिया भर में 25 करोड़ से ज्यादा फुल टाइम जॉब खत्म हो गए थे.

ग्लोबल इकोनॉमी में इस वक्त जो हालात हैं, उनमें एक बार फिर नौकरियों पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं. पिछले महीने प्राइसवाटर्सहाउसकूपर्स (पीडब्ल्यूसी) की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर की 50 फीसदी कंपनियां छंटनी की तैयारी कर रही है.

पीडब्ल्यूसी के सर्वे में शामिल आधे से अधिक कंपनियों ने कहा कि वे अपने कर्मचारियों की संख्या घटाने जा रही हैं. 46 फीसदी कंपनियां साइनिंग बोनस खत्म कर रही हैं या घटा रही हैं. 44 फीसदी कंपनियां नौकरियों के ऑफर वापस ले रही हैं.

इस साल जुलाई तक अमेरिका में 32 हजार टेक. वर्करों की नौकरियां खत्म हो गई थीं. जिन कंपनियों के कर्मचारियों की नौकरियां गईं उनमें माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी दिग्गज टेक कंपनियां शामिल हैं. आने वाले दिनों में और बड़ी तादाद में टेक वर्करों की नौकरियां जा सकती हैं.

भारत में पिछले छह महीनों में स्टार्ट-अपकंपनियों 11 हजार कर्मचारियों की छंटनी की है. हालात ज्यादा खराब हुए तो साल के अंत तक यह तादाद 60 हजार तक पहुंच सकती है. छंटनी करने वालों में ई-कॉमर्स कंपनियां सबसे आगे हैं. इसके बाद एडटेक स्टार्ट-अप का नंबर है.

अगले साल जिस ग्लोबल आर्थिक मंदी की आशंका जताई जा रही है, वो भारत में रोज़गार का कितना बड़ा संकट खड़ा कर सकती है?

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मंदी को लेकर चिंता

  • वर्ल्ड बैंक ने 2023 में आर्थिक मंदी की आशंका जताई है
  • महंगाई घटाने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं
  • लेकिन इससे आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ सकती है
  • आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार कम होने से मंदी का खतरा
  • मंदी से दुनिया भर में नौकरियां घटने का खतरा बढ़ गया
  • एक रिपोर्ट के मुताबिक 50 फीसदी कंपनियां छंटनी करेंगीं
  • भारत में घटेंगी नौकरियां, एक्सपोर्ट से जुड़े सेक्टर पर असर
  • मंदी का ज्यादा असर पश्चिमी देशों पर पड़ सकता है
  • भारत में आर्थिक रिकवरी की रफ्तार होगी कम
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क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

जाने-माने अर्थशास्त्री और इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में मैलकॉम आदिशेषाय चेयर प्रोफेसर अरुण कुमार बीबीसी से कहते हैं,'' फेडरल रिजर्व ने जिस तरह से कहा कि है कि वह ब्याज दरें बढ़ाएगा क्योंकि महंगाई नियंत्रण उसका सबसे प्रमुख काम है, उससे लगता है कि मंदी आना तय है. अमेरिका टेक्निकल मंदी में पहले से ही है. ब्रिटेन में भी अर्थव्यवस्था में गिरावट है. यूरोप में रूस-यूक्रेन के युद्ध का असर से मंदी जैसे आसार दिख रहे हैं.''

प्रोफेसर कुमार आगे कहते हैं, '' जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है, उसमें ब्याज दरें बढ़ा कर डिमांड कम करने की कोशिश की जा रही है. जब डिमांड कम हो जाती है तो ग्रोथ भी कम हो जाती है. ऐसे में मंदी आना तय है. ''

दुनिया भर में इस मंदी का रोजगार पर असर होगा और भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता है. लेकिन भारत में इसका असर किस हद तक हो सकता है.

प्रोफेसर कुमार कहते हैं, '' भारत में नौकरी करने वाले सिर्फ छह फीसदी लोग संगठित क्षेत्र में काम करते हैं. अर्थव्यवस्था में सुस्ती का असर अभी तक इस क्षेत्र के लोगों को उतना नहीं पड़ा है. सिर्फ कॉन्ट्रेक्ट सर्विस वाले लोग प्रभावित हुए हैं. लेकिन आने वाली मंदी का असर उन पर भी पड़ेगा. ''

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भारत में किस सेक्टर के रोज़गार पर मंदी का असर?

प्रोफेसर कुमार का कहना है,''अमेरिका और यूरोप में मंदी आई तो हमारा एक्सपोर्ट कम हो जाएगा. इससे टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वैलरी,पेट्रोलियम प्रोडक्ट,फार्मा,ऑटो जैसे भारत के पारंपरिक निर्यात आइटमों से जुड़ी इंडस्ट्री में नौकरियां कम हो सकती हैं.

मंदी आने से विदेशी और घरेलू पर्यटकों में भी कमी आएगी और इससे टूरिज्म और होटल इंडस्ट्री में नौकरियां कम हो सकती हैं. इसमें संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र के कर्मचारी काम करते हैं. प्रोफेसर कुमार का कहना है कि इससे देश में बेरोज़गारी की स्थिति और ख़राब होगी.

विशेषज्ञों के मुताबिक कोविड के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में रिकवरी शुरू हो गई है. लेकिन मंदी आई तो रिकवरी की रफ़्तार धीमी हो जाएगी और इसका असर देश में रोजगार बढ़ाने की कोशिश पर पड़ेगा.

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आर्थिक रिकवरी का क्या होगा ?

इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के प्रोफेसर प्रभाकर साहू का कहना है,''कोविड के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में रिकवरी की जो रफ्तार दिखी थी वो अब कम हो गई है. पहले मौजूदा वित्त वर्ष में आठ फीसदी की ग्रोथ की उम्मीद लगाई जा रही थी. लेकिन ताजा अनुमानों के मुताबिक अब यह सात फीसदी की दर से बढ़ेगी''

बीबीसी से बातचीत में साहू कहते हैं, '' महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने का असर क्रेडिट फ्लो, निवेश और पूरी रिकवरी प्रोसेस पर पड़ेगा. यानी यह धीमी हो जाएगी.

साहू भी भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले अहम सेक्टर निर्यात की बात करते हैं. भारत का कुल निर्यात लगभग 700 अरब डॉलर का है. ऐसे में ग्लोबल मंदी आती है तो एक्सपोर्ट सेक्टर से जुड़े रोजगार घटेंगे. एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग के ग्रोथ पर असर पड़ेगा.

याद रहे कि ये सेक्टर 43 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है. लिहाजा मंदी आती है तो ये सेक्टर पर काफी ज्यादा असर होगा.

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मंदी की आहट कितनी पुख्ता?

अगर मंदी आती है तो कौन सबसे ज्यादा प्रभावित होगा. पश्चिमी या भारत जैसे विकासशील देश?

प्रभाकर साहू कहते हैं,'' इससे पश्चिमी देश ज्यादा प्रभावित होंगे जो अपने सिस्टम में लिक्वडिटी को सोखने में लगे हैं. भारत जैसे विकासशील देश पर इसका असर कम होगा. भारत में इसका असर इसलिए कम होगा कि ये लगातार बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और इसमें डिमांड अभी भी काफी ज्यादा है. भारत के फंडामेंटल भी मजबूत हैं. लिहाजा यहां पश्चिमी देशों के मुकाबले मंदी का असर कम होगा. ''

अब बड़ा सवाल है वर्ल्ड बैंक जिस ग्लोबल मंदी की आशंका जता रहा है उसकी आहट कितनी पुख्ता है.

दरअसल पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ती महंगाई मंदी का रास्ता तैयार करने में लगी है. अमेरिका और यूरोप में ये पिछले चार दशक के शीर्ष पर पहुंच चुकी हैं. भारत में ये रिज़र्व बैंक के स्वीकार्य स्तर से ऊपर चल रही है.

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घातक नतीजों का अंदेशा

कोविड के बाद मांग बढ़ने और यूक्रेन-रूस युद्ध से एनर्जी, ईंधन और खाद्य पदार्थों के बढ़ते दाम ने महंगाई को नई हवा दे दी है. ये बढ़ती महंगाई ज्यादातर अर्थव्यवस्थाओं की गले की फांस बन गई है और दुनिया भर के केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ा कर इसे कम करने की कोशिश में लगे हैं.

अगर केंद्रीय बैंकों ब्याज दरें बढ़ाईं तो आर्थिक गतिविधियां का धीमा होना तय है. इससे मंदी का खतरा बढ़ जाएगा.

पिछली ग्लोबल मंदी 2008 में इनवेस्टमेंट बैंक लेहमैन ब्रदर्स के डूबने से शुरू हुई थी और लगभग दो साल तक इसका असर रहा था. यह अमेरिकी बाजार के सब-प्राइम क्राइसिस का नतीजा थी.

लेकिन दुनिया की अर्थव्यवस्था दोबारा मंदी की शिकार हुई तो यह बेहद घातक साबित होगी क्योंकि कोविड के बाद आर्थिक रिकवरी अभी भी पूरी रफ्तार नहीं पकड़ पाई है. ये पहले से ज्यादा उथलपुथल मचाएगी.

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