...ऐसा हो उम्मीदवार तभी देंगे वोट

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बंगलुरु। लोकतंत्र के इस आधुनिक दौर में जनता अपने जन-प्रतिनिधि चुनने के लिए कमर कस चुकी है। इंटरनेट की नई दुनिया में विभिन्न उम्र, वर्ग, समुदाय के लोग राजनीति पर ना सिर्फ विचार-विमर्श कर रहे हैं, बल्कि वे खुलकर अपनी राय भी रख रहे हैं। इसी मुहिम में जब वन इंडिया टीम ने लोगों से आगामी सरकार की दिशा-दशा व जन-उम्मीदों पर बात की तो देश के वोटरों ने नई सरकार से अपनी उम्मीदें साझा कीं। तकनीकि विज्ञान से स्नातक आगरा के मोहित शर्मा ने एक शब्द में कहा 'नौकरी'।

आंकड़ों व परिस्थितियों से साफ ज़ाहिर है कि देश में बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है, जिससे युवाओं में जबर्दस्त असंतोष है। कुछ ऐसा ही जवाब मीडिया स्टूडेंट नई दिल्ली के विवेक पाण्डेय ने दिया। विवेक ने मौजूदा सरकार को दोषी ठहराते हुए कहा कि ''देश में काबिल युवाओं को भी नौकरी के लिए भटकना पड़ रहा है। उद्योग व काॅर्पोरेट जगत की नाकाफी नीतियों की वजह से ही आज युवाओं का बड़ा तबका बेहतर रोजगार से दूर है।''

लोकसभा चुनावों का जिम कैरी अरविंद केजरीवाल

अगला बड़ा मुद्दा जातिगत व सांप्रदायिक सियासत को लेकर सामने आया है। तमाम लोगों ने सांप्रदायिक व जाति आधारित राजनीति को देश के विकास के लिए घातक बताया। राजनीति में सक्रिय इटावा के अतुल मिश्रा ने देश की सभी प्रमुख पार्टियों पर निशाना साधते हुए कहा कि ''सारे राजनैतिक दल आज अपने हित के लिए जनता का सहारा ले रहे हैं, कहीं भी देशहित की भावना के साथ राजनीति नहीं हो रही है।'' कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक कर हरे मोतिहारी, बिहार के छात्र अरविन्द ने मौजूदा राजनीति को जातिगत भावनाओं से प्रेरित बताया। अरविन्द ने कहा कि ''जाति-आधारित राजनीति का परिणाम अंत में भोली-भाली जनता को भुगतना पड़ता है।

इन्हीं उम्मीदों में एक मुद्दा महंगाई को लेकर भी उछला। आम जनजीवन में महंगाई जिस तरह हावी है, उससे जनता खुद को बेबस-लाचार महसूस कर रही है। ग्रहिणी शैलजा पाठक ने बताया कि ''आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपइया' वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। घर का बजट संभालना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।'' इसी कड़ी में होम्योपैथी चिकित्सक डाॅ. आशीष दीक्षित ने नई सरकार से महंगाई को काबू में करने की उम्मीद की है। आशीष ने बताया कि ''आम ज़रूरतों की चीजें बेहद महंगी होने के कारण जनता तंग आ चुकी है। पेट्रोल, डीजल व अन्य खाद्य पदार्थों की महंगाई से भी लोग छुटकारा पाने को बेताब हैं।'' पत्रकारिता की छात्रा दीपाली पोरवाल ने कुछ इस तरह महंगाई का दर्द बयां किया कि '' अब तो मम्मी से किसी चीज़ के लिए रुपए मांगने पर जवाब मिलता है कि घर चलाने का खर्च इतना ज्यादा है और तुम्हारी हर दिन नई-नई ख्वाहिशें बनी रहती हैं।''

वादों से ज्यादा इरादों पर रहेगी नजर

'विकास' भी अहम उम्मीद के तौर पर उभर कर आया है। मौजूदा कमजोर विकास दर इस बात का प्रमाण है कि पिछली व मौजूदा सरकारें विकास के नाम पर सिर्फ कमजोरियों के कारण ही गिनाती रहीं। विकास व अन्य ज़रूरी मुद्दों की जनता से दूरी पर कभी विपक्ष को जि़म्मेदार ठहरा दिया गया, तो कभी संसद-सत्र में अपर्याप्त वार्ता को कारण में गिना दिया गया। ऐसी ही कमजोरियों पर छात्र जीतू दुबे ने अपनी राय रखी कि ''देश को आज विकास की सबसे ज्यादा जरूरत है। विकास में आने वाली समस्याओं की एक कड़ी भ्रष्टाचार से जुड़ती है, जिसने कीड़े की तरह देश की तरक्की को निगल लिया है।''

एक निजी कंपनी में कार्यरत चंदन मिश्रा ने देश के विकास पर खासा ज़ोर देते हुए कहा कि ''आज जब हम दूसरे देशों के सिस्टम पर बहस करते हैं, तो भूल जाते हैं कि वहां की सियासत विकास को प्राथमिक मुुद्दा मानकर चलती है।''

इसी मुहिम में विभिन्न वर्ग के 15 लोगों ने नई सरकार से कई उम्मीदें जोड़ रखी हैं। ये हैं वे उम्मीदें:

1. भ्रष्टाचार-मुक्त देश
2. महंगाई पर लगाम
3. विकास पर ज़ोर
4. अर्थव्यवस्था में मजबूती
5. स्थिर सरकार

लोकसभा चुनाव संग्राम की शरुआत असम व त्रिपुरा में हो चकी है। देशभर की जनता अपने जनप्रतिनिधि चुनने में खासा गंभीर नजर आ रही है। किस पार्टी की लहर है, कौन सा दल डूबता जहाज है, किस राजनैतिक दल की तस्वीर आम आदमी के दिल-ओ-दिमाग में उभर रही है इसका जवाब तो 16 मई 2014 को ही आएगा, पर इतना तय है कि जनता इस बार सजग होकर 'बटन' दबाने का मन बना चुकी है।

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